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Mahua Moitra ने पीएम नरेंद्र मोदी पर कसा तंज, कहा- कोर्ट में झूठ नहीं बोलते थे नेहरू

Mahua Moitra राजद्रोह कानून के खिलाफ हमेशा से मुखर रही हैं. उन्होंने इस कानून को लेकर केंद्र पर जमकर हमला बोला है.

Mahua Moitra ने पीएम नरेंद्र मोदी पर कसा तंज, कहा- कोर्ट में झूठ नहीं बोलते थे नेहरू

तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा. (फाइल फोटो)

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डीएनए हिंदी: सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में एक केस की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा है कि केंद्र सरकार (Modi Government) वह कर रही है जो देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू (Jawahar Lal Nehru) नहीं कर सकते थे. तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा (Mahua Moitra) ने इस बयान पर पलटवार किया है.

उन्होंने कहा, 'आप सही हैं सर. पंडित नेहरू कोर्ट में झूठ नहीं बोल सकते थे. अपने देश के लोगों की जासूसी नहीं करा सकते थे. निर्दोषों को गिरफ्तार नहीं करा सकते थे. अपने विरोधियों को बिना किसी उचित प्रक्रिया के लॉकअप में नहीं भेज सकते थे. लिस्ट बहुत लंबी है.'

क्यों हुआ कोर्ट में जवाहर लाल नेहरू का जिक्र?

तुषार मेहता दरअसल मंगलवार को कांग्रेस के सीनियर नेता और वकील कपिल सिब्बल के साथ कोर्ट में बहस कर रहे थे. कोर्ट में राजद्रोह कानून पर सुनवाई चल रही थी. कांग्रेस नेता ने इसे खत्म करने की वकालत करते हुए कहा था कि पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि राजद्रोह का प्रावधान अप्रिय है, हम इसे जितनी जल्दी बाहर निकालें उतना ही अच्छा होगा. अब तुषार मेहता के बयान पर टीएमसी नेता ने मोदी सरकार को घेरने की कोशिश की है.

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चीफ जस्टिस की अगुवाई वाले तीन जजों की बंच राजद्रोह से जुड़े एक केस की सुनवाई कर रही है. यह याचिका एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की है. याचिका में महुआ मोइत्रा समेत कई नेताओं ने राजद्रोह कानून को खत्म करने की अपील की है.

बहस के दौरान कपिल सिब्बल ने तुषार मेहता के बयान पर आपत्ति जताई और कहा कि, नहीं, कभी नहीं. आप कानून का समर्थन कर रहे हैं. आप कह रहे हैं राजद्रोह कानून में सबकुछ ठीक है. कपिल सिब्बल ने यह भी कहा था कि लगाव को पैदा नहीं किया जा सकता है. हर किसी को असहमति की आजादी मिलनी चाहिए. तब तक, जब तक कि यह हिंसा को न उकसावा दे. यह अधिकार है कि मैं केंद्र सरकार से अलग राय रख सकता हूं.

क्या चाहती है केंद्र सरकार?

केंद्र सरकार की मांग है कि राजद्रोह के आरोप में प्राथमिकी दर्ज करना बंद नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह प्रावधान एक संज्ञेय अपराध से संबंधित है और 1962 में एक संविधान पीठ ने इसे बरकरार रखा था. केंद्र ने राजद्रोह के लंबित मामलों के संबंध में न्यायालय को सुझाव दिया कि इस प्रकार के मामलों में जमानत याचिकाओं पर जल्द सुनवाई की जा सकती है.

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केंद्र सरकार का तर्क है कि सरकार हर मामले की गंभीरता से वाकिफ नहीं हैं और ऐसे मामले आतंकवाद, मनी लॉन्ड्रिंग जैसे पहलुओं से जुड़े हो सकते हैं. कोर्ट ने केंद्र सरकार को राजद्रोह कानून पर फिर से विचार करने का आदेश दिया है. 

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