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Sonam Wangchuk Family Tree: सोनम वांगचुक के परिवार में कौन-कौन हैं, आइए हम आपको बताते हैं. साथ ही, उनकी पत्नी गीतांजलि जे. आंग्मो, पिता सोनम वांग्याल के राजनीतिक सफर और लद्दाख के लिए उनके योगदान की पूरी जानकारी इस लेख में आपको मिल जाएगी.
लद्दाख के प्रसिद्ध शिक्षा सुधारक और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक इन दिनों अपने अनशन और सामाजिक मुद्दों के कारण चर्चा में हैं. उनकी प्रोफेशनल लाइफ, खासकर '3 इडियट्स' के 'रैंचो' की प्रेरणा के रूप में उनकी पहचान जगजाहिर है, लेकिन सोनम वांगचुक के व्यक्तिगत जीवन और परिवार के बारे में जानने की जिज्ञासा भी लोगों में कम नहीं है.
सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे. आंग्मो हैं. वह एक समर्पित शिक्षाविद्, सामाजिक उद्यमी और 'हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स, लद्दाख' (HIAL) की सह-संस्थापक एवं निदेशक हैं. गीतांजलि लंबे समय से लद्दाख में नवाचार-आधारित शिक्षा (Innovation-based education) को बढ़ावा देने के लिए सोनम वांगचुक के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं. शिक्षा को व्यावहारिक और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप ढालने की उनकी दृष्टि उन्हें एक आदर्श साथी बनाती है.

सोनम वांगचुक के परिवार में उनकी पत्नी के अलावा, माता-पिता और 3 भाई हैं. सोनम वांगचुक चार भाइयों में सबसे छोटे हैं. उनके सबसे बड़े भाई का नाम फुंशुक वांगचुक है. बात इनके बच्चे की करें तो सोनम वांगचुक और उनकी पत्नी का अपना कोई संतान नहीं है.
सोनम वांगचुक की पहली शादी अमेरिकी नागरिक रेबेका नॉर्मन के साथ हुई थी, जो बाद में कानूनी रूप से तलाक में बदल गई.
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सोनम वांगचुक का जन्म लद्दाख के उलेयटोकपो गांव में हुआ था. उनका परिवार एक समृद्ध राजनीतिक पृष्ठभूमि रखता है. उनके पिता, सोनम वांग्याल, लद्दाख के एक दिग्गज राजनीतिक नेता थे. वे नेशनल कॉन्फ्रेंस और बाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े रहे. 1975 से उन्होंने तत्कालीन जम्मू-कश्मीर सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में लद्दाख क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया था.
सोनम वांग्याल केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि एक प्रखर आंदोलनकारी भी थे. उन्होंने लद्दाख को 'अनुसूचित जनजाति' (ST) का दर्जा दिलाने के लिए दो बार भूख हड़ताल की थी. उनके संघर्ष का परिणाम ही था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी स्वयं लेह पहुंचीं और उनका अनशन तुड़वाया. आज सोनम वांगचुक जिस तरह सामाजिक और पर्यावरणीय अधिकारों के लिए आवाज उठा रहे हैं, वह कहीं न कहीं उन्हें विरासत में मिले उन संस्कारों का हिस्सा है. 1998 में उनका निधन हुआ था.
सोनम वांगचुक की ख्याति केवल एक आंदोलनकारी की नहीं, बल्कि एक ऐसे सुधारक की है जिसने लद्दाख की शिक्षा व्यवस्था को बदल दिया. 1988 में 'SECMOL' (Students' Educational and Cultural Movement of Ladakh) की स्थापना के पीछे उनका मुख्य उद्देश्य लद्दाख के उन 95 प्रतिशत छात्रों की मदद करना था, जो सरकारी परीक्षाओं में असफल हो जाते थे.
उन्होंने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान ही ट्यूशन पढ़ाकर छात्रों को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया था. श्रीनगर के रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज से पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने जो मॉडल पेश किया, उसने छात्रों को किताबी ज्ञान से परे व्यावहारिक दुनिया से जोड़ा. आज सोनम वांगचुक रमन मैग्सेसे पुरस्कार जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजे जा चुके हैं और उनका काम दुनिया भर के लिए एक मिसाल है.
सोनम वांगचुक की मां का नाम सेरिंग वांगमो (Tsering Wangmo) है. वे लद्दाख के प्रमुख नेता थुपस्तान छेवांग की बहन और कुशोक बकुला रिनपोछे की भतीजी हैं. उनके गांव में स्कूल नहीं था. इसलिए उनकी मां ने ही उन्हें 9 साल की उम्र तक घर पर लद्दाखी भाषा में पढ़ाया.
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