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1992 के भोपाल दंगों में सैकड़ों जानें गईं, पर सोचिए, कर्फ्यू आदेश रोकने वाला असली कारण क्या था? मुख्यमंत्री का पेट! हकीकत जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे. आइए जानते हैं क्या है पूरी कहानी..
मध्य प्रदेश की सियासत में कई अजीबोगरीब किस्से दर्ज हैं, खासकर मुख्यमंत्रियों से जुड़े हुए. किसी पूर्व सीएम के बारे में मशहूर है कि वे अपने ही मंत्रियों को भूल जाते थे. एक बार जब तत्कालीन प्रधानमंत्री उनसे मिलने पहुंचे तो वे मुंह फेरकर सो गए. एक अन्य मुख्यमंत्री ने अपने उत्तराधिकारी को शपथ ग्रहण से पहले ही गंगाजल की कसमें खिलाईं. वहीं एक सीएम ने तो नोटशीट पर ही अपने मंत्री की रिश्वतखोरी लिख दी थी. यहां तक कि एक पूर्व मुख्यमंत्री के बारे में कहा जाता है कि भोपाल में जब सांप्रदायिक दंगों में सैकड़ों जानें जा रही थीं, तब कर्फ्यू लगाने में देरी इसलिए हुई क्योंकि उनका पेट खराब था.
ये किस्सा दिसंबर 1992 का है, जब 6 दिसंबर को अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहा दी गई. इसके बाद देशभर में दंगे भड़क उठे. धार्मिक उन्माद की इस आग में हजारों लोगों की जान गई. सबसे ज्यादा 458 मौतें मुंबई में हुईं, सूरत में 200 और भोपाल में करीब 139 लोग मारे गए.
उस समय एमपी के सीएम सुंदरलाल पटवा थे. भोपाल में दंगे 7 दिसंबर से भड़के. पुराने शहर में हिंदुओं का जुलूस निकल रहा था, जिस पर पथराव हुआ. फिर जहांगीराबाद की सरकारी इमारतों और आसपास के हिंदू परिवारों पर हमले शुरू हो गए. हालात और बिगड़े जब कुछ स्थानीय अखबारों ने गर्ल्स हॉस्टल पर हमले की झूठी खबर छाप दी. देखते ही देखते हिंसा बेकाबू हो गई. उस वक्त भोपाल के एसपी सुभाष अत्रे और कलेक्टर एमए खान तत्काल सीएम आवास पहुंचे ताकि कर्फ्यू लगाने की अनुमति ले सकें, लेकिन उन्हें लंबा इंतजार करना पड़ा.
असल में उस दिन पटवा का पेट बुरी तरह खराब था. वे बार-बार बाथरूम जा रहे थे. इसी कारण कलेक्टर और एसपी बाहर इंतजार करते रहे और शहर में हिंसा बढ़ती रही. काफी देर बाद पटवा ने कर्फ्यू लगाने की मंजूरी दी, लेकिन तब तक हालात बिगड़ चुके थे. नतीजा यह हुआ कि अगले ही दिन यानी 8 दिसंबर को कलेक्टर और एसपी दोनों का तबादला कर दिया गया.
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इसके बाद भोपाल की कमान दुर्ग के एसपी सुरेंद्र सिंह को सौंपी गई. उन्हें लाने के लिए सरकार ने विशेष विमान भेजा. आते ही उन्होंने सख्ती बरतनी शुरू की और धीरे-धीरे शहर में शांति लौटी. हालांकि, पटवा ने कारसेवकों के स्वागत में कोई कसर नहीं छोड़ी. उन्होंने अपने मंत्री बाबूलाल गौर को ही स्टेशन पर तैनात कर दिया ताकि अयोध्या से लौटते कारसेवकों को कोई परेशानी न हो.
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