साइंस
मौत के बाद दिमाग उन अंगों में से एक है जो तेजी से सड़ने लगता है. लेकिन दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हजारों साल पुराने बिना खराब हुए दिमाग पाए गए हैं, अब वैज्ञानिकों ने बताया है कि आखिर ये दिमाग इतने समय तक कैसे सुरक्षित रहे...
इंसानी शरीर की मौत के बाद होने वाली प्राकृतिक प्रक्रिया आज भी वैज्ञानिकों के लिए कई रहस्य समेटे हुए है. आमतौर पर मौत के बाद शरीर के सॉफ्ट टिशू तेजी से टूटने लगते हैं और दिमाग भी उन अंगों में से एक है जो तेजी से सड़ने लगता है. इसके बावजूद पुरातत्वविदों को दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हजारों साल पुराने ऐसे इंसानी दिमाग मिले हैं, जो इस तरह से संरक्षित थे कि आज तक वे खराब नहीं हुए हैं.
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की रिसर्चर एलेक्जेंड्रा मॉर्टन-हेवर्ड की टीम ने साल 2024 में की गई एक स्टडी में 12,000 साल तक पुराने 4,400 से ज्यादा संरक्षित इंसानी दिमाग के रिकॉर्ड जुटाए. इनमें से 1,300 से ज्यादा मामलों में दिमाग ही कंकाल के बीच बचा हुए इकलौता सॉफ्ट टिशू था. यह खोज इसलिए हैरान करने वाली थी क्योंकि फॉरेंसिक साइंस के मुताबिक मौत के बाद दिमाग तेजी से सड़ने वाले अंगों में से एक होता है. फिर सवाल उठता है कि आखिर ये दिमाग इतने हजार साल तक कैसे सुरक्षित रहे.
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अब 2026 में जर्नल ऑफ प्रोटिओम रिसर्च में छपी नई स्टडी में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की एलेक्जेंड्रा मॉर्टन-हेवर्ड और उनकी टीम ने यह समझने की कोशिश की कि आखिर पानी से भरे और ऑक्सीजन की कमी वाले वातावरण में दिमाग के कुछ प्रोटीन दूसरे सॉफ्ट टिशू के मुकाबले ज्यादा समय तक क्यों टिके रह सकते हैं.

(Image Credit: Journal of Proteome Research)
रिसर्च के लिए वैज्ञानिकों ने मरे चूहों को छह महीने तक अलग-अलग परिस्थितियों में रखा. उन्होंने चार तरह के वातावरण बनाए, जिनमें गीली और ऑक्सीजन वाली, गीली और ऑक्सीजन की कमी वाली, सूखी और ऑक्सीजन वाली और सूखी और ऑक्सीजन की कमी वाली स्थितियां शामिल थीं. अलग-अलग समय पर दिमाग के नमूने लेकर वैज्ञानिकों ने उनमें मौजूद प्रोटीन और पेप्टाइड्स में होने वाले बदलावों को चेक किया. इसके बाद उन्होंने 12 लाख से ज्यादा पेप्टाइड-स्पेसिफिक डिग्रेडेशन प्रोसेस का कंप्यूटेशनल मॉडल तैयार किया, जिससे यह समझा जा सके कि कौन से प्रोटीन के हिस्से तेजी से टूटते हैं और कौन से लंबे समय तक टिके रहते हैं.
इस स्टडी में ऑक्सीजन सबसे बड़ी प्लेयर नजर आई. ऑक्सीजन की मौजूदगी वाले वातावरण में प्रोटीन का बड़े पैमाने पर टूटना देखा गया, जबकि गीले और ऑक्सीजन की कमी वाले वातावरण में मस्तिष्क के कुछ खास पेप्टाइड ज्यादा समय तक सुरक्षित रहे. इससे समय आया कि पानी ही हमेशा टिशू को खराब नहीं करता. अगर वातावरण में ऑक्सीजन की कमी हो तो दिमाग के हिस्से लंबे समय तक खराब नहीं होते.
वैज्ञानिकों ने पाया कि जो पेप्टाइड लंबे समय तक बचे रहे, उनमें कुछ खास संरचनात्मक विशेषताएं थीं. ये प्रोटीन बीटा-शीट संरचनाओं से जुड़े थे और उनमें ऐसे केमिकल क्षेत्र भी पाए गए जो धातुओं और वसा यानी लिपिड्स के साथ संपर्क कर सकते हैं. रिसर्चर्स के अनुसार, लोहे और तांबे जैसी धातुओं की मौजूदगी और कुछ केमिकल रिएक्शन प्रोटीन मॉलीक्यूल के बीच क्रॉस-लिंकिंग को बढ़ावा दे सकती हैं. इससे कुछ प्रोटीन संरचनाएं ज्यादा स्थिर हो सकती हैं और लंबे समय तक टूटने से बच सकती हैं.
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इस रिसर्च का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि जिस केमिकल रिएक्शन को हम आमतौर पर विनाश से जोड़ते हैं, वही कुछ खास परिस्थितियों में संरक्षण में भी योगदान देती है. ऑक्सीडेटिव रिएक्शन हमेशा केवल प्रोटीन को नष्ट नहीं करते. कुछ परिस्थितियों में वे प्रोटीन मॉलीक्यूल को आपस में जोड़कर अधिक स्थिर संरचनाएं भी बना सकते हैं. इस वजह से कुछ दिमाग के मॉलीक्यूल दूसरे सॉफ्ट टिशू के खत्म हो जाने के बाद भी लंबे समय तक सुरक्षित रह सकते हैं.