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Chardham Yatra: चारधाम यात्रा अधूरी रह जाएगी अगर इस मंदिर में नहीं किया दर्शन, जानें कहां और किस भगवान के शरण में आना है जरूरी?

अगर चार धायात्रा करके निश्चिंत हैं कि आपका तीर्थ पूरा हो गया तो जान लें कि एक मंदिर गुजरात में ऐसा है जहां दर्शन करना जरूरी है क्योंकि इसके बिना आपके चार धाम की यात्रा पूरी नहीं मानी जाती है.

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Chardham Yatra: चारधाम यात्रा अधूरी रह जाएगी अगर इस मंदिर में नहीं किया दर्शन, जानें कहां और किस भगवान के शरण में आना है जरूरी?

बनासकांठा के भगवान धरणीधर 

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 भारत-पाकिस्तान सीमा पर कई ऐतिहासिक स्थान हैं जो किसी न किसी किंवदंती से जुड़े हुए हैं. ऐसा ही एक ऐतिहासिक स्थान वाव तालुका के धीमा गांव में स्थित है. यहां भगवान धरणीधर का मंदिर 600 वर्ष पूर्व संवत 1477 में स्थापित किया गया था. जिसके बाद से यह माना जाता है कि भगवान धरणीधर वास्तव में यहीं निवास करते हैं. बनासकांठा के लोग उन्हें मोस्टला कानुडा और धरणीधर भगवान के नाम से जानते हैं.

पौराणिक एवं चमत्कारी धरणीधर भगवान का मंदिर भारत-पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय सीमा के पास बनासकांठा जिले के धीमा गांव में स्थित है. भगवान धरणीधर का यह मंदिर मिनी द्वारका मंदिर के नाम से भी जाना जाता है. दुनिया में भगवान कृष्ण की एकमात्र मूंछ वाली मूर्ति इसी मंदिर में स्थित है, इसलिए उन्हें मूंछधारी भी कहा जाता है. इस मंदिर में हर पूर्णिमा को बड़ा मेला लगता है. ऐसा माना जाता है कि यदि चारधाम यात्रा के बाद भगवान धरणीधर के दर्शन नहीं किए जाएं तो यात्रा अधूरी मानी जाती है.

हर साल जेठ सुद एकादशी के दिन यहां धरणीधर भगवान का महोत्सव मनाया जाता है, जिसका विशेष महत्व है. भगवान धरणीधर के मंदिर के बगल में एक झील भी है, जो कई किंवदंतियों से जुड़ी हुई है. ऐसा कहा जाता है कि कई वर्ष पहले इस स्थान पर एक सात मंजिला टावर खड़ा था. जहां मार्कण्ड मुनि ने तपस्या की थी. इसलिए इस झील का नाम मार्कण्ड मुनि झील रखा गया है. आज भी यह स्थान मार्कण्ड मुनि की तपस्थली के रूप में जाना जाता है.
 
एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक दिन महादेव वंजारा नाम का एक व्यक्ति अपने गधे के साथ भगवान धरणीधर के दर्शन करने के लिए यहां आया और भगवान धरणीधर से मन्नत मांगी कि अगर उसे पुत्र की प्राप्ति हो गई और उसके शरीर का कोढ़ ठीक हो गया तो वह यहां एक झील का निर्माण कराएगा. समय के साथ भगवान ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की और यहां एक झील का निर्माण कराया, जिसे आज माडेला झील के नाम से जाना जाता है. एक लोक मान्यता यह भी है कि यदि कोई व्यक्ति चार धाम यात्रा पर जाता है और यहां भगवान धरणीधर के दर्शन करने नहीं आता है, तो वह चार धाम यात्रा अधूरी मानी जाती है.
 
अलाउद्दीन खिलजी से जुड़ा मंदिर का इतिहास

मंदिर के इतिहास की बात करें तो वर्षों पहले यह क्षेत्र वहारपुरी के नाम से जाना जाता था और यहां भगवान वराह की पूजा की जाती थी. यद्यपि दिल्ली सल्तनत के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने भी आक्रमण कर इसे नष्ट करने का प्रयास किया था, किन्तु अलाउद्दीन खिलजी की सेना को मध्य रात्रि में ही इस मंदिर से भागना पड़ा था. इसी बीच भगवान की मूर्ति खंडित हो गई और उससे जंगेश्वर महादेव का शिवलिंग बनाया गया, जिसके बाद 150 ई. में इसका पुनः निर्माण किया गया. 1397 ई. से. शालिग्रामजी की पूजा भी 1422 तक होती रही.
  
भगवान स्वयं न्यायालय गये और मुकदमा जीत गये!

भगवान धरणीधर के पम्फ्लेट के बारे में बताते हुए पुजारी दीपेश सेवक ने बताया कि वर्षों पहले राजस्थान से एक दरबारी पूनम के दिन यहां भगवान के दर्शन के लिए आते थे. उनके विरुद्ध एक अदालती मामला लंबित था. जिसके लिए उसे पूर्णिमा के दिन न्यायालय जाना था, फिर भी वह बिना कुछ सोचे-समझे भगवान के दर्शन करने पहुंच गया. जिसके बाद अगले दिन उन्होंने अपने वकील से मुलाकात की और कहा, 'कोर्ट की तारीख होने के बावजूद मैं उपस्थित नहीं हो सका, तो अब क्या कार्रवाई की जाए?' तब वकील ने भगत से कहा, 'आप कल अदालत में उपस्थित थे और आपने केस भी जीता था, देखिए, यह आपके हस्ताक्षर हैं.' एक अन्य प्रसंग में कहा गया है कि विष्णु यज्ञ के दौरान सूरदास नामक व्यक्ति भगवान के दर्शन के लिए आया और जैसे ही वह मंदिर से बाहर निकला, उसे दर्शन हुए.
 
