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वैज्ञानिकों को सोने की खान में मिला 'शैतानी जीव', बिना आंखों और ऑक्सीजन के धरती की गहराई में कैसे है जिंदा?

वैज्ञानिकों ने दक्षिण अफ्रीका की गहरी सोने की खदानों में धरती के करीब 1.3 किलोमीटर नीचे से अजीब जीव खोज निकाला है जिसने साइंस के अब तक के नियमों को ही ताक पर रख दिया है...

Jaya Pandey | May 06, 2026, 02:39 PM IST

1.सोने की खदानों में वैज्ञानिकों को मिला अजीब जीव

सोने की खदानों में वैज्ञानिकों को मिला अजीब जीव
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दक्षिण अफ्रीका की गहरी सोने की खदानों में वैज्ञानिकों को एक जीव मिला है. यह जीव पुरानी चट्टानों की दरारों में भरे पानी में पाया गया है. यह चावल के दाने से भी छोटा है और इसकी आंखें भी नहीं हैं. वैज्ञानिक इस बात से हैरान है कि आखिर धरती के इतने नीचे कोई जीव जिंदा कैसे रह सकता है. 
(Image: AI Generated)

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2.जमीन के 1.3 किलोमीटर नीचे मिला यह जीव

जमीन के 1.3 किलोमीटर नीचे मिला यह जीव
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इस जीव का नाम Halicephalobus mephisto है. इसे साइंटिस्ट डेविल वर्म कह रहे हैं. इस खोज ने वैज्ञानिकों की उस सोच को चुनौती दी कि जटिल जीवन केवल पृथ्वी की सतह के पास ही संभव है. साल 2011 में वैज्ञानिकों ने पहली बार इस कीड़े को जमीन की सतह से करीब 1.3 किलोमीटर नीचे खोजा था. इससे पहले इतनी गहराई पर केवल बैक्टीरिया और माइक्रोब्स ही मिले थे जो एककोशिकीय जीव होते हैं.
(Image Credit: Wikimedia Commons) 

3.बिना रोशनी और ऑक्सीजन के कैसे जिंदा है यह जीव?

बिना रोशनी और ऑक्सीजन के कैसे जिंदा है यह जीव?
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इस बार Halicephalobus mephisto जैसे एक बहुकोशिकीय जीव का वहां मिलना विज्ञान के लिए चौंकाने वाला है. यह खोज इसलिए भी खास है क्योंकि इसने यह साबित किया कि जटिल जीवन भी बेहद कठोर और अलग-थलग वातावरण में पनप सकता है. यह इलाका केवल एक अंधेरी खदान नहीं है, बल्कि टूटी हुई चट्टानों, खनिजों और लाखों साल पुराने पानी का जाल है. यहां न सूरज की रोशनी पहुंचती है, न ही कोई फूड चेन ही मौजूद है. यहां तापमान और दबाव बहुत ज्यादा है और ऑक्सीजन बहुत कम.
(Image Credit: Wikimedia Commons) 

4.जमीन के इतने अंदर क्या खाता है डेविल वर्म?

जमीन के इतने अंदर क्या खाता है डेविल वर्म?
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ऐसे माहौल में यह कीड़ा बैक्टीरिया को खाकर जिंदा रहता है. वैज्ञानिकों के अनुसार यह जीव समय के साथ इसी वातावरण में खुद को ढाल चुका है. 2019 में साइंस जर्नल Nature Communications में छपी एक स्टडी में इस कीड़े के जीनोम का विश्लेषण किया गया. इसमें पाया गया कि इसके शरीर में ऐसे जीन अधिक मात्रा में मौजूद हैं, जो इसे अत्यधिक गर्मी और तनावपूर्ण परिस्थितियों में जिंदा रहने में मदद करते हैं. 
(Image Credit: Wikimedia Commons) 

5.यह प्रोटीन इतने नीचे जिंदा रहने में करता है मदद?

यह प्रोटीन इतने नीचे जिंदा रहने में करता है मदद?
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Communications Biology में छपी एक दूसरी स्टडी में वैज्ञानिकों ने इस कीड़े के एक खास प्रोटीन साइटोक्रोम सी ऑक्सीडेज को स्टडी किया. उन्होंने सुझाव दिया कि यह प्रोटीन एक तरह से तापमान को महसूस करने वाला बायोलॉजिकल सेंसर हो सकता है. इसकी मदद से यह कीड़ा अपने आसपास के तापमान में बदलाव के अनुसार प्रतिक्रिया दे पाता है. गहराई में जहां तापमान अचानक बदल सकता है, इससे उसे जिंदा रहने में मदद मिलती है. 
(Image Credit: Wikimedia Commons) 

6.साइंटिस्ट इस रिसर्च को कैसे देख रहे हैं?

साइंटिस्ट इस रिसर्च को कैसे देख रहे हैं?
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इस रिसर्च से साइंटिस्ट यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि पृथ्वी पर जीवन की सीमा कहां तक हो सकती है. पहले माना जाता था कि सतह के नीचे केवल माइक्रोब्स ही जिंदा रह सकते हैं लेकिन इस कीड़े ने साबित कर दिया कि बहुकोशिकीय जीव भी वहां मौजूद हो सकते हैं. इससे यह संभावना भी बढ़ जाती है कि इसी तरह के कठिन वातावरण में दूसरे ग्रहों या चंद्रमाओं पर भी जीवन हो सकता है.
(Image Credit: Wikimedia Commons) 

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