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चोल साम्राज्य की तांबे की प्लेट्स क्यों ले गया था नीदरलैंड्स? जानिए अब तक क्यों रखा संभालकर, कितना ताकतवर था ये राजवंश

भारत के इतिहास के सबसे शक्तिशाली और समृद्ध राजवंशों में से एक चोल साम्राज्य (Chola Dynasty) की ऐतिहासिक तांबे की प्लेटें (ताम्रपत्र) सदियों बाद भारत को वापस मिल गई हैं.

Gaurav Barar | May 18, 2026, 12:35 PM IST

1.नीदरलैंड्स ने लौटाईं चोल साम्राज्य की ऐतिहासिक चीजें

नीदरलैंड्स ने लौटाईं चोल साम्राज्य की ऐतिहासिक चीजें
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में नीदरलैंड्स ने चोल साम्राज्य के जमाने की बेहद ऐतिहासिक और कीमती तांबे की प्लेटें (ताम्रपत्र) भारत को वापस सौंप दी हैं. दुनिया भर में इन्हें लीडेन प्लेट्स (Leiden Plates) और भारत में 'अनाइमंगलम ताम्रपत्र' कहा जाता है. 

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2.संस्कृति के लिए एक बहुत बड़ी जीत

संस्कृति के लिए एक बहुत बड़ी जीत
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11वीं सदी के ये ताम्रपत्र चोल राजाओं की ताकत, उनके राज-काज और समंदर पार तक फैले उनके असर की गवाही देते हैं. सदियों बाद इनका भारत लौटना हमारी संस्कृति के लिए एक बहुत बड़ी जीत है. लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर ये प्लेटें नीदरलैंड पहुंची कैसे थीं और इन्हें वहां इतना संभालकर क्यों रखा गया? 

3.भारत से नीदरलैंड्स कैसे पहुंचीं ये ऐतिहासिक प्लेटें?

भारत से नीदरलैंड्स कैसे पहुंचीं ये ऐतिहासिक प्लेटें?
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यह कहानी आज से करीब 300-350 साल पुरानी है. 17वीं और 18वीं सदी के दौरान भारत के तमिलनाडु वाले तटीय इलाकों पर नीदरलैंड्स की 'डच ईस्ट इंडिया कंपनी' का कब्जा था. 1690 में डचों ने अपना हेडक्वार्टर नागपट्टिनम में शिफ्ट किया था. इतिहासकारों का मानना है कि साल 1687 से 1700 के बीच नागपट्टिनम के आस-पास खुदाई या पुनर्विकास का कुछ काम चल रहा था, तभी ये तांबे की प्लेटें जमीन से मिलीं. 

4.अनमोल खजाने की तरह सुरक्षित रखा

अनमोल खजाने की तरह सुरक्षित रखा
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उस समय वहां फ्लोरेंटियस कैंपर नाम का एक डच मिशनरी (ईसाई धर्म प्रचारक) मौजूद था. वह इन अनोखी प्लेटों को अपने साथ नीदरलैंड्स ले गया. धीरे-धीरे ये प्लेटें यूरोप के विद्वानों के बीच चर्चा का विषय बन गईं और साल 1862-1863 के आसपास इन्हें नीदरलैंड्स की मशहूर 'लीडेन यूनिवर्सिटी' की एशियाई लाइब्रेरी को सौंप दिया गया. वहां की लाइब्रेरी ने इसे 160 से भी ज्यादा सालों तक एक अनमोल खजाने की तरह सुरक्षित रखा.
 

5.क्या लिखा है तांबे की इन प्लेटों पर?

क्या लिखा है तांबे की इन प्लेटों पर?
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ये कोई मामूली प्लेटें नहीं हैं, बल्कि चोल राजाओं का सरकारी दस्तावेज हैं. इस पूरे सेट में कुल 24 प्लेटें हैं, 21 बड़ी और 3 छोटी, जिनका कुल वजन करीब 30 किलोग्राम है. ये सारी प्लेटें एक बड़ी सी कांस्य की अंगूठी से आपस में बंधी हुई हैं, जिस पर चोल राजवंश की शाही मुहर लगी है. 

6.दो भाषाओं में बातें लिखी

दो भाषाओं में बातें लिखी
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इन प्लेटों की सबसे खास बात यह है कि इन पर दो भाषाओं में बातें लिखी हैं. संस्कृत (ग्रंथ लिपि में)- इसमें चोल राजाओं की वंशावली, उनके दादा-परदादाओं के नाम और उनके शानदार इतिहास के बारे में बताया गया है. तमिल लिपि में- इसमें जमीन के दान, टैक्स व्यवस्था, बॉर्डर और लोकल एडमिनिस्ट्रेशन की बेहद बारीक और जटिल जानकारियां दर्ज हैं. 

7.भारत के दूसरे देशों के साथ मजबूत रिश्तों का सबूत

भारत के दूसरे देशों के साथ मजबूत रिश्तों का सबूत
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इन प्लेटों पर लिखा है कि चोल साम्राज्य के महान राजा राजराज चोल प्रथम ने नागपट्टिनम में बने चूड़ामणि विहार नाम के एक बौद्ध मठ को चलाने और उसकी देखरेख के लिए जमीन और टैक्स का दान दिया था. दिलचस्प बात यह है कि इस बौद्ध मठ को इंडोनेशिया के श्रीविजय साम्राज्य के राजा श्री मार विजयोतुंग वर्मन ने बनवाया था. इससे पता चलता है कि उस जमाने में भी भारत के रिश्ते दूसरे देशों से कितने मजबूत थे.

8.कितना ताकतवर था चोल राजवंश?

कितना ताकतवर था चोल राजवंश?
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चोल राजवंश को तमिल इतिहास का स्वर्ण युग माना जाता है. इस वंश की शुरुआत करीब 850 ईस्वी में राजा विजयालय ने तंजावुर पर कब्जा करके की थी. चोल शासक सिर्फ अपनी बहादुरी के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी बेहतरीन नेवी और आलीशान मंदिरों के लिए जाने जाते थे. इस वंश के सबसे प्रतापी राजा राजराज चोल प्रथम (985-1014 ईस्वी) थे, जिन्होंने तंजावुर में विश्व प्रसिद्ध बृहदेश्वर मंदिर बनवाया. भगवान शिव का यह मंदिर वास्तुकला की एक अद्भुत मिसाल है और आज एक यूनेस्को विश्व धरोहर है. 

9.बंगाल की खाड़ी को बना दिया था चोलों की झील

बंगाल की खाड़ी को बना दिया था चोलों की झील
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उनके बेटे राजेंद्र चोल प्रथम तो उनसे भी दो कदम आगे निकले. उन्होंने अपनी ताकतवर नौसेना के दम पर श्रीलंका, मलेशिया और इंडोनेशिया तक अपना परचम लहराया और बंगाल की खाड़ी को चोलों की झील बना दिया था. चोल काल की बनी कांसे की मूर्तियां आज भी दुनिया भर में अपनी कलात्मकता के लिए मशहूर हैं. 

10.महान विरासत की घर वापसी

महान विरासत की घर वापसी
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नीदरलैंड्स की लीडेन यूनिवर्सिटी ने इन प्लेटों को इसलिए संभालकर रखा क्योंकि ये सिर्फ भारत का नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के समुद्री व्यापार और कूटनीति के इतिहास का एक बहुत बड़ा सबूत थीं. आज जब ये प्लेटें भारत वापस आ गई हैं, तो यह हमारी उस महान विरासत की घर वापसी है, जिसने कभी समंदर पार की दुनिया पर राज किया था.

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