भगवान भगत के सपने में आये

एक किवदंती के अनुसार भगवान श्री धरणीधरजी के भक्त और धीमान के ब्राह्मण सेवक दलपतराम भगवान 'श्री'जी की भक्ति भाव से सेवा करते थे. एक बार श्रीजी ने उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर कहा, 'बांसवाड़ा के पास एक वन गुफा में मेरी एक भव्य प्रतिमा है.' यही स्वप्न गांव के नेताओं को भी आया और उन्होंने भी कहा, 'दलपतराम, तुम्हारी दोनों गायें गर्भवती हैं.' यदि कल सुबह वे गायें बछड़ों को जन्म दें तो यह सपना सच समझिए.' ठीक उसी समय, दोनों गायों ने बछड़ों को जन्म दिया.
 
भगत मूर्ति की खोज में जंगल में चले गए

स्वप्न सत्य होने पर दलपतराम ने घर की जिम्मेदारी अपनी पत्नी को सौंप दी और स्वयं श्रीजी की मूर्ति खोजने निकल पड़े. उस समय जंगली क्षेत्र में चोर-लुटेरों का भय, सर्दी, गर्मी आदि कठिनाइयों का सामना करते हुए वे बांसवाड़ा के जंगलों में पहुंचे और काफी देर तक मूर्ति को खोजने का प्रयास किया, लेकिन मूर्ति न मिलने पर अंत में उन्होंने जल पीना बंद करने का निर्णय लिया और श्रीजी से प्रार्थना करते हुए कहा, 'यदि आप मुझे अब दर्शन नहीं देंगी तो मैं यहीं अपना शरीर त्याग दूंगा.'
 
'सूर्योदय की दिशा में बावन कदम चलें, आपको एक गुफा में एक मूर्ति मिलेगी'

रात्रि में जब दलपतराम सो रहे थे, तो उनके सामने एक दिव्य ज्योति प्रकट हुई और जैसे ही उन्होंने सामने देखा, उन्हें दिव्य आत्मा के रूप में भगवान श्रीजी के दर्शन हुए. दिव्य आत्मा के रूप में भगवान ने दलपतराम से बात की और कहा, 'सुबह सूरज जिस दिशा में उगता है, उस दिशा में बावन कदम चलो, जहां एक पत्थर आएगा. उस पत्थर को हटाओ और तुम्हें एक अद्भुत गुफा दिखाई देगी. उस गुफा में तुम्हें मेरी मूर्ति दिखाई देगी.' जिसके बाद सुबह सूर्योदय होते ही भगत दलपतराम उस दिशा में बावन कदम चले और श्रीजी के कहे अनुसार उन्हें एक चट्टान मिली और जैसे ही उन्होंने उसे हिलाया तो उन्हें एक गुफा भी मिली. इस गुफा में भगवान की एक भव्य मूर्ति मिली थी.

'मुझे मूर्ति के वजन के बराबर सोना दो' - राजा की मांग

जैसे ही मूर्ति मिली, दलपतराम ने पास के गांव से एक बैलगाड़ी की व्यवस्था की और अन्य भक्तों के साथ रिक्शे पर बैठकर गांव के लिए निकल पड़े. यात्रा के दौरान राजा को शिहोरी गांव का ध्यान आया, जहां राजा ने भक्तों से मुलाकात की और कहा, "मैं इस मूर्ति को यहां से तभी ले जाने की अनुमति दूंगा जब आप मुझे मूर्ति के वजन के बराबर सोना देंगे." यह सुनकर भक्तगण घबरा गए, तब प्रभु ने भगत दलपतराम को संकेत किया, 'अपने कान में जो सोने की बाली है, उसे तराजू में रख दो, उसके वजन से मैं तौल जाऊंगा.' और यह बात सच साबित हुई.

हर साल दो मेले आयोजित किये जाते हैं 
 
कुछ ही दिनों में भक्तगण मूर्ति लेकर धीमा गांव पहुंच गए, जहां ग्रामीणों ने उनका भव्य स्वागत किया. जिसके बाद ब्राह्मणों ने एकत्रित होकर भगवान श्री धरणीधरजी की प्रतिष्ठा की. यह दिन वि. सं. मंगलवार, ज्येष्ठ सुदी 11 (निर्जला एकादशी) सं. 1477 का था. तब से केवल सेवक परिवार ही मूर्ति की पूजा करता है. आजकल हर साल इस दिन यहां पर देवोत्सव मनाया जाता है और बड़ा मेला भी लगता है. हजारों तीर्थयात्री आते हैं. इसी प्रकार का एक अन्य मेला फाल्गुन (दुलेटी) माह की पहली तारीख को आयोजित होता है.

Disclaimer: हमारा लेख केवल जानकारी प्रदान करने के लिए है. ये जानकारी सामान्य रीतियों और मान्यताओं पर आधारित है.) 

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