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Aghori Sadhna: भारत में इन 5 जगहों पर साधना करते हैं अघोरी, सूनसान जगहों पर करते भयानक क्रियाएं

अघोर की उत्पत्ति भगवान शिव दत्तात्रेय से मानी जाती है. दत्तात्रेय भगवान शिव यानी महादेव के अवतार थे. वहीं अघोर की शुरुआती उत्पत्ति काशी से मानी गई है.

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Aghori Sadhna: भारत में इन 5 जगहों पर साधना करते हैं अघोरी, सूनसान जगहों पर करते भयानक क्रियाएं
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Aghori Sadhus: भारत में कई तरह के संत मिलते हैं, लेकिन इनमें अघोरी सबसे अलग होते हैं. ये अघोर पंथ को शैव और शाक्त संप्रदाय की एक तंत्र साधना मात्रा गया है. अघोर की उत्पत्ति भगवान शिव दत्तात्रेय से मानी जाती है. दत्तात्रेय भगवान शिव यानी महादेव के अवतार थे. वहीं अघोर की शुरुआती उत्पत्ति काशी से मानी गई है. हालांकि समय के साथ पीठों का विस्तार हुआ और आज देश में कई जगहों पर अघोरी तंत्र साधना करते हैं. इनकी साधना भीड़ भाड़ से एक दम दूर सूनसान जगहों पर होती है. यह सिर्फ कुंभ के दौरान दिखाई देते हैं. इसके बाद फिर से साल भर के लिए एकांत और सूनसान जगहों पर चले जाते हैं. कहा जाता है कि अघोरी अक्सर श्मशान भूमि में साधना करते हैं. आइए जानते हैं ​अघोरी कहां कहां साधन करते हैं. यह कहां मिलते हैं...

तारापीठ

पश्चिम बंगाल की बीरभूमि में स्थित तारापीठ द्वारका नदी के पास है. यह कोलकाता से करीब 250 किलोमीटर दूरी पर स्थित है. तारापीठ की तांत्रिकों शक्तितों, शैवों और कपालिकों और अघोरों के लिए पूजनीय माना जाता है. इस जगह पर सती की आंखे गिरी थीं. यही वजह है कि यह शक्तिपीठ बन गई. तारापीठ में सती के रूप में मां तारा विराजमान है और पीछे महाश्मशान है. यहां अघोरी छिपकर अपनी साधना करते हैं. 

विंध्याचल

विंध्याचल में मां विंध्यावासिनी माता का मंदिर है. मान्यता है कि महिषासुर वध के बाद मां दुर्गा ययही आराम के लिए रुकी थीं. भगवान श्री राम खुद यहां माता सीता के साथ आए थे. यहां उन्होंने तप किया था. यही वजह है कि यहां कई सारी गुफाएं भी मौजूद हैं, जिनमें रहकर अघोर साधक अपनी साधना करते हैं. 

काशी

वाराणसी में काशी विश्वासनाथ मंदिर के साथ ही मणिकर्णिका घाट है. यह अघोरी तंत्र साधना का सबसे प्रमुख केंद्र है. कहा जाता है कि यहां अघोरी शवों को खाते हैं. इनकी खोपड़ी में पानी पीते हैं. यहां पर आपको हर दिन और हर समय अघोरी दिख जाएंगे. हालांकि ये दूर जाकर एकांत और सूनसान में ही डेरा डालते हैं. 

चित्रकूट

चित्रकूट को अघोर पंथ के भगवान दत्तात्रेया की जन्मस्थली माना जाता है. अघोरियों के लिए यह जगह सबसे पवित्र मानी जाती है. यही पर अघोरियों की कीनारामी परंपरा की उत्तपत्ति हुई थी. मान्यता है कि यहां मां अनुसूइया का आश्रम और सिद्ध आघोराचार्य शरभंग का आश्रम भी है. अघोरियों के लिए यहीं पर स्फटिक शिला है. यह उनके लिए विशेष है. 

काली मठ

हिमालय पर्वत के तली में गुप्तकाशी के ऊपर एक कालीमठ नाम की जगह है. यहां भारी संख्या में अघोरी रहते हैं. यहां से 5 हजार फीट ऊपर पर एक पहाड़ी पर काल शिला है. यहां पर अघोरियों का वास है. यहीं पर अघोरी अपनी साधना करते हैं. मान्यता है कि त्रेतायुग में कालीमठ में ही भगवान श्रीराम ने अपना खडग स्थापित किया था.

Disclaimer: हमारा लेख केवल जानकारी प्रदान करने के लिए है. ये जानकारी सामान्य रीतियों और मान्यताओं पर आधारित है.)

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