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वो 25 कदम और इमरजेंसी...सिंधिया परिवार में कलह की शुरुआत का ये रहस्य क्या है!

Scindia Family Conflict: सिंधिया परिवार में पारिवारिक कलह ऐसी थी कि मां ने इकलौते बेटे को वसीयत से बेदखल कर दिया ओर बेटे ने आरोप लगाया कि मां उसे हाथी से कुचलवाना चाहती थीं.

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वो 25 कदम और इमरजेंसी...सिंधिया परिवार में कलह की शुरुआत का ये रहस्य क्या है!

Scindia Family Conflict

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देश के सबसे रईस राजघरानों में शामिल, लेकिन पारिवारिक कलह ऐसी कि मां ने इकलौते बेटे को वसीयत से बेदखल कर दिया. दूसरी ओर बेटे ने आरोप लगाया कि मां उसे हाथी से कुचलवाना चाहती थीं. अमीरी ऐसी कि जिन संपत्तियों को लेकर अदालतों में मामले चल रहे हैं, उनकी अनुमानित कीमत ही करीब 400 अरब रुपये है, लेकिन इसको लेकर विवाद ऐसा कि बुआ और भतीजे के बीच भी कभी सीधे मुंह बात नहीं होती. आप समझ ही गए होंगे कि यहां बात ग्वालियर के सिंधिया परिवार की हो रही है जिसके मौजूदा वारिस केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि सिंधिया परिवार में विवाद की शुरुआत कब हुई थी? ऐसा क्या हुआ कि मां विजयाराजे और बेटे माधवराव सिंधिया के बीच बातचीत तक बंद हो गई? इसकी जड़ में हैं वो 25 कदम जो राजमाता कभी चल नहीं पाईं और माधवराव इस दूरी को कभी पाट नहीं पाए. 

नेपाल में थी माधवराव की ससुराल

सिंधिया परिवार के करीबियों का मानना है कि विजयाराजे सिंधिया और माधवराव सिंधिया के बीच विवाद का सबसे बड़ा कारण दोनों का अहं था. अहं के टकराव के चलते ही पहले मां और बेटे के सियासी रास्ते अलग हुए और फिर संपत्ति का विवाद शुरू हुआ जो उनकी मौत के बाद भी अदालतों में जारी है. इसकी शुरुआत की एक वजह कांग्रेस सरकार द्वारा लगाई गई इमरजेंसी भी थी जिसके चलते 25 कदमों वाली कहानी वजूद में आई. दरअसल, 1975 में जब इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी का ऐलान किया, तब तक राजमाता जनसंघ की शीर्ष नेताओं में शामिल हो चुकी थीं. बेटे माधवराव सिंधिया भी सांसद बन चुके थे. वो भी जनसंघ के समर्थन से ही चुने गए थे. इमरजेंसी के दौरान विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी शुरू हुई तो माधवराव नेपाल चले गए, जहां उनकी ससुराल थी. राजमाता को लगा कि संकट के समय बेटे ने उन्हें अकेला छोड़ दिया. यहां से संबंधों में ऐसी गांठ पड़ी कि मामला संपत्ति के बंटवारे और अदालती मुकदमों तक पहुंच गया.

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राजमाता और माधवराव के बीच आंग्रे!

हालांकि, ये कहना कि माधवराव मां को छोड़कर ससुराल चले गए थे, पूरी तरह सत्य नहीं है. खुद राजमाता ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि नेपाल पहुंचकर माधवराव ने उन्हें और तीनों बहनों को भी वहां आने का संदेश भेजा था. राजमाता इससे काफी खुश भी हुई थीं और नेपाल के लिए निकल पड़ी थीं. पुलिस से लुका-छिपी का खेल खेलते हुए वे नेपाल बॉर्डर के करीब पहुंच गई थीं. राजमाता जब बॉर्डर से केवल 25 कदम दूर रह गई थीं, तब उनका मन बदल गया. वे ग्वालियर लौट आईं और सरेंडर कर दिया. उन्हें पहले पचमढ़ी और फिर तिहाड़ जेल में रखा गया. राजमाता का मन अचानक बदलने की वजह सरदार आंग्रे को माना जाता है. राजमाता के निकट सहयोगी रहे आंग्रे की सिंधिया परिवार में अहम भूमिका थी. राजमाता तो कई मामलों में बेटे से भी ज्यादा भरोसा करती थीं. कहा जाता है कि आंग्रे ने राजमाता को चेताया कि नेपाल जाने से सियासी विरोधी उन्हें भगोड़ा बता सकते हैं. इसके बाद उन्होंने ममाधवराव के पास नेपाल जाने का इरादा बदल लिया.

मां-बेटे के बीच अविश्वास

इस घटना के बाद बेटे के प्रति राजमाता का रवैया हमेशा के लिए बदल गया. उन्होंने माधवराव को डरपोक तक कह दिया. माधवराव के मन में भी ये गांठ हमेशा के लिए बैठ गई कि मां उनसे ज्यादा सरदार आंग्रे की बात को तवज्जो देती हैं. साल 1991 में एक इंटरव्यू में माधवराव ने खुलासा किया था कि पारिवारिक मामलों में आंग्रे के हस्तक्षेप का वो विरोध करते थे. एक बार उन्होंने राजमाता से अपने और आंग्रे में से एक को चुनने को कहा. राजमाता ने आंग्रे को चुना था. इसके बाद रिश्तों में कटुता बढ़ती गई. आगे चलकर राजमाता ने कई मौकों पर बेटे के साथ खराब रिश्ते के लिए बहू माधवीराजे सिंधिया को जिम्मेदार बताया. उन्होंने माधवराव सिंधिया की सास का भी नाम लिया. 

संपत्ति विवाद की वजह भी यही

वजह चाहे जो भी रही हो, लेकिन यही आगे चलकर सिंधिया परिवार में संपत्ति के विवाद में तब्दील हो गया. 1984 में मां-बेटे के बीच संपत्ति का आधा-आधा बंटवारा हुआ. मां ने अपनी वसीयतों से बेटे और पोते को बेदखल कर दिया. मामला अदालतों में पहुंचा. राजमाता की मौत के बाद उनकी तीन बेटियां संपत्ति के एक हिस्से पर दावा करती हैं. दूसरी ओर, पारिवारिक परंपरा के आधार पर पहले माधवराव और अब ज्योतिरादित्य सिंधिया पूरी संपत्ति पर अधिकार जताते रहे हैं

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