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सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल पर दिल्ली पुलिस के हस्तक्षेप से कई सवाल उठे हैं. जानिए भूख हड़ताल की कानूनी स्थिति, सरकार के अधिकार और जबरन इलाज से जुड़े भारतीय कानूनों का लेखा-जोखा.
सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की नई दिल्ली में चल रही भूख हड़ताल ने एक बार फिर लोकतंत्र में 'विरोध के अधिकार' और 'जीवन की सुरक्षा' के बीच की महीन रेखा को चर्चा में ला दिया है. 20 दिनों के लंबे अनशन के बाद दिल्ली पुलिस ने सोनम वांगचुक सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया है. इस घटनाक्रम ने कई कानूनी और नैतिक सवाल खड़े कर दिए हैं. आइए, इसे विस्तार से समझते हैं.
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है. यदि हड़ताल शांतिपूर्ण है और इससे सार्वजनिक व्यवस्था या सुरक्षा को खतरा नहीं है, तो यह अपराध नहीं है. लेकिन, यदि प्रदर्शन से सड़क जाम हो, हिंसा की संभावना हो या सरकारी काम बाधित हो, तो पुलिस कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए हस्तक्षेप कर सकती है.
#WATCH | Delhi: The police took activist Sonam Wangchuk, who had been on a hunger strike at Jantar Mantar for the past 20 days, to the hospital
— ANI (@ANI) July 18, 2026
DCP New Delhi tweeted, "As per orders of Hon’ble High Court and on expert medical advise due to the deteriorating health condition of… pic.twitter.com/o8HxPSzu0f
भारतीय न्याय संहिता और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम के तहत आत्महत्या के प्रयास के प्रति दृष्टिकोण काफी सहानुभूतिपूर्ण और सुधारात्मक हो गया है. भूख हड़ताल अक्सर एक राजनीतिक या सामाजिक विरोध का माध्यम है, न कि जीवन त्यागने की मंशा. इसलिए, हर अनशन को आत्महत्या का प्रयास कहना कानूनी रूप से सही नहीं है. हालाँकि, यदि किसी की स्थिति अत्यंत गंभीर हो और जीवन को तत्काल खतरा हो, तो प्रशासन और डॉक्टर जीवन बचाने के लिए कदम उठा सकते हैं.
यह सबसे जटिल मुद्दा है. संविधान का अनुच्छेद 21 व्यक्ति को अपनी गरिमा और शरीर पर फैसले लेने का अधिकार देता है.
सामान्य तौर पर, एक सक्षम वयस्क व्यक्ति इलाज के लिए मना कर सकता है.
यदि व्यक्ति निर्णय लेने की स्थिति में न हो या बेहोश हो, तो डॉक्टर प्राथमिक कर्तव्य के रूप में जीवन बचाने के लिए उपचार कर सकते हैं.
जबरन खाना खिलाना(फोर्स-फीडिंग) एक संवेदनशील और गंभीर मामला है. इसमें किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, उसकी गरिमा और उसकी सहमति का सीधा संबंध होता है. इस विषय पर कुछ महत्वपूर्ण बिंदु इस प्रकार हैं:
लोकतंत्र में भूख हड़ताल विरोध का एक सशक्त माध्यम माना जाता है, जिसे संविधान द्वारा सुरक्षा प्राप्त है. हालाँकि, यह प्रक्रिया व्यक्ति के स्वास्थ्य प्रभावित कर सकती है, इसलिए इसके कानूनी और नैतिक पहलुओं को समझना बहुत जरूरी है. प्रदर्शनकारियों के मौलिक अधिकार नीचे दिए गए हैं-
अदालतों का रुख हमेशा 'जीवन के अधिकार' और 'व्यक्तिगत स्वतंत्रता' के बीच संतुलन बनाने का रहा है. सरकार को ऐसी परिस्थितियों में संवेदनशीलता, संवाद और कानून के संतुलित प्रयोग की नीति अपनानी चाहिए, ताकि विरोध भी दर्ज हो सके और किसी की जान भी जोखिम में न पड़े. प्रदर्शनकारी के लिए सरकार की ओर से एंबुलेंस, डॉक्टर, प्राथमिक जांच और अस्पताल की व्यवस्था होनी चाहिए. इसके अलावा, उसके परिवार को उसकी स्थिति की जानकारी भी मिलनी चाहिए.
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