भारत
तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है. फिल्मों के सुपरस्टार थलपति विजय अब राज्य के नए मुख्यमंत्री बन गए हैं. विजय ने 9 मंत्रियों के साथ शपथ ली, लेकिन उनकी असली चुनौती अब शुरू होती है. गठबंधन राजनीति, जनता की उम्मीदें और प्रशासनिक अनुभव की परीक्षा अब उनकी सरकार के सामने होगी.
फिल्मों में जनता के मसीहा बनने वाले थलपति विजय अब असल जिंदगी में भी सत्ता के सबसे बड़े पद तक पहुंच गए हैं. चेन्नई के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में विजय को राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई, जबकि उनके साथ 9 मंत्रियों ने भी पद और गोपनीयता की शपथ ली. लेकिन इस जीत की कहानी सिर्फ स्टारडम की नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति, गठबंधन और लंबे इंतजार की भी है. दशकों पुराना डीएमके-एआईएडीएमके द्रविड़ एकाधिकार समाप्त हो गया है.
बता दें कि विजय के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण के दौरान भीड़ ने 'सीटी बजाकर पोडू' की आवाजें लगाईं और राहुल गांधी और अभिनेत्री तृषा उपस्थित थे. तमिलनाडु की राजनीति में यह बदलाव इसलिए भी बड़ा माना जा रहा है क्योंकि राज्य लंबे समय से द्रविड़ राजनीति के दो बड़े चेहरों के इर्द-गिर्द घूमता रहा है. ऐसे में एक फिल्म स्टार का सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचना अपने आप में बड़ा राजनीतिक संदेश माना जा रहा है.
मंत्री मंडल के नए चेहरे कौन हैं?
अर्लेकर ने मुख्यमंत्री पद के लिए नामित विजय के नौ मंत्रियों को भी शपथ दिलाया है. नए मंत्रिमंडल में एक महिला मंत्री, एस. कीर्तना भी शामिल हैं. सेंगोत्तैयान, एन. आनंद, निर्मल कुमार और अधव अर्जुन ने शपथ ली है. बाकी बचे मंत्रियों में राजमोहन, मुस्तफा, अरुण राज और वेंकट रामानन शामिल हैं. खबरों के मुताबिक, कांग्रेस गठबंधन के राजेश कुमार और विश्वनाथ को भी मंत्री पद मिल सकते हैं.
फिल्मों में जननायक की भूमिका के बाद अब रियल लाइफ जननायक बने
थलापति विजय पहली बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने हैं. फिल्मों में उन्होंने कई बार राजनीतिक और जननायक की भूमिका निभाई, लेकिन वास्तविक राजनीति में यह उनका पहला मुख्यमंत्री कार्यकाल है. यही वजह है कि उनकी तुलना अब उन फिल्मी सितारों से होने लगी है जिन्होंने दक्षिण भारत की राजनीति में बड़ा प्रभाव छोड़ा था.
हालांकि विजय लंबे समय से सामाजिक मुद्दों और युवाओं से जुड़े अभियानों के जरिए अपनी राजनीतिक जमीन तैयार कर रहे थे. उनकी पार्टी टीवीके ने भी पिछले कुछ वर्षों में युवाओं और शहरी वोटरों के बीच तेजी से पकड़ बनाई.
तमिलनाडु में विजय की राह इतनी आसान नहीं थी
विजय की जीत को सिर्फ लोकप्रियता का नतीजा मानना अधूरा होगा. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उन्हें सत्ता तक पहुंचाने में गठबंधन राजनीति और सत्ता समीकरणों की बड़ी भूमिका रही.
तमिलनाडु में पहले से मजबूत क्षेत्रीय दलों के बीच जगह बनाना आसान नहीं था. विजय की पार्टी के पास अपने दम पर पूर्ण बहुमत का आंकड़ा नहीं था, इसलिए उन्हें सहयोगी दलों का समर्थन जुटाना पड़ा. कांग्रेस समेत कुछ छोटे दलों का समर्थन उनकी सरकार बनाने में अहम माना जा रहा है.
यही वजह है कि विपक्ष अब इसे “गठबंधन और जोड़तोड़ की राजनीति” का परिणाम बताकर सवाल उठा रहा है. हालांकि विजय समर्थकों का कहना है कि यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है और जनता बदलाव चाहती थी.
स्टारडम से सरकार तक का सफर कितना कठिन होगा?
फिल्मों में संवाद बोलना और सरकार चलाना दोनों अलग बातें हैं. यही वजह है कि अब विजय के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता साबित करने की होगी.
तमिलनाडु इस समय बेरोजगारी, उद्योग निवेश, बिजली, शिक्षा और क्षेत्रीय पहचान जैसे कई मुद्दों से जूझ रहा है. युवाओं ने विजय को बदलाव की उम्मीद में समर्थन दिया है, लेकिन अब उन्हें रोजगार और विकास के मोर्चे पर परिणाम भी दिखाने होंगे.
इसके अलावा गठबंधन सरकार में सभी सहयोगियों को साथ लेकर चलना भी आसान नहीं होगा. मंत्री पद और विभागों के बंटवारे को लेकर पहले ही राजनीतिक खींचतान की चर्चा शुरू हो चुकी है.
विजय के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी?
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार विजय के सामने तीन बड़ी चुनौतियां होंगी. पहली, अपनी सरकार को स्थिर बनाए रखना. दूसरी, स्टार इमेज से बाहर निकलकर गंभीर प्रशासक की पहचान बनाना. और तीसरी, जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना.
विजय के समर्थक उन्हें नई पीढ़ी का नेता मानते हैं, लेकिन विपक्ष लगातार उनके प्रशासनिक अनुभव पर सवाल उठा रहा है. ऐसे में हर फैसला अब उनकी राजनीतिक छवि तय करेगा.
तमिलनाडु की राजनीति में क्यों अहम माना जा रहा है यह बदलाव?
तमिलनाडु लंबे समय से पारंपरिक द्रविड़ राजनीति का गढ़ रहा है. ऐसे में विजय का मुख्यमंत्री बनना यह संकेत देता है कि राज्य की राजनीति में नई पीढ़ी और फिल्मी प्रभाव अभी भी बड़ा असर रखते हैं.
हालांकि असली परीक्षा अब शुरू हुई है. जनता ने उन्हें मौका दिया है, लेकिन क्या वह स्क्रीन वाले “जननायक” की छवि को असली शासन में बदल पाएंगे, यह आने वाले महीनों में साफ होगा.
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