भारत
टेलिकॉम कंपनियां आमतौर पर कॉल डिटेल नहीं देती हैं लेकिन न्यायालय और पुलिस अधिकारी इसे निकलवा सकते हैं.
डीएनए हिंदी: मोबाइल फोन पर अगर बात करते हैं तो संभल जाइए क्योंकि अक्सर लोगों को लगता है कि वह किसी से कुछ भी बात करेंगे और इसकी खबर किसी को नहीं होगी. आपकी बात पुलिस विभाग या कोर्ट कभी भी निकाल सकती है इसलिए हमेशा सोच समझकर ही बात करें. बता दें कि बहुत से अपराधों को साबित करने के लिए कॉल डिटेल (call detail) का इस्तेमाल किया जाता है.
उदाहरण के तौर पर मान लीजिए कि किसी व्यक्ति पर हत्या का मुकदमा चल रहा हो तब ऐसे में पुलिस उसके अपराधों को साबित करने के लिए कॉल डिटेल की सहायता ले सकती है और कोर्ट के सामने कॉल डिटेल पेश करके अपराधों की कड़ियों को खोल सकती है.
कब तक कॉल डिटेल सुरक्षित रहता है?
टेलीकॉम कंपनी ही मोबाइल या लैंडलाइन की सुविधा उपलब्ध करवाती है. यह टेलीकॉम कंपनी अपने उपभोक्ता की सभी जानकारियों से लेकर उनके बात करने के रिकॉर्ड से लेकर अन्य रिकॉर्ड अपने पास रखती हैं. दूरसंचार विभाग (Telecom Department) की घोषणा के मुताबिक सभी टेलीकॉम कंपनियों को 2 साल तक कॉल डिटेल का डेटा रखना अनिवार्य है. हालांकि 2 वर्ष के बाद अगर किसी टेलिकॉम कंपनी को डेटा डिलीट करना होता है तो उसे दूरसंचार विभाग से आज्ञा लेना होगा जिसके बाद ही डेटा डिलीट किया जा सकता है. बता दें कि टेलिकॉम कंपनियों के ऐसे डेटा में किसी भी यूजर का मोबाइल नंबर से लेकर उन्होंने किस-किस नंबर पर कितनी देर तक बात किया है इन सभी की जानकारी होती है. हालांकि भारत के संविधान में राइट टू प्राइवेसी के अंतर्गत इस डिटेल में वॉइस रिकॉर्डिंग नहीं होती है.
किन मुकदमों में कॉल डिटेल की जरुरत पड़ती है
कॉल डिटेल का इस्तेमाल किसी भी केस में किया जा सकता है. इनका इस्तेमाल सिविल और आपराधिक दोनों मुकदमों में किया जा सकत है. हालांकि कॉल डिटेल निकलवाने का हक़ सिर्फ पुलिस अधिकारी और न्यायालय के पास होता है. वहीं अगर कोई व्यक्ति कॉल डिटेल निकलवाना चाहता है तो उसे कोर्ट में इसकी मांग करनी होगी जिसके बाद ही कॉल डिटेल निकाली जाती है. हालांकि सिविल कोर्ट में आप IPC Act 16 आदेश 7 के अंतर्गत एप्लीकेशन देकर भी कॉल डिटेल की मांग कर सकते हैं.