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20 दिन अनशन के बाद सोनम वांगचुक अस्पताल में भर्ती! क्या सरकार जबरन इलाज करा सकती है? जानें भूख हड़ताल पर क्या कहता है कानून

सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल पर दिल्ली पुलिस के हस्तक्षेप से कई सवाल उठे हैं. जानिए भूख हड़ताल की कानूनी स्थिति, सरकार के अधिकार और जबरन इलाज से जुड़े भारतीय कानूनों का लेखा-जोखा.

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20 दिन अनशन के बाद सोनम वांगचुक अस्पताल में भर्ती! क्या सरकार जबरन इलाज करा सकती है? जानें भूख हड़ताल पर क्या कहता है कानून

Image Credit: Social Media

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सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की नई दिल्ली में चल रही भूख हड़ताल ने एक बार फिर लोकतंत्र में 'विरोध के अधिकार' और 'जीवन की सुरक्षा' के बीच की महीन रेखा को चर्चा में ला दिया है. 20 दिनों के लंबे अनशन के बाद दिल्ली पुलिस ने सोनम वांगचुक सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया है. इस घटनाक्रम ने कई कानूनी और नैतिक सवाल खड़े कर दिए हैं. आइए, इसे विस्तार से समझते हैं.

क्या भूख हड़ताल कानून के खिलाफ है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है. यदि हड़ताल शांतिपूर्ण है और इससे सार्वजनिक व्यवस्था या सुरक्षा को खतरा नहीं है, तो यह अपराध नहीं है. लेकिन, यदि प्रदर्शन से सड़क जाम हो, हिंसा की संभावना हो या सरकारी काम बाधित हो, तो पुलिस कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए हस्तक्षेप कर सकती है.

क्या इसे 'आत्महत्या की कोशिश' कहा जाएगा?

भारतीय न्याय संहिता और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम के तहत आत्महत्या के प्रयास के प्रति दृष्टिकोण काफी सहानुभूतिपूर्ण और सुधारात्मक हो गया है. भूख हड़ताल अक्सर एक राजनीतिक या सामाजिक विरोध का माध्यम है, न कि जीवन त्यागने की मंशा. इसलिए, हर अनशन को आत्महत्या का प्रयास कहना कानूनी रूप से सही नहीं है. हालाँकि, यदि किसी की स्थिति अत्यंत गंभीर हो और जीवन को तत्काल खतरा हो, तो प्रशासन और डॉक्टर जीवन बचाने के लिए कदम उठा सकते हैं.

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क्या सरकार जबरन इलाज करा सकती है?

यह सबसे जटिल मुद्दा है. संविधान का अनुच्छेद 21 व्यक्ति को अपनी गरिमा और शरीर पर फैसले लेने का अधिकार देता है. 
सामान्य तौर पर, एक सक्षम वयस्क व्यक्ति इलाज के लिए मना कर सकता है.
यदि व्यक्ति निर्णय लेने की स्थिति में न हो या बेहोश हो, तो डॉक्टर प्राथमिक कर्तव्य के रूप में जीवन बचाने के लिए उपचार कर सकते हैं.

क्या जबरन खाना खिलाना गैरकानूनी है?

जबरन खाना खिलाना(फोर्स-फीडिंग) एक संवेदनशील और गंभीर मामला है. इसमें किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, उसकी गरिमा और उसकी सहमति का सीधा संबंध होता है. इस विषय पर कुछ महत्वपूर्ण बिंदु इस प्रकार हैं:

  • यह निर्णय कभी भी प्रशासनिक दबाव या राजनीतिक फायदे के लिए नहीं लिया जाना चाहिए. डॉक्टरों के लिए चिकित्सा नैतिकता का पालन करना सबसे जरूरी है.
  • उपचार शुरू करने से पहले यह जांचना आवश्यक है कि क्या वह व्यक्ति सही फैसले लेने की मानसिक स्थिति में है. उसकी अपनी इच्छा क्या है और उसकी शारीरिक स्थिति कितनी नाजुक है.
  • चिकित्सा हस्तक्षेप को हमेशा एक 'अंतिम विकल्प' के रूप में देखा जाना चाहिए. यदि मरीज की जान बचाने के लिए कोई दूसरा और कम आक्रामक विकल्प है, तो उसे पहले अपनाना चाहिए.
  • किसी को जबरन खाना खिलाने का एकमात्र उद्देश्य उसकी जान बचाना होना चाहिए, न कि किसी विरोध प्रदर्शन को दबाना. चिकित्सा का उपयोग कभी भी किसी को प्रताड़ित करने, अपमानित करने या उसके लोकतांत्रिक अधिकारों के दमन के लिए नहीं किया जा सकता है.

अनशनकारी के पास क्या-क्या अधिकार हैं?

लोकतंत्र में भूख हड़ताल विरोध का एक सशक्त माध्यम माना जाता है, जिसे संविधान द्वारा सुरक्षा प्राप्त है. हालाँकि, यह प्रक्रिया व्यक्ति के स्वास्थ्य प्रभावित कर सकती है, इसलिए इसके कानूनी और नैतिक पहलुओं को समझना बहुत जरूरी है. प्रदर्शनकारियों के मौलिक अधिकार नीचे दिए गए हैं- 

  • विरोध और अभिव्यक्ति: अपनी जायज मांगों को शांतिपूर्ण तरीके से रखने और मुखर होने का पूर्ण अधिकार.
  • गरिमापूर्ण व्यवहार: प्रदर्शन के दौरान प्रशासन द्वारा मानवाधिकारों का सम्मान और गरिमा के साथ व्यवहार किया जाना.
  • चिकित्सकीय सहायता: निरंतर स्वास्थ्य निगरानी, नियमित मेडिकल चेकअप और विशेषज्ञ परामर्श का अधिकार.
  • कानूनी सुरक्षा और सूचना: गिरफ्तारी जैसी स्थिति में अपने अधिकारों की स्पष्ट जानकारी पाना और तुरंत अपने परिजनों व कानूनी सलाहकार (वकील) को सूचित करने की स्वतंत्रता.
  • शारीरिक सुरक्षा: किसी भी प्रकार के अनुचित बल प्रयोग या अपमानजनक आचरण से सुरक्षा पाने का अधिकार.

सरकार की क्या-क्या जिम्मेदारियां होनी चाहिए?

अदालतों का रुख हमेशा 'जीवन के अधिकार' और 'व्यक्तिगत स्वतंत्रता' के बीच संतुलन बनाने का रहा है. सरकार को ऐसी परिस्थितियों में संवेदनशीलता, संवाद और कानून के संतुलित प्रयोग की नीति अपनानी चाहिए, ताकि विरोध भी दर्ज हो सके और किसी की जान भी जोखिम में न पड़े. प्रदर्शनकारी के लिए सरकार की ओर से एंबुलेंस, डॉक्टर, प्राथमिक जांच और अस्पताल की व्यवस्था होनी चाहिए. इसके अलावा, उसके परिवार को उसकी स्थिति की जानकारी भी मिलनी चाहिए.

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