साइंस
Jaya Pandey | Jan 01, 2026, 04:09 PM IST
1.वो जीव जो कचरे को सोने में बदल देता है

आधुनिक दुनिया में सोना और दूसरी कीमती धातुओं का खनन पर्यावरण के लिए काफी नुकसानदेह होता है. खदानों से जहरीला कचरा निकलता है जिससे मिट्टी, पानी और हवा प्रदूषित होते हैं. लेकिन प्रकृति में मौजूद एक बेहद छोटे जीव के पास इस समस्या का अनोखा समाधान है. यह जीवाणु जहरीली धातुओं से भरी मिट्टी में न सिर्फ जिंदा रहता है बल्कि एक प्राकृतिक रासायनिक प्रक्रिया के जरिए धातु आयनों को ठोस सोने के कणों में बदल देता है.
2.क्या है इस बैक्टीरिया का नाम?

इस बैक्टीरिया का नाम Cupriavidus metallidurans है. यह बैक्टीरिया ऐसे वातावरण में रहने के लिए विकसित हुआ है जहां भारी धातुएं बहुत ज्यादा मात्रा में मौजूद होती हैं. आम तौर पर ऐसी परिस्थितियां ज्यादातर जीवों के लिए जानलेवा होती हैं. लेकिन यह जीवाणु अपनी कोशिकाओं के भीतर मौजूद खास एंजाइमों की मदद से जहरीली धातुओं को नियंत्रित करता है और खुद को सुरक्षित रखता है.
3.इस एंजाइम की वजह से विषाक्तता से बचा रहता है ये जीव

लाइव साइंस की एक रिपोर्ट के अनुसार इस बैक्टीरिया में CupA नाम का एक एंजाइम होता है. यह एंजाइम कोशिका के अंदर मौजूद अतिरिक्त तांबे को बाहर निकालकर कोशिका की दो झिल्लियों के बीच मौजूद एक सुरक्षात्मक हिस्से में पहुंचा देता है. इस हिस्से को पेरिप्लाज्म कहा जाता है. इससे तांबे का स्तर सुरक्षित बना रहता है और बैक्टीरिया सामान्य रूप से काम करता रहता है.
4.इस काम में जा सकती है बैक्टीरिया की जान

लेकिन सोने के आयन इस प्रक्रिया को और भी जटिल बना देते हैं. सोने के आयन आसानी से बैक्टीरिया की झिल्लियों को पार कर लेते हैं और CupA एंजाइम के काम में बाधा डालते हैं. इससे कोशिका के अंदर तांबे का संतुलन बिगड़ने लगता है और बैक्टीरिया के लिए जीवित रहना मुश्किल हो सकता है.
5.अपनी कोशिकाएं यूं बचाता है यह बैक्टीरिया

इस चुनौती से निपटने के लिए बैक्टीरिया एक और एंजाइम का इस्तेमाल करता है जिसे CopA कहा जाता है. यह एंजाइम तांबे और सोने दोनों आयनों से इलेक्ट्रॉन निकाल लेता है. इस प्रक्रिया से ये आयन एक्टिव और जहरीले रूप से बदलकर ठोस धातु में बदल जाते हैं. ये ठोस कण पेरिप्लाज्म में फंस जाते हैं और फिर कोशिका के लिए कम नुकसानदेह होते हैं.
6.रिसर्च में क्या आया सामने?

लाइव साइंस की रिपोर्ट के मुताबिक जर्मनी के मार्टिन लूथर यूनिवर्सिटी में इस रिसर्च का नेतृत्व कर रहे मॉलीक्यूलर बायोलॉजिस्ट डायट्रिच नीस बताते हैं कि जब पेरिप्लाज्म में मेटेलिक सोने के नैनोकण बन जाते हैं तो वे स्थिर हो जाते हैं और उनकी विषाक्तता काफी कम हो जाती है. इससे बैक्टीरिया खुद को सुरक्षित रख पाता है.
7.कितना सोना निकालता है ये जीव?

समय के साथ जब सोने के कण ज्यादा मात्रा में जमा हो जाते हैं तो बैक्टीरिया की बाहरी झिल्ली टूट जाती है और सोने के बेहद छोटे-छोटे टुकड़े बाहर निकल आते हैं. ये कण माइक्रोमीटर के आकार के होते हैं लेकिन धीरे-धीरे आपस में मिलकर रेत के दानों जैसे छोटे गुच्छे बना सकते हैं.
8.कैसे ई-वेस्ट को निपटाने में अहम है यह बैक्टीरिया?

वैज्ञानिक मानते हैं कि इस प्राकृतिक प्रक्रिया से भविष्य में ई-वेस्ट और धातु कचरे से सोना निकालने के नए और पर्यावरण-अनुकूल तरीके विकसित किए जा सकते हैं. इससे खनन पर निर्भरता कम हो सकती है और प्रदूषण भी घटाया जा सकता है.
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