साइंस
अमेरिका के 66 वर्षीय टिम एंड्रयूज ने जेनेटिकली मॉडिफाइड सुअर की किडनी के सहारे 271 दिनों तक बिना डायलिसिस के जीवित रहकर एक नया इतिहास रचा है.
नौ महीने तक टिम एंड्रयूज ने वो कर दिखाया, जो किडनी की बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए कभी नामुमकिन सा लगता था. बिना डायलिसिस के नौ महीने जिंदा रहना और यह चमत्कार हुआ सुअर की जेनेटिकली मॉडिफाइड किडनी के सहारे. हालांकि, कुछ समय बाद उस किडनी ने काम करना बंद कर दिया, लेकिन तब तक उसने एक बड़ा काम कर दिखाया था. उसने टिम को तब तक जीवित रखा, जब तक कि उन्हें इंसानी किडनी नहीं मिल गई.
अमेरिका के मैसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने बताया कि 271 दिनों तक सुअर की किडनी का इंसान के शरीर में सही से काम करना एक वर्ल्ड रिकॉर्ड है. यह द लांसेट (The Lancet) मेडिकल जर्नल में भी छपा है. ये पहला ऐसा मामला है जहां सुअर की किडनी का इस्तेमाल इंसानी किडनी मिलने तक एक अस्थायी पुल की तरह किया गया.
न्यू हैम्पशायर के रहने वाले 66 साल के टिम एंड्रयूज टाइप-2 डायबिटीज के कारण किडनी फेलियर से जूझ रहे थे. इंसानी किडनी मिलने की उम्मीद बेहद कम थी. आंकड़ों के मुताबिक, 5 साल के भीतर इंसानी किडनी मिलने की संभावना सिर्फ 9% थी, जबकि इंतजार के दौरान मौत का खतरा 40% से ज्यादा था.
उन्हें बताया गया था कि ट्रांसप्लांट के लिए 7 साल तक का इंतजार करना पड़ सकता है. टिम ने बताया, "मेरे पास वक्त बहुत कम था और डायलिसिस पर रहते हुए जिंदगी बेहद निराशाजनक हो चुकी थी." तभी सुअर की किडनी का यह एक्सपेरिमेंट उनके लिए एक नई उम्मीद बनकर आया.
25 जनवरी 2025 को टिम का ट्रांसप्लांट हुआ. सर्जरी के बाद टिम ने कहा, "जैसे ही मेरी आंख खुली, डायलिसिस का वो डरावना दौर खत्म हो चुका था. मुझे नई ऊर्जा महसूस हो रही थी, यह किसी चमत्कार से कम नहीं था."
इंसान के शरीर में किसी दूसरे जीव का अंग ट्रांसप्लांट करने के पीछे सबसे बड़ी वजह है- अंगों की भारी किल्लत. अकेले अमेरिका में 1 लाख से ज्यादा लोग किडनी ट्रांसप्लांट के इंतजार में हैं, जबकि साल में सिर्फ 25,000 ट्रांसप्लांट हो पाते हैं.
सुअर के अंग आकार में इंसानी अंगों के काफी करीब होते हैं. लेकिन साधारण सुअर की किडनी शरीर तुरंत रिजेक्ट कर देता है. इसलिए वैज्ञानिकों ने विल्मा नाम की एक खास प्रजाति के सुअर के डीएनए में 69 बदलाव किए, ताकि इंसान का इम्यून सिस्टम उसे बाहरी हमलावर न माने और रिजेक्ट न करे.
ट्रांसप्लांट के बाद सुअर की किडनी तुरंत काम करने लगी और टिम पूरे 9 महीने तक बिना डायलिसिस के सामान्य जिंदगी जीते रहे. हालांकि करीब 6 महीने बाद किडनी की रक्त वाहिकाओं में सूजन आने लगी और धीरे-धीरे उसने काम करना बंद कर दिया. अक्टूबर 2025 में डॉक्टरों ने उस किडनी को बाहर निकाल दिया.
इसके बाद टिम को फिर से 82 दिनों तक डायलिसिस पर रहना पड़ा. लेकिन जनवरी 2026 में किस्मत ने उनका साथ दिया और एक मृत दाता से उन्हें इंसानी किडनी मिल गई. अब टिम पूरी तरह ठीक हैं और उनकी नई इंसानी किडनी सही से काम कर रही है.
डॉक्टरों का मानना है कि जेनोट्रांसप्लांटेशन भविष्य में ऑर्गन डोनेशन की कमी को दूर करने में क्रांतिकारी साबित हो सकता है. फिलहाल इसका मकसद मरीजों को डायलिसिस के नरक से बचाना और इंसानी अंग मिलने तक उन्हें सुरक्षित रखना है. यह प्रयोग भले ही अभी शुरुआती चरण में हो, लेकिन टिम एंड्रयूज जैसे मरीजों के साहस ने चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में एक नया पन्ना जोड़ दिया है.
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