साइंस
वैज्ञानिकों ने एक ऐसी बौनी आकाशगंगा की स्टडी की है, जो हमें ब्रह्मांड के शुरुआती दौर में मौजूद आकाशगंगाओं को समझने में मदद कर सकती है. जानें डिटेल्स...
जब से इंसान ने आसमान की ओर देखना शुरू किया, जब से अंतरिक्ष की दुनिया उसके लिए रहस्य और जिज्ञासा का विषय रही है. आकाशगंगाएं भी इन रहस्यों का अहम हिस्सा हैं. अब वैज्ञानिकों ने एक ऐसी बौनी आकाशगंगा की स्टडी की है, जो हमें ब्रह्मांड के शुरुआती दौर में मौजूद आकाशगंगाओं को समझने में मदद कर सकती है. इससे उन परिस्थितियों को भी समझने में मदद मिलेगी, जिनमें ब्रह्मांड की पहली पीढ़ियों के तारों ने धूल का निर्माण किया था.
यह स्टडी 20 जुलाई 2026 को द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल में छपी है. इस रिसर्च में वैज्ञानिकों ने नासा के जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप की मदद से सेक्स्टन्स ए नाम की एक बौनी आकाशगंगा का अध्ययन किया है. यह आकाशगंगा पृथ्वी से करीब 4 मिलियन प्रकाश-वर्ष दूर है. इसकी सबसे खास बात इसकी बेहद कम 'मेटैलिसिटी' है. एस्ट्रोनॉमी में हाइड्रोजन और हीलियम से भारी सभी तत्वों को मेटल कहा जात है. सेक्स्टन्स ए में इन भारी तत्वों की मात्रा 1% से 7% के बीच है जो सूर्य की तुलना में बेहद कम है. इस वजह से वैज्ञानिक इसे शुरुआती ब्रह्मांड की भारी तत्वों की कम मात्रा वाले आकाशगंगाओं का नजदीकी उदाहरण मान रहे हैं.

ब्रह्मांड के शुरुआती दौर में ज्यादातर पदार्थ हाइड्रोजन और हीलियम से बना था. भारी तत्वों की मात्रा बहुत कम थी क्योंकि उस समय तारों की कई पीढ़ियां अभी अस्तित्व में नहीं आई थीं. वैज्ञानिकों के अनुसार, पहली पीढ़ी के तारों को Pop III स्टार्स कहा जाता है. इन तारों में भारी तत्वों की मात्रा बेहद कम या लगभग नहीं के बराबर रही होगी. इन तारों के अंदर न्यूक्लियर फ्यूजन की वजह से भारी तत्व बने और जब इनमें से कुछ विशाल तारों का जीवन सुपरनोवा विस्फोट के साथ खत्म हुआ, तो इनसे बने तत्व इंटरस्टीलर गैस में फैल गए. बाद में इन्हीं गैस और धूल से तारों की नई पीढ़ियां बनीं.
पहली पीढ़ियों के तारों के बाद बनने वाले तारों में भारी तत्वों की मात्रा बढ़ती गई. हमारा सूर्य भी ऐसी ही बाद की पीढ़ी का तारा है और इसमें हाइड्रोजन व हीलियम के अलावा भारी तत्व मौजूद हैं. हालांकि, सेक्स्टन्स ए जैसी बेहद कम मेटैलिसिटी वाली बौनी आकाशगंगाएं आज भी वैज्ञानिकों को उन परिस्थितियों का अध्ययन करने का मौका देती हैं, जो शुरुआती ब्रह्मांड के ज्यादा करीब थीं.
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इस नई रिसर्च का फोकस उन विकसित तारों पर है, जिन्हें एसिम्प्टोटिक जायंट ब्रांच यानी AGB स्टार्स कहा जाता है. ये ऐसे तारे होते हैं, जो अपने जीवन के आखिरी चरणों में पहुंच चुके होते हैं. इस अवस्था में तारे बेहद विशाल और चमकीले हो सकते हैं और उनकी बाहरी परतों से गैस और धूल अंतरिक्ष में बाहर निकल सकती है. यह प्रक्रिया उन्हें ब्रह्मांड में धूल के बड़े स्रोतों में बदल देती है.
जेम्स वेब के NIRCam (Near-Infrared Camera) और MIRI (Mid-Infrared Instrument) से मिले डेटा के मुताबिक आधुनिक तारों के विकास और धूल निर्माण के मॉडल से मिलाकर वैज्ञानिकों ने सेक्स्टन्स ए में मौजूद विकसित तारों की आबादी का अध्ययन किया. रिसर्च में सामने आया कि 90% से ज्यादा AGB स्टार्स के आसपास बहुत कम या लगभग कोई सरकमस्टीलर डस्ट नहीं थी. लेकिन वैज्ञानिकों ने करीब 20 ऐसे तारों की पहचान की, जो धूल की मोटी परतों से घिरे हुए थे. ये तारे सेक्स्टन्स ए में धूल की फैक्ट्री की तरह काम कर रहे हैं.
इस रिसर्च को इटली के नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एस्ट्रोफिजिक्स और यूनिवर्सिटी ऑफ रोम ट्रे के रिसर्चर क्लाउडियो गावेटी ने किया. वैज्ञानिकों का कहना है कि जेम्स वेब से मिले इन डेटा की अहमियत सिर्फ अंतरिक्ष की शानदार तस्वीरों तक ही सीमित नहीं है. इससे तारों के विकास और धूल निर्माण से जुड़े सैद्धांतिक मॉडलों के साथ मिलाकर देखा जा सकता है. यह इस बात को चेक करने में मदद करेगा कि हमारे मौजूदा मॉडल ब्रह्मांड में तारों के विकास की वास्तविक प्रक्रिया को कितनी सही तरह से समझा पा रहे हैं.
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