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क्यों सुप्रीम कोर्ट ने बताया जबरन नार्को परीक्षण को अवैध? कहा परिणाम स्वीकार्य नहीं

बिना सहमति के अभियुक्तों पर नार्को-विश्लेषण परीक्षण की अनुमति देने वाले उच्च न्यायालय के आदेश को खारिज करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कानून के तहत अनैच्छिक या जबरन परीक्षण की अनुमति नहीं है.

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क्यों सुप्रीम कोर्ट ने बताया जबरन नार्को परीक्षण को अवैध? कहा परिणाम स्वीकार्य नहीं
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बिना सहमति के अभियुक्तों पर नार्को-विश्लेषण परीक्षण की अनुमति देने वाले उच्च न्यायालय के आदेश को खारिज करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि कानून के तहत अनैच्छिक या जबरन परीक्षण की अनुमति नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्वतंत्र और सूचित सहमति के बिना किसी अभियुक्त को नार्को-विश्लेषण से गुजरने के लिए मजबूर करना, संविधान के अनुच्छेद 20(3) के तहत आत्म-दोष के खिलाफ संवैधानिक संरक्षण और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है.

पीठ ने स्पष्ट किया, 'ऐसे अनैच्छिक परीक्षण की रिपोर्ट या इसके परिणामस्वरूप प्राप्त कोई भी जानकारी आपराधिक या अन्य कार्यवाही में साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं है.'

यह आदेश पटना उच्च न्यायालय के उस आदेश के कुछ दिनों बाद आया है जिसमें एक पुलिस अधिकारी द्वारा आपराधिक मामले में सभी आरोपियों और गवाहों को नार्को-विश्लेषण परीक्षण के अधीन करने के लिए प्रस्तुतीकरण को स्वीकार किया गया था. उप-विभागीय पुलिस अधिकारी के प्रस्तुतीकरण को आरोपी द्वारा दायर जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान स्वीकार किया गया.

अपने फैसले में, सर्वोच्च न्यायालय ने सेल्वी और अन्य बनाम कर्नाटक राज्य में अपने ऐतिहासिक 2010 के फैसले की पुष्टि की, जिसमें कहा गया था कि व्यक्तियों को जबरन नार्को-विश्लेषण, पॉलीग्राफ या ब्रेन मैपिंग परीक्षण के अधीन करना असंवैधानिक था. न्यायालय ने दोहराया कि ये तकनीकें, यदि स्वेच्छा से नहीं अपनाई जाती हैं, तो व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आत्म-दोष के विरुद्ध अधिकार का उल्लंघन करती हैं.

सेल्वी मामले में निर्णय में निर्धारित प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय:

अभियुक्त की स्वैच्छिक सहमति के बिना कोई भी झूठ डिटेक्टर या नार्को-विश्लेषण परीक्षण नहीं किया जाएगा.

आरोपी को परीक्षण के कानूनी, भावनात्मक और शारीरिक निहितार्थों के बारे में अवश्य बताया जाना चाहिए.

सहमति पर निर्णय लेने से पहले कानूनी सलाह तक पहुंच प्रदान की जानी चाहिए.

न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष सहमति दर्ज की जानी चाहिए.

पॉलीग्राफ परीक्षणों के लिए एनएचआरसी के दिशा-निर्देशों का पालन किया जाना चाहिए, और नार्को-विश्लेषण और ब्रेन मैपिंग परीक्षणों के लिए भी इसी तरह के प्रोटोकॉल अपनाए जाने चाहिए.

शीर्ष अदालत ने आगे स्पष्ट किया कि अभियुक्त किसी उचित चरण में स्वेच्छा से ऐसा करने का विकल्प चुन सकता है, जैसे कि मुकदमे में बचाव पक्ष के साक्ष्य प्रस्तुत करने के दौरान.

हालांकि, ऐसे मामलों में भी, अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि नार्को-विश्लेषण से गुजरने का कोई अपरिहार्य अधिकार नहीं है. इसने यह भी कहा कि न्यायिक प्राधिकरण को सुरक्षा उपायों और वास्तविक सहमति सहित परिस्थितियों की समग्रता को ध्यान में रखना चाहिए.

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