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दुनिया के सबसे ऊंचे मंदिरों में शामिल है भारत का ये Temple, परिसर ऐसा की कई गांव समा जाए, रामायण से जुड़ा है रहस्य

भारत के अलावा दुनिया के कई देशों में एक से एक वैष्णव मंदिर बने हुए हैं, लेकिन जब भी सबसे ऊंचे मंदिरों की बात आती है तो इसमें भारत दक्षिण में स्थित श्री रंगनाथस्वामी मंदिर का नाम जरूर आता है. इस मंदिर को तिरुवरंगा तिरुपति के नाम से भी जाना जाता है. आइए जानते हैं इसकी ऊंचाई से लेकर अन्य खासियत...

Nitin Sharma | May 18, 2026, 09:26 AM IST

1.वैष्णव में सबसे ऊंचे मंदिरों में है शामिल

वैष्णव में सबसे ऊंचे मंदिरों में है शामिल
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देश के सबसे ऊंचे और शानदार वैष्णव मंदिरों में शामिल श्री रंगनाथस्वामी मंदिर में भगवान विष्णु लेटे हुए स्वरूप में विराजमान हैं. मान्यता है कि भगवान विष्णु यहां रामजी के रूप में विराजित हैं. यह मंदिर कावेरी और कोल्लीदम नाम की दो नदियों से घिरा है, जो भगवान विष्णु को समर्पित 108 दिव्य देसमों में से सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है.

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2.240 फीट ऊंचा है मंदिर

240 फीट ऊंचा है मंदिर
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तमिलनाडु के श्रीरंगम में स्थित श्री रंगनाथस्वामी मंदिर भारत के सबसे ऊंचे मंदिरों में पहले स्थान पर है. यह अपने विशाल गोपुरम (टावर) के चलते सबसे ऊंचे मंदिरों में गिना जाता है. इस मंदिर का राजगोपुरम लगभग 240 फीट ऊंचा है. इतना ही नहीं इसका परिसर भी इससे कहीं ज्यादा बड़ा है.

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3.मंदिर में है पूरा नगर

मंदिर में है पूरा नगर
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श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर सिर्फ अपनी ऊंचाई के लिए ही नहीं, क्षेत्रफल के लिए भी जाना जाता है. इसका परिसर इतना बड़ा है कि कई नगर समा जाये. मंदिर के गर्भगृह के चारों तरफ कई मोटी और विशाल प्राचीर की दीवारें हैं. परिसर के अंदर पांच घेरे मंदिर का निर्माण करते हैं, और बाहरी दो घेरे लोगों के लिए हैं. इस तरह से मंदिर और नगर के बीच का अंतर मिट जाता है. पूरा मंदिर 156 एकड़ से भी ज्यादा जगह में फैला है. यही वजह है कि यह दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक परिसरों में से एक है.

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4.156 एकड़ में हैं 50 छोटे मंदिर 

156 एकड़ में हैं 50 छोटे मंदिर 
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156 एकड़ में फैले मंदिर के अंदर विशाल दीवारों वाले 7 प्राकरमों के अलावा, मंदिर परिसर में 21 बहुत ही रंगीन मूर्तिकला वाले गोपुरम और 50 छोटे मंदिर हैं. वहीं 9 पवित्र तालाब, देवताओं के गर्भगृह के ऊपर सोने का पानी चढ़ा विमान (गुंबद) और कई दूसरी दिलचस्प चीजें हैं, जो इस मंदिर को विशेषताओं को बढ़ाती हैं. मंदिर का एक हिस्सा वैष्णव पंथ की नियमित सेवाओं, त्योहारों और गतिविधियों के लिए समर्पित है. वहीं दूसरा हिस्सा दैनिक दिनचर्या के साथ लोगों के लिए समर्पित है और लोगों का जीवन इसके आसपास केंद्रित है.

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5.रामायण से हैं मंदिर में विराजमान भगवान विष्णु की मूर्ति का संबंध

रामायण से हैं मंदिर में विराजमान भगवान विष्णु की मूर्ति का संबंध
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भगवान श्रीराम के लंका पर विजय पाने के बाद रावण के भाई विभीषण ने उनके रंगनाथस्वामी स्वरूप को लंका ले जाने की अनुमति मांगी. भगवान से अनुमति प्राप्त होने पर विभीषण रंगनाथस्वामी जी को उठकार ले जा रहे थे. इस दौरान उन्हें रास्ते में कावेरी नदी मिली. यहां उन्होंने रंगनाथस्वामी की प्रतिमा को किनारे रखकर कावेरी नदी की पूजा अर्चना की. इसके बाद जब उन्होंने प्रतिमा को उठाने का प्रयास किया तो वह विफल हो गये. खूब प्रयास करने पर भी ऐसा नहीं हुआ तो उन्होंने इसकी वजह जानी. इस पर पता चला कि कावेरी नदी को मिले वरदान की वजह से ऐसा हो रहा है. इस पर विभीषण ने रंगनाथस्वामी को यहीं पर स्थापित कर दिया. बताया जाता है कि इसके बाद से हर 12 साल विभीषण रंगनाथस्वामी की पूजा करने श्रीरंगम आते हैं.

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डिस्क्लेमर- यह जानकारी सामान्य ज्योतिष और ग्रह- नक्षत्रों  के आधार पर लिखी गई है. जरूरी नहीं की सबका अनुभव एक सा हो. ग्रहों और कुंडली से भी परिणाम बदल जाते हैं. अधिक जानकारी के लिए ज्योतिषाचार्य से संपर्क करें

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