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Chhath Puja: छठ पर्व की पहचान बन चुकी शारदा सिन्हा की आवाज हर दिल में बसी है. उनके गीतों ने भक्ति, मां की ममता और लोक संस्कृति को एक साथ जोड़ा, जो आज भी हर छठ पर गूंजते हैं. आज वे नहीं हैं, फिर भी हर घाट, हर अर्घ्य में उनकी गूंज सुनाई देती है.
Chhath Puja: पहिले पहिल हम कईनी, छठी मईया व्रत तोहार, करिहा क्षमा छठी मईया, भूल-चूक गलती हमार... ये पंक्तियां सिर्फ किसी गीत की नहीं हैं, ये भावना हैं. जैसे ही दीवाली खत्म होती है, ये गीत हमें याद दिलाता है कि अब छठ का पावन पर्व आने वाला है. छठ सिर्फ एक व्रत नहीं, बल्कि हर बिहारी के दिल की धड़कन है. हर साल जब घाटों पर लाखों-करोड़ों परवैतिन (व्रती) एक साथ सूर्य देव को अर्घ्य देने खड़े होते हैं, तो हवा में शारदा सिन्हा जी की आवाज गूंजती है. उनके बिना छठ की कल्पना करना ही मुश्किल लगता है. उनकी आवाज में इतनी मिठास थी कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह बिहार का हो या किसी और राज्य का, उनके गीत सुनकर छठ का असली अर्थ समझ सकता था.
उन्होंने बिहार के लोक गीतों को देश और दुनिया तक पहुंचाया. जब-जब केलवा के पत्तवा पर उगेल सूरज देव... या सोनवा सटकुनिया हो दीनानाथ...जैसे गीत बजते हैं, तो हर दिल में आस्था की लहर दौड़ जाती है. शारदा जी की आवाज में एक अलग ही शांति थी मानो जैसे किसी मां की गोद में मिलने वाली सुकून. पिछले साल जब दिल्ली के AIIMS से उनके निधन की खबर आई, तो पूरे बिहार में एक सन्नाटा छा गया. हर घर, हर घाट, हर गाँव जैसे कुछ पल के लिए रुक गया. ऐसा लगा जैसे छठ की आत्मा ने अपनी धुन खो दी हो. इस साल भी जब छठ की तैयारी शुरू हुई, तो बहुतों के दिल से एक ही बात निकली “इस बार का छठ कुछ अधूरा सा लग रहा है.”
दरअसल, यह त्योहार मिट्टी की खुशबू, मां की ममता और परिवार की एकता से जुड़ा हुआ है. जब घाटों पर दीये जलते हैं, महिलाएं व्रत रखती हैं और सूरज की पहली किरण जल में उतरती है तब लगता है जैसे पूरा संसार एक स्वर में गा रहा हो. उस स्वर का सबसे प्यारा रूप शारदा सिन्हा की आवाज थी. उनकी गायकी की सबसे अहम बात यह थी कि उसमें कोई दिखावा नहीं था. ना ही भारी संगीत, ना कोई आधुनिक तड़क-भड़क. बस एक सादा, सच्चा लोक स्वर. वह अपने गीतों में गाँव की मिट्टी, खेतों की हवा और आंगन की बातें लाती थीं. शारदा जी का संगीत और लोगों की भावनाएं एक-दूसरे से जुड़ी थीं. कई लोग बताते हैं कि जब वे उदास या परेशान होते थे, तो बस उनका कोई छठ गीत सुन लेते थे और दिल को सुकून मिल जाता था. उनकी आवाज में वो ताकत थी जो लोगों के मन से तनाव मिटा देती थी.
छठ के दौरान सिर्फ बिहार ही नहीं, बल्कि दिल्ली, मुंबई, कोलकाता से लेकर विदेशों तक में उनके गीत बजते हैं. अमेरिका, दुबई, लंदन जैसे देशों में रहने वाले बिहारी जब छठ मनाते हैं, तो सबसे पहले शारदा सिन्हा की प्लेलिस्ट चलाते हैं. उनके गीत लोगों को अपने गाँव, अपनी मिट्टी और अपने बचपन की याद दिलाते हैं. उनके गीतों में भक्ति और सरलता थी, जो सीधे दिल को छू जाती थी.
उनकी आवाज ने छठ को सिर्फ त्योहार नहीं रहने दिया, बल्कि वह लोगों के जीवन का हिस्सा बन गई. अक्सर जब मां, दादी या बहनें छठ की तैयारी करती थीं तो नहाय-खाय से लेकर खरना और अर्घ्य तक हर समय पृष्ठभूमि में उनका कोई न कोई गीत चलता था. आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तो लगता है जैसे किसी अपने को खो दिया हो. छठ की वो सुबहें और शामें अब भी खूबसूरत हैं, पर उनमें वो आत्मा जैसी गूंज कहीं खो गई है. घाटों पर लाखों दीये जलते हैं, सूप-दउरा में फल सजते हैं, पर वो मीठी आवाज अब सिर्फ यादों में सुनाई देती है.
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फिर भी, जब भी किसी स्पीकर से उनका गीत बजता है, तो लगता है कि वो अब भी हमारे बीच हैं. उनका संगीत आज भी छठ की हर प्रार्थना का हिस्सा है. वह सिर्फ एक गायिका नहीं थीं, बल्कि बिहार की आत्मा थीं जिन्होंने हमेशा लोक संस्कृति को जिंदा रखा. शारदा सिन्हा हमेशा रहेंगी, हर दीये की रोशनी में, हर गीत की धुन में और हर उस दिल में जो छठ को महसूस करता है.
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