Advertisement
हिंदी न्यूज़लाइफस्टाइल

Irritability and Mood Swings: दिवाली के बाद से लोगों में क्यों बढ़ने लगा है चिड़चिड़ापन-गुस्सा और मूड स्विंग?  

क्या दिवाली के बाद से आपको या परिवार के किसी सदस्य के नेचर में बदलाव दिख रहा है. जैसे गुस्सा, चिड़चिड़ापन या मूड स्विंग. अगर हां तो इसके पीछे एक बड़ा कारण जिम्मेदार है.

Latest News
Irritability and Mood Swings: दिवाली के बाद से लोगों में क्यों बढ़ने लगा है चिड़चिड़ापन-गुस्सा और मूड स्विंग?  

क्यों बढ़ने लगा है चिड़चिड़ापन-गुस्सा और मूड स्विंग?  

Add DNA as a Preferred Source

20 अक्टूबर को दिवाली की रात हुए ज़बरदस्त जश्न और पटाखे फोड़ने के बाद राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हवा की गुणवत्ता बेहद खराब हो गई है. वायु गुणवत्ता सूचकांक 400 के पार पहुँच गया है. दो दिनों से आसमान धुंध से ढका हुआ है. मौसम अजीबोगरीब है. जब हवा बहुत ज़्यादा प्रदूषित हो जाती है, तो इसका मूड और दिमाग़ की कार्यप्रणाली पर गहरा असर पड़ता है. यह खराब वायु गुणवत्ता मानसिक स्वास्थ्य को कमज़ोर करती है. वैज्ञानिक और चिकित्सीय शोध बताते हैं कि उदासी, चिंता, डर और गुस्सा आप पर हावी होने लगते हैं.

जब AQI (वायु गुणवत्ता सूचकांक) 400 से अधिक हो जाता है, तो यह "खतरनाक" श्रेणी में आ जाता है, जहाँ PM2.5, NO₂ और O₃ जैसे प्रदूषक महत्वपूर्ण मात्रा में मौजूद होते हैं. इस स्तर पर, प्रदूषण मस्तिष्क में सूजन पैदा कर सकता है और कोशिकाओं को नुकसान पहुँचा सकता है. और जब यह रक्तप्रवाह के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुँचता है, तो यह न केवल मनोदशा को प्रभावित करता है, बल्कि मस्तिष्क के कार्य को भी प्रभावित करता है.

दिवाली के बाद से लोगों में क्यों बढ़ने लगा है चिड़चिड़ापन-गुस्सा और मूड स्विंग?  

जब वायु प्रदूषण का स्तर ऊँचा होता है, तो यह सेरोटोनिन और डोपामाइन जैसे मस्तिष्क रसायनों के स्राव को बाधित कर सकता है, जिससे अवसाद, चिंता और मनोदशा संबंधी समस्याएं हो सकती हैं. यह कोर्टिसोल जैसे तनाव हार्मोन के स्तर को भी बढ़ा सकता है, जिससे नींद में खलल और भावनात्मक अस्थिरता हो सकती है.

अध्ययनों के अनुसार, प्रदूषण का उच्च स्तर आत्महत्या, आत्म-क्षति और अन्य मानसिक स्वास्थ्य जोखिमों को बढ़ाता है, विशेष रूप से बच्चों और युवाओं में, जिनका मस्तिष्क विकसित हो रहा है.

यदि AQI 400+ हो तो हवा का क्या होगा?

हवा में PM2.5 और PM10 कणों की सांद्रता काफ़ी बढ़ जाती है. ये इतने सूक्ष्म होते हैं कि फेफड़ों की झिल्ली को भेदकर रक्तप्रवाह में प्रवेश कर जाते हैं. इनके साथ नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, ओज़ोन और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी गैसें भी होती हैं. ये कण रक्त-मस्तिष्क अवरोध को पार करके सीधे मस्तिष्क के न्यूरॉन्स को प्रभावित करते हैं.

दिवाली के बाद से लोगों में क्यों बढ़ने लगा है चिड़चिड़ापन-गुस्सा और मूड स्विंग?  

इसका मस्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ता है?

