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SCO सम्मेलन में से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ हाथ मिलाने की तस्वीर खूब वायरल हो रही है. समझें आखिर क्या निकाले जा रहे इस तस्वीर के मायने...
शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन में शामिल होने चीन गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक तस्वीर इन दिनों खूब वायरल हो रही है. इसमें वे चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ हाथ मिला रहे हैं. भारत और चीन के राष्ट्राध्यक्षों का हाथ मिलाना तस्वीर के वायरल होने के लिए पर्याप्त कारण है, लेकिन इसमें जो खास बात है, वो है रिश्तों में दिख रही गर्माहट. इसे देखकर 1950 के दशक के शुरुआती दिनों की यादें ताजा हो रही हैं जब पंचशील पर समझौते के बाद जवाहरलाल नेहरू और चाऊ एन लाई की तस्वीरें पूरी दुनिया में सुर्खी बनी थीं.
हिंदी-चीनी भाई-भाई के नारे के उस दौर की एक बेहद खूबसूरत तस्वीर है. यह तस्वीर भारत के राष्ट्रपति भवन की है. इसमें भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद, उपराष्ट्रपति एस राधाकृष्णन, प्रधानमंत्री नेहरू के साथ चाऊ एन लाई हैं. चारों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा हुआ है और सभी के चेहरे पर बेफिक्र हंसी है. लेकिन नई तस्वीर से पुराने दिनों के लौटने की उम्मीद कर रहे लोग कोई जल्दबाजी नहीं करें. दोनों देशों के रिश्तों की तासीर ही पल में तोशा पल में माशा वाली रही है. दोस्ती ऐसी कि युद्ध में घायल चीनी सैनिकों के इलाज के लिए वहां गए भारत के डॉ. द्वारकानाथ कोटनिस ताउम्र वहीं रह गए.

मरणासन्न सैनिकों को जीवनदान देते उनका जीवन वहीं गुजर गया. दुश्मनी ऐसी कि दलाई लामा को भारत ने शरण दे दिया तो चीन