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Lucknow News: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में टूरिस्ट्स के लिए वैसे तो बहुत सारे स्पॉट्स हैं, लेकिन बड़े और छोटे इमामबाड़ा को सबसे बडा आकर्षण माना जाता है.
Lucknow News: देश में वक्फ बोर्ड की संपत्तियों को लेकर छिड़े विवाद के बीच लखनऊ में एक नया मुद्दा गर्मा गया है. योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार ने लखनऊ के विश्व प्रसिद्ध छोटे और बड़े इमामबाड़ा को वक्फ संपत्ति मानने से इंकार कर दिया है. राज्य सरकार ने इसे अपने कब्जे में लेने का दावा पेश किया है. यह दावा संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की लखनऊ में हुई बैठक के दौरान पेश किया गया. भाजपा सांसद जगदंबिका पाल के नेतृत्व वाली यह कमेटी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से पेश वक्फ संशोधन अधिनियम 2024 पर पूरे देश में राय लेने के लिए बैठक कर रही है. कमेटी की बैठक मंगलवार को लखनऊ में हुई थी, जिसमें राज्य सरकार के इमामाबाड़ा पर दावा ठोकने के बाद मुस्लिम उलेमा भड़क गए हैं.
क्या कहा है राज्य सरकार ने बैठक में
राज्य सरकार की तरफ से बैठक में मौजूद मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने वक्फ संपत्तियों की सर्वे रिपोर्ट पेश की है. उन्होंने वक्फ बोर्ड के 14,000 हेक्टेयर जमीन पर दावे को लेकर कहा कि इसमें से 11,700 हेक्टेयर जमीन सरकारी है. छोटा और बड़ा इमामबाड़ा भी वक्फ नहीं सरकार की संपत्ति है. सर्वे में संपत्तियों के सबूत वक्फ बोर्ड से मांगे जा रहे हैं. जिन संपत्तियों के सबूत नहीं मिलेंगे, उन पर सरकार कब्जा ले लेगी.
मुस्लिम उलेमाओं ने जताई इस दावे पर कड़ी नाराजगी
बैठक के दौरान राज्य सरकार की तरफ से किए दावे पर मुस्लिम उलेमा भड़क गए हैं. जी न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, दारुल उलूम देवबंद के प्रवक्ता मौलाना सुफियान निजामी ने इसे सस्ती लोकप्रियता पाने का हथकंडा बताया है. उन्होंने कहा कि हम लोग अपने सुझाव दे रहे हैं उसी के बाद बिल पास होगा तब देखा जाएगा कौन संपत्ति किसकी है. मौलाना साहेब अब्बास ने कहा कि 1857 में ईस्ट इंडिया कंपनी का जिन्होंने सपोर्ट किया, उनकी संपत्ति बच गई थी. देश के लिए लड़ने वाले लोगों की संपत्ति को नजूल में डाल दिया गया. आज वक्फ बिल के जरिये हमारी संपत्तियां हड़पी जाएंगी. शिया वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष अली जैदी ने कहा कि बैठक में छोटा इमामबाड़ा और बड़ा इमामबाड़ा के सरकारी संपत्ति नहीं होने को लेकर बैठक में कोई चर्चा नहीं हुई है.
किसने बनवाया था इमामबाड़ा
लखनऊ का बड़ा इमामबाड़ा आलीशान इमारत है, जिसे लखनऊ का भूलभुलैया भी कहते हैं. इसका निर्माण 1784 में अवध के तत्कालीन नवाब आसफ-उद्-दौला ने कराया था. कहा जाता है कि इसमें बाहर निकलने के 1,000 रास्ते हैं, जिनमें से एक ही सही है. इसलिए बिना गाइड के अंदर जाने पर आम आदमी कभी बाहर नहीं निकल सकता.
चूना और उड़द दाल के मिश्रण से बनी हैं दीवारें
लखनऊ के भूलभुलैया का डिजाइन उस समय के मशहूर आर्किटेक्ट हाफिज कियाफत उल्लाह ने तैयार किया था, जिसमें मुगल, राजपूत और गोथिक आर्किटेक्चर का मिला-जुला असर देखने को मिलता है. आपको जानकर हैरानी होगी कि यह विशाल इमारत सीमेंट की चिनाई या पत्थर के खंबों पर नहीं टिका हुआ है बल्कि इसकी दीवारों को चूना और उड़द दाल के मिश्रण से बने गारे से जोड़ा गया है, जो आज भी मजबूती से खड़ी हैं. यह मिश्रण इतना मजबूत है कि इसका सबसे बड़ा हॉल बिना खंबे और बिना बीम के 200 साल बाद भी खड़ा हुआ है.
भूखे लोगों की मदद के लिए हुआ था निर्माण
बड़ा इमामबाड़ा का निर्माण किसी महान इमारत को तैयार करने के मकसद से नहीं हुआ था, बल्कि इसे नवाब आसफ-उद-दौला ने उस साल पड़े अकाल में भूखी मर रही जनता को राहत देने के लिए तैयार किया था. नवाब का मानना था कि जनता को मुफ्तखोरी की आदत नहीं लगनी चाहिए, इसलिए काम के बदले भोजन देने की व्यवस्था की गई.
खुद ही निर्माण तुड़वा देते थे नवाब
इमामबाड़ा 1784 में ही बनकर तैयार हो गया था, लेकिन जनता को लगातार काम देते रहने के लिए नवाब ने अनूठी तरकीब निकाली थी. मजदूर दिन में इमामबाड़े की सजावट से जुड़ा निर्माण करते थे. रात में नवाब ने समाज के अमीर लोगों को दिन में हुए निर्माण को तोड़ने की जिम्मेदारी दी थी ताकि अगले दिन मजदूरों के लिए काम निकल सके. कहते हैं कि यह काम करीब 10 साल तक किया गया, जब तक अकाल के कारण समाज में फैली भुखमरी पूरी तरह दूर नहीं हो गई. इसके कारण नवाब को इमामबाड़ा के निर्माण में 10 लाख रुपये की रकम खर्च करनी पड़ी, जो आज की तारीख में कई करोड़ रुपये के बराबर है.
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