हार्वर्ड विश्वविद्यालय और कोलंबिया विश्वविद्यालय तथा लैंसेट न्यूरोलॉजी की पत्रिकाओं में प्रकाशित अध्ययनों सहित कई तंत्रिका विज्ञान अध्ययनों ने निम्नलिखित प्रभाव दर्शाए हैं:

 स्मृति और सतर्कता में कमी

 यदि AQI लगातार 2-3 दिनों तक 400 से ऊपर रहता है, तो दिमाग धुंधला हो जाता है.
 ध्यान केन्द्रित करना कठिन हो जाता है और आप छोटी-छोटी बातें भूलने लगते हैं.
 वायु प्रदूषण सेरोटोनिन और डोपामाइन का स्तर कम हो जाता है. इससे उदासी या चिड़चिड़ापन, थकान और चीज़ों में रुचि की कमी बढ़ जाती है.
 
क्या इससे मस्तिष्क में सूजन हो सकती है?

PM 2.5 कण मस्तिष्क में सूजन पैदा करने वाले साइटोकाइन्स को सक्रिय करते हैं, जिससे मस्तिष्क में सूजन आ जाती है. इससे अल्ज़ाइमर और पार्किंसन जैसी बीमारियों का ख़तरा बढ़ जाता है.

क्या इससे नींद पर भी असर पड़ता है?

जी हाँ, प्रदूषित हवा ऑक्सीजन के स्तर को कम करती है, नाक बंद होने का कारण बनती है और गहरी नींद में बाधा डालती है. नींद की कमी से मूड खराब हो सकता है.

दिवाली के बाद से लोगों में क्यों बढ़ने लगा है चिड़चिड़ापन-गुस्सा और मूड स्विंग?  

मनोदशा और मानसिक स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है?

सोशल मीडिया के आंकड़ों के अनुसार, विश्व स्वास्थ्य संगठन और येल स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ की 2023 की एक रिपोर्ट में पाया गया है कि AQI 300-500 की अवधि के दौरान चिंता और अवसाद के मामलों में 15-20% की वृद्धि होती है. थकान, गुस्सा और उदासी बढ़ जाती है. बच्चों और बुजुर्गों में चिड़चिड़ापन और भ्रम की स्थिति बढ़ जाती है.

वायु प्रदूषण से तनाव तनाव पैदा करने वाले हार्मोन बढ़ जाते हैं
 
बीजिंग में 2021 में किए गए एक चीनी अध्ययन में पाया गया कि जब AQI 400 से अधिक हो गया, तो कॉलेज के छात्रों के मूड सूचकांक में औसतन 30% की कमी आई. मस्तिष्क तनाव प्रतिक्रिया को सक्रिय करता है, जिससे कोर्टिसोल बढ़ता है, जिससे तनाव और चिंता की भावना पैदा होती है. हृदय गति बढ़ जाती है, जिससे बेचैनी, सिरदर्द और थकान होती है. ये सभी कारक मूड खराब होने और मानसिक थकान का कारण बनते हैं.वायु प्रदूषण सेरोटोनिन और डोपामाइन का स्तर कम हो जाता है. इससे उदासी या चिड़चिड़ापन, थकान और चीज़ों में रुचि कम हो जाती है.

दिवाली के बाद से लोगों में क्यों बढ़ने लगा है चिड़चिड़ापन-गुस्सा और मूड स्विंग?  

यदि यह लम्बे समय तक जारी रहा तो क्या होगा?

यदि वायु की यह गुणवत्ता लम्बे समय तक जारी रही तो यह खतरनाक हो सकती है.

  • मस्तिष्क के कार्य में धीरे-धीरे गिरावट
  • अवसाद और चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है
  •  मस्तिष्क की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया तेज हो जाती है.

2020 के हार्वर्ड अध्ययन में पाया गया कि जिन शहरों में वर्ष में 60 दिनों से अधिक समय तक AQI 300+ रहता है, वहां लोगों की मस्तिष्क क्षमता और जीवन प्रत्याशा में 5 वर्ष की कमी देखी जाती है.

दिवाली के बाद से लोगों में क्यों बढ़ने लगा है चिड़चिड़ापन-गुस्सा और मूड स्विंग?  
 
यदि AQI 400+ हो तो क्या करें?

  1.  सुबह या शाम को टहलना बंद कर दें.
  2.  वायुरोधी खिड़कियाँ बंद रखें.
  3.  ध्यान करें. यह कॉर्टिसोल को कम करता है.

अपनी राय और अपने इलाके की खबर देने के लिए जुड़ें हमारे गूगल, फेसबुक, x,   इंस्टाग्राम, यूट्यूब और वॉट्सऐप कम्युनिटी से

Read More
Advertisement
Advertisement
Advertisement