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एलियन की तलाश में वैज्ञानिकों को मिला नया फॉर्मूला, बताया किस साइज के ग्रह पर हो सकती है जिंदगी

वैज्ञानिकों ने नया मॉडल बनाया है जिससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि किस आकार के एक्सोप्लैनेट में जीवन संभव हो सकता है. इस नई थ्योरी में बताया गया है कि जीवन के लिए सिर्फ पानी ही जरूरी नहीं है बल्कि कोई ग्रह अपने वायुमंडल को कितने समय तक बनाए रखता है, यह भी जरूरी है...

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एलियन की तलाश में वैज्ञानिकों को मिला नया फॉर्मूला, बताया किस साइज के ग्रह पर हो सकती है जिंदगी

किन ग्रहों पर मुमकिन हो सकता है जीवन? (Image Credit: NASA)

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  • वैज्ञानिकों ने विकसित किया STEHM मॉडल
  • इससे पता चलेगा किसी ग्रह पर जीवन संभव है या नहीं
  • ग्रह का हैबिटेबल जोन में होना ही उसके रहने योग्य होने की गारंटी नहीं
  • द प्लैनेटरी साइंस जर्नल में छपी है यह स्टडी

अगर एलियन की दुनिया और दूसरे ग्रहों पर जीवन की संभावना आपको आकर्षित करती है, तो वैज्ञानिकों की नई रिसर्च बेहद दिलचस्प है. वैज्ञानिकों ने नया मॉडल बनाया है जिससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि किस आकार के एक्सोप्लैनेट लंबे समय तक अपना वायुमंडल बनाए रख सकते हैं. नई रिसर्च के मुताबिक, किसी ग्रह का अपने तारे के हैबिटेबल जोन में होना ही उसके रहने योग्य होने की गारंटी नहीं है. ग्रह का आकार, उसका इंटरनल स्ट्रक्चर, कार्बन की मात्रा, ज्वालामुखीय गतिविधि और तारे से मिलने वाला रेडिएशन भी यह तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं कि वह अरबों साल तक वायुमंडल को संभाल पाएगा या नहीं.

सिर्फ हैबिटेट जोन में होना ही काफी नहीं

कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, रिवरसाइड और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से जुड़ी प्लैनेटरी साइंटिस्ट मिशेल एल. हिल और उनकी टीम ने STEHM (Smaller Than Earth Habitability Model) विकसित किया है. इस मॉडल का मकसद यह पता लगाना है कि सूर्य जैसे तारे के हैबिटेबल जोन में मौजूद पृथ्वी से छोटे चट्टानी ग्रह कितने समय तक अपना वायुमंडल बनाए रख सकते हैं. वैज्ञानिकों ने 1 अर्थ रेडियस से लेकर 0.5 अर्थ रेडियस तक के ग्रहों का मॉडल तैयार किया और देखा कि ग्रह के आकार के साथ उसकी आंतरिक संरचना और वायुमंडल में समय के साथ क्या बदलाव आते हैं. 

यह स्टडी द प्लैनेटरी साइंस जर्नल में जून 2026 में छपी है. इस स्टडी के मुताबिक, सूर्य जैसे तारे के हैबिटेबल जोन में पृथ्वी जैसी परिस्थितियों वाले ग्रह के लिए लंबे समय तक वायुमंडल बनाए रखने की सामान्य सीमा करीब 0.8 अर्थ रेडियस के आसपास दिखाई देती है. ऐसा ग्रह अर्छ रेडियस का लगभग 80% होने पर अरबों साल तक अपने वायुमंडल को बनाए रखने में सक्षम हो सकता है. लेकिन यह कोई तय सीमा नहीं है.

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वायुमंडल बनाए रखने की क्षमता भी है जरूरी 

ग्रह की शुरुआती परिस्थितियों में बदलाव होने पर करीब 0.7 अर्थ रेडियस वाले ग्रह भी लंबे समय तक वायुमंडल बनाए रख सकते हैं. इससे छोटे ग्रहों के लिए वायुमंडल को लंबे समय तक बचाए रखना काफी मुश्किल हो जाता है. लेकिन ऐसा नामुमकिन भी बिलकुल नहीं है. यह अध्ययन बताता है कि छोटे ग्रहों की वायुमंडल बनाए रखने की क्षमता उनकी संरचना और शुरुआती विकास पर बहुत ज्यादा निर्भर करती है.

सिर्फ हैबिटेबल जोन में मौजूद होना किसी ग्रह को रहने योग्य नहीं बना देता. अगर किसी ग्रह के पास पर्याप्त वायुमंडल नहीं है, तो वह अपनी सतह पर तापमान को स्थिर नहीं रख पाएगा और न दी वहां लंबे समय तक पानी तरल अवस्था में रह सकेगा. इसके अलावा, तारे से आने वाला हाई रेडिएशन और स्टीलर पार्टिकल्स भी समय के साथ वायुमंडल को खत्म कर सकते हैं.

इस रिसर्च से यह साफ होता है कि एलियन जीवन की खोज में अब सिर्फ पानी की मौजूदगी पर ही निर्भर नहीं है बल्कि वैज्ञानिकों को यह भी समझना होगा कि कोई ग्रह अरबों साल तक अपने वायुमंडल को कैसे बनाए रख सकता है. जीवन की शुरुआत और उसके लंबे समय तक टिके रहने के लिए स्थिर वातावरण बेहद जरूरी है.

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