धर्म
बाबा घाटू श्याम पर विजय का प्रतीक होता है निशान. बाबा पर मनोकामना पूर्ण करने और अर्जी लेकर पहुंचने वाले भक्त करते हैं अर्पित.
डीएनए हिंदी: बाबा खाटू श्याम जी के भक्त देश ही नहीं पूरी दुनिया में हैं. राजस्थान के सिंकर मंदिर में हर दिन लाखों भक्त बाबा के दर्शन करने पहुंचते हैं. कलयुग में बाबा भक्तों की लंबी कतार है. इसके पीछे की वजह उन्हें भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें खुद कलयुग के अवतार के रूप में आशीर्वाद दिया था. बाबा श्याम के धड़ विहीन शीश की पूजा की जाती है. खाटू श्याम धाम पर फाल्गुन मेला लगता है जो काफी प्रसिद्ध है. बाबा के भक्तों की वजह से मंदिर परिसर की जगह भी छोटी पड़ने लगी थीत्र इसके 13 नवंबर 2022 से मंदिर में काम चल रहा है. यहां ज्यादा से ज्यादा भक्तों के आने की व्यवस्था की जा रही है. इसबीच ही हम बात कर रहे हैं बाबा खाटू श्याम पर चढ़ने वाले निशान की. बाबा के भक्त घाटू श्याम पर निशान चढ़ाते हैं. इसे झंडा भी कहते हैं.
जानें क्या और क्यों चढ़ाया जाता है बाबा पर निशान
सनातन धर्म में ध्वजा विजय का प्रतीक माना जाता है. श्याम बाबा द्वारा किए गए बलिदान और दान के प्रति इच्छा शक्ति के लिए बाबा घाटू श्याम को निशान चढ़ाया जाता है. यह उनकी विजय का प्रतीक माना जाता है, क्योंकि उन्होंने भगवान श्री कृष्ण के कहने पर ही धर्म की जीत के लिए अपना शीश भगवान को समर्पित कर दिया था. युद्ध की जीत का श्रेय उन्होंने भगवान श्री कृष्ण को दिया था. इस पर भगवान ने उन्हें अवतार दिया था. इसी के बाद बाबा घाटू श्याम पर लाल, नीला, सफेद और केसरी रंग का झंडा होता है. इस पर भगवान श्री कृष्ण का फोटो और मोरपंखी भी सजी होती है. माना जाता है कि इसे चढ़ाने पर बाबा मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं. कुछ भक्त मनोकामना पूर्ण होने पर बाबा को निशान चढ़ाते हैं. आजकल कई भक्तों द्वारा बाबा पर सोने और चांदी के निशान भी बाबा श्याम को अर्पित किए जाते हैं. सोने और चांदी के भी निशान श्याम बाबा को अर्पित किये जाते हैं। रिंगस से शुरू होने वाली निशान यात्रा में नंगे पांव चलकर भगवान को निशान चढ़ाना बहुत ही उत्तम माना जाता है.
जानिए कौन हैं खाटू श्याम जी
बाबा खाटू श्याम से जुड़ा एक अत्यंत रोचक कहानी बताई जाती है. दरअसल महाभारत के युद्ध से पहले उसमें हिस्सा लेने के लिए भीम और हिडिम्बा के पुत्र घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक मां की आज्ञा लेकर निकले थे. बर्बरीक एक ही तीर में पेड़ के सारे पत्तों को छेदने की क्षमता रखते थे. उन्हें इसी दौरान श्रीकृष्ण ने रोक लिया. उन्होंने उनकी शक्ति का परीक्षण किया और पूछा कि किसी तरफ युद्ध में हिस्सा लोंगे. इस पर बर्बरीक ने कहा कि जो हारेगा उसको सहारा दूंगा. यह सुनकर भगवान श्रीकृष्ण भी खुश हुए. उन्होंन बर्बरीक से उसका शिश दान में मांग लिया. भगवान के कहते ही बर्बरीक ने यह कर दिया. साथ ही युद्ध देखने की इच्छा जाहिर की. श्री कृष्ण ने बर्बरीक के शीश पहाड़ पर रख दिया. साथ ही उन्होंने खुश होकर वरदान दिया कि तुम्हें कलयुग में मेरा ही अवतार माना जाएगा.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. डीएनए हिंदी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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