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किस राज्य में सबसे कम बच्चे पैदा कर रही महिलाएं? भारत के इन राज्यों में तेजी से घट रही जन्मदर, सामने आई चौंकाने वाली तस्वीर

State Wise Fertility Rate: क्या भारत जनसंख्या विस्फोट से निकलकर अब जनसंख्या संकट की ओर बढ़ रहा है? चलिए जानें बच्चे पैदा करने से पीछे क्यों हट रहे हैं लोग? भारत के इन राज्यों में तेजी से घट रही जन्मदर, चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है.

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किस राज्य में सबसे कम बच्चे पैदा कर रही महिलाएं? भारत के इन राज्यों में तेजी से घट रही जन्मदर, सामने आई चौंकाने वाली तस्वीर

 बच्चे पैदा करने से पीछे क्यों हट रहे हैं लोग (फोटो-सोशल मीडिया)

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यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि देश के कई राज्यों में महिलाएं पहले की तुलना में काफी कम बच्चे पैदा कर रही हैं. वहीं कुछ राज्यों में अब भी परिवार का आकार बड़ा बना हुआ है. हाल ही में आंध्र प्रदेश सरकार की ओर से बड़े परिवारों को प्रोत्साहित करने की चर्चा ने इस मुद्दे को फिर सुर्खियों में ला दिया है. लेकिन असली कहानी सिर्फ जनसंख्या की नहीं, बल्कि भविष्य की नौकरियों, अर्थव्यवस्था और बुजुर्ग होती आबादी से भी जुड़ी है.

जहां सबसे ज्यादा बच्चे जन्म ले रहे हैं, वहां की कहानी क्या कहती है?

देश में सबसे अधिक प्रजनन दर वाले राज्यों में बिहार और मेघालय प्रमुख हैं. बिहार में एक महिला अपने जीवनकाल में औसतन लगभग तीन बच्चों को जन्म देती है. मेघालय भी इसी श्रेणी में शामिल है. उत्तर प्रदेश और झारखंड में भी राष्ट्रीय औसत की तुलना में प्रजनन दर अधिक बनी हुई है.

विशेषज्ञों का मानना है कि इन राज्यों में ग्रामीण आबादी का बड़ा हिस्सा, कम उम्र में विवाह, पारिवारिक संरचना और सामाजिक परिस्थितियां जन्मदर को प्रभावित करती हैं. हालांकि शिक्षा और शहरीकरण बढ़ने के साथ यहां भी धीरे-धीरे बदलाव देखने को मिल रहा है.

आम लोगों के लिए इसका मतलब यह है कि आने वाले वर्षों में इन राज्यों में स्कूलों, स्वास्थ्य सेवाओं, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं की मांग लगातार बढ़ती रहेगी.

दूसरी तरफ क्यों घट रही है जन्मदर?

दिल्ली, सिक्किम, गोवा, केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में तस्वीर बिल्कुल अलग है. यहां महिलाएं औसतन एक से डेढ़ बच्चे ही जन्म दे रही हैं. इसके पीछे एक बड़ा कारण बदलती जीवनशैली है. आज युवा दंपति पहले करियर बनाना चाहते हैं, आर्थिक स्थिरता हासिल करना चाहते हैं और उसके बाद परिवार बढ़ाने का फैसला लेते हैं. महंगी शिक्षा, स्वास्थ्य खर्च और शहरों में बढ़ती जीवन लागत भी परिवार के आकार को प्रभावित कर रही है. यही वजह है कि कई परिवार अब दो बच्चों की जगह एक बच्चे तक सीमित रहना पसंद कर रहे हैं.

जनसंख्या कम होना भी क्यों बन सकता है चुनौती?

अक्सर कम जन्मदर को अच्छी खबर माना जाता है, लेकिन इसके कुछ दूसरे पहलू भी हैं. अगर किसी राज्य में लंबे समय तक बहुत कम बच्चे पैदा होते हैं, तो भविष्य में वहां काम करने वाली युवा आबादी घट सकती है. इसका असर उद्योगों, अर्थव्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ सकता है. जापान, दक्षिण कोरिया और कई यूरोपीय देश पहले से इस चुनौती का सामना कर रहे हैं. जिस पर अब भारत के कुछ राज्य भी ध्यान देने लगे हैं. आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में बढ़ती उम्र वाली आबादी और घटती जन्मदर को भविष्य की आर्थिक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है.

भारत की आबादी अब किस दिशा में बढ़ रही है?

राष्ट्रीय स्तर पर भारत की कुल प्रजनन दर अब लगभग 2 के आसपास पहुंच चुकी है. यह उस स्तर के करीब है जिसे जनसंख्या स्थिर बनाए रखने के लिए जरूरी माना जाता है. इसका मतलब है कि भारत अब उस दौर में प्रवेश कर रहा है जहां आबादी तेजी से बढ़ने के बजाय धीरे-धीरे संतुलित होने लगेगी. हालांकि राज्यों के बीच बड़ा अंतर अभी भी मौजूद है. कुछ राज्यों में युवा आबादी तेजी से बढ़ रही है, जबकि कुछ जगहों पर जनसंख्या वृद्धावस्था की ओर बढ़ रही है.

परिवारों की बदलती सोच ने बदल दी तस्वीर

इस बदलाव के पीछे सिर्फ सरकारी नीतियां नहीं हैं. परिवारों की सोच भी तेजी से बदली है. पहले जहां अधिक बच्चों को आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा माना जाता था, वहीं अब माता-पिता कम बच्चों को बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन स्तर देने पर जोर दे रहे हैं. यानी भारत की जन्मदर की कहानी केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है. यह बदलती जीवनशैली, बढ़ती महत्वाकांक्षाओं, आर्थिक दबाव और भविष्य की योजनाओं की भी कहानी है.

भारत में जनसंख्या को लेकर तस्वीर पहले जितनी सरल नहीं रही. कुछ राज्यों में अब भी जन्मदर ऊंची है, जबकि कई राज्यों में यह तेजी से गिर रही है. आने वाले वर्षों में यही अंतर देश की अर्थव्यवस्था, रोजगार बाजार, शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक ढांचे को प्रभावित करेगा. इसलिए जन्मदर का यह बदलाव केवल जनसंख्या का विषय नहीं, बल्कि भारत के भविष्य की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण संकेत है.

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