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डिजिटल फ्रेंड्स या रियल दोस्त? सोशल मीडिया की चकाचौंध में क्यों पीछे छूट रहे हैं अपने?

इस डिजिटल युग में, हमारी दोस्ती 'लाइक', 'कमेंट' और 'फॉलोअर्स' तक सिमट गई है, वहीं असली रिश्तों का महत्व कहीं खोता जा रहा है। सोशल मीडिया ने हमें लाखों 'डिजिटल फ्रेंड्स' दिए हैं, लेकिन क्या ये रिश्ते सच में गहरे हैं? आइए, इस आर्टिकल में हम आपको बताते हैं.

डिजिटल फ्रेंड्स या रियल दोस्त? सोशल मीडिया की चकाचौंध में क्यों पीछे छूट रहे हैं अपने?
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जमाना बहुत बदल चुका है. डिजिटल दुनिया में आजकल लोगों के फेसबुक फ्रेंड और इंस्टाग्राम फ्रेंड बनने लगे हैं. रियल बॉन्ड तो जैसे खो ही गई है. लोग घंटो डिजिटल दोस्ती के लिए वक्त निकलते हैं. तस्वीरों पर लाइक्स और कॉमेंट्स करते हैं, लाइव सेशन से जुड़ते हैं. कोई तस्वीरों को लाइक और शेयर कर दे, तो इसी में खुश हो जाते हैं. क्या सच में लाइक्स पाना और फॉलोअर बढ़ाना ही दोस्ती है? असली जुड़ाव कुछ नहीं है. आइए, इस बारे में, नई दिल्ली के आर्टेमिस लाइट एनएफसी के वरिष्ठ सलाहकार एवं प्रमुख मनोचिकित्सा डॉ. राहुल चंडोक से जानते हैं.

डिजिटल फ्रेंड्स या रियल दोस्त कौन है बेहतर?

आजकल के युवा सोशल मीडिया पर दोस्त बनना बहुत ही अच्छा समझते हैं, क्योंकि यह आसान है. बस आपको एक बटन क्लिक करके किसी को फॉलो करना है, उसके तस्वीरों पर लाइक कर कमेंट करना है और आप चैट भी करते हैं. आपका सोशल फ्रेंड आपके सुख-दुख में साथ नहीं होता है. आपकी भावनाओं को गहराई से समझने की कोशिश नहीं करत सकता है. आपको यह भी नहीं मालूम होता है कि वह कौन है? कहां से है? उसकी असली पहचान क्या है और तो और वह कभी भी गायब हो सकता है. ऐसे दोस्त जरूरत के समय साथ नहीं आ पाते हैं. डिजिटल दोस्ती खुशी तो देती है, लेकिन असली सहारा कभी नहीं बन सकती है. कई बार तो डिजिटल दोस्ती के चलते हम अपने रियल बॉन्ड को ही खो देते हैं.

जीवन में सच्चा दोस्त क्यों जरूरी है?

इसका एक फायदा ये भी है कि आप डजिटली एसे लोगों सो जुड़ते हैं, जिनसे आपकी शौक और रुचियां मिलती है, आप भले ही उन्हें व्यक्तिगत रूप से न मिलें हो, लेकिन कई बार आपको काफी कुछ सीखने का मौका मिलता है.

वहीं, असली रिश्ते से शायद आपकी मुलाकात रोज ना हो, बातें रोज ना हो लेकिन वह आपकी हर उतार चढ़ाव में साथ देते हैं. आपकी परेशानियों को अपना समझ कर सुनते हैं, बिना दिखावे की मदद करते हैं. कठिन समय में अगर उनके साथ मिल जाए तो मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य मजबूत बनता है. असली रिश्तो में समय, धैर्य और सच्चा जुड़ाव होता है, जो सोशल मीडिया के लाइक से कहीं ज्यादा असरदार होता है. डिजिटल दोस्ती समय की जरूरत है, लेकिन असली रिश्ते जीवन की सबसे बड़ी ताकत है.

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