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मिलिए, बिहार चुनाव में शामिल उन 5 पावरफुल महिलाओं से जिन्होंने बिना गॉडफादर के राजीनित में रखा है कदम 

महिलाओं को अब राजनीति में आने के लिए सीढ़ी की जरूरत नहीं, बिहार की राजनीति में उतरीं ये 5 महिलाएं साबित करती हैं कि महिलाएं राजनीति में बिना किसी गॉडफादर के भी आगे बढ़ सकती हैं.

ऋतु सिंह | Nov 08, 2025, 08:23 AM IST

1.इस बार कुछ महिलाएं बिना किसी राजनीतिक परिवार या "गॉडफादर" के चुनाव लड़ रही हैं

इस बार कुछ महिलाएं बिना किसी राजनीतिक परिवार या "गॉडफादर" के चुनाव लड़ रही हैं
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बिहार विधानसभा का यह चुनाव कई मायनों में दिलचस्प है. जहां दिग्गज अपनी प्रतिष्ठा बचाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं कुछ नए चेहरे भी राजनीति में अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं. गौरतलब है कि इस बार कुछ महिलाएं बिना किसी राजनीतिक परिवार या "गॉडफादर" के चुनाव लड़ रही हैं. ये महिलाएं अपनी मेहनत, संघर्ष और सामाजिक संबंधों के दम पर राजनीति में आई हैं. कोई वकील है, कोई गायिका है, कोई पत्रकार है, तो कोई समाजसेवी. सवाल यह है कि क्या ये महिलाएं बिना किसी राजनीतिक संरक्षण के विधानसभा पहुँच पाएंगी?
 

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2.दिव्या गौतम

दिव्या गौतम
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दीघा (पटना) से भाकपा-माले की उम्मीदवार दिव्या गौतम एक रंगकर्मी, पूर्व पत्रकार और छात्र राजनीति से उभरी एक सक्रिय महिला हैं. उन्हें अक्सर सुशांत सिंह राजपूत की बहन से जोड़ा जाता है, लेकिन वह साफ़ कहती हैं, "मेरा संघर्ष ही मेरी पहचान है, मेरा रिश्ता नहीं."

दिव्या बेरोज़गारी, बाढ़ और शिक्षा जैसे मुद्दों पर ज़ोर दे रही हैं. उनका चुनावी गीत, "परिवर्तन की लहर", सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है. दिव्या गौतम, भाजपा उम्मीदवार संजीव चौरसिया के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ रही हैं. कायस्थ मतदाताओं में असंतोष और जन सुराज जैसे तीसरे मोर्चे की मौजूदगी ने उन्हें मज़बूत स्थिति में ला खड़ा किया है.
 

3.रितु जायसवाल

रितु जायसवाल
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सीतामढ़ी ज़िले की परिहार विधानसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार रितु जायसवाल दूसरी बार चुनाव लड़ रही हैं. राजद महिला मोर्चा की पूर्व अध्यक्ष रितु कभी राजद में एक मज़बूत आवाज़ हुआ करती थीं, लेकिन टिकट न मिलने पर उन्होंने पार्टी से बगावत कर दी थी. उन्होंने कहा था, "मैं महिलाओं के सम्मान के लिए लड़ रही हूँ."

2020 में सिर्फ़ 1,500 वोटों से हारने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी है. इस बार वे निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ रहे हैं और सभी जातियों में अपनी मज़बूत पकड़ बना चुके हैं. यादव, बनिया और मुस्लिम मतदाताओं के बीच उनकी लोकप्रियता ने मुकाबले को रोमांचक बना दिया है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर तेजस्वी यादव तक, सभी इस सीट पर अपने-अपने उम्मीदवारों के लिए प्रचार कर रहे हैं. यानी परिहार सीट अब बिहार की सत्ता की धड़कन बन गई है.
 

4.छोटी कुमारी

छोटी कुमारी
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छपरा विधानसभा क्षेत्र (सारण) से भाजपा प्रत्याशी छोटी कुमारी राजनीति में सादगी और संघर्ष का प्रतीक हैं. 35 वर्षीय छोटी, बिना किसी राजनीतिक विरासत के, सामाजिक कार्यों के ज़रिए पहचान बना चुकी हैं. वे वैश्य समुदाय से आती हैं और लंबे समय से महिला सशक्तिकरण के लिए काम कर रही हैं. उन्हें "क्रिएटिविटी एज़ अ वुमन" के लिए स्विट्जरलैंड की एक संस्था से पुरस्कार भी मिल चुका है.

भाजपा महिला मोर्चा में शामिल होकर उन्होंने संगठनात्मक स्तर पर काम किया. अब पार्टी ने उन्हें एक "नए चेहरे" के रूप में मैदान में उतारा है. वे कहती हैं, "मैं इस क्षेत्र की बेटी और बहन के रूप में काम करूँगी, नेता के रूप में नहीं." छोटी की उम्मीदवारी को एनडीए की महिला सशक्तिकरण रणनीति का एक अहम हिस्सा माना जा रहा है.

 

5.मैथिली ठाकुर 

मैथिली ठाकुर 
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लोकप्रिय गायिका और सोशल मीडिया स्टार मैथिली ठाकुर दरभंगा की अलीनगर सीट से भाजपा उम्मीदवार हैं. 25 साल की मैथिली बिहार की सबसे कम उम्र की उम्मीदवार हैं. वह किसी राजनीतिक परिवार से नहीं हैं, बल्कि संगीत की दुनिया से सीधे राजनीति में आई हैं. उनके गीत "मिथिला का मैग्नेटो" ने उन्हें घर-घर में मशहूर कर दिया है.

अलीनगर में ब्राह्मण-यादव समीकरण के बीच उनकी उम्मीदवारी पर सबकी नज़र है. हालाँकि, राजद उम्मीदवार विनोद मिश्रा भी ब्राह्मण समुदाय से आते हैं. मैथिली कहती हैं, "मैं अलीनगर की बेटी हूँ और अपने लोगों के लिए काम करना चाहती हूँ." जब गाँव के लोग उन्हें "मिथिला की बेटी" कहते हैं, तो वह एक राजनीतिक व्यक्ति से ज़्यादा एक भावुक व्यक्ति बन जाती हैं.

6.इंदु गुप्ता

इंदु गुप्ता
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समस्तीपुर जिले के हसनपुर विधानसभा क्षेत्र से जन सुराज पार्टी की उम्मीदवार इंदु गुप्ता सामाजिक न्याय की एक नई आवाज़ हैं. चालीस वर्षीय इंदु वर्षों से ग्रामीण क्षेत्रों में महिला अधिकारों, शिक्षा और गरीबी उन्मूलन के लिए काम कर रही हैं. प्रशांत किशोर की जन सुराज यात्रा से प्रेरित होकर उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया.
 
हसनपुर में अब जन सुराज, एनडीए और महागठबंधन के बीच त्रिकोणीय मुकाबला है. प्रशांत किशोर ने कहा था, "इंदु जैसी ज़मीनी कार्यकर्ता ही बिहार को बदल सकती हैं." इंदु का गाँव-गाँव घूमना, महिलाओं से जुड़ना और स्वयं सहायता समूहों का गठन करना, उन्हें अलग पहचान देता है.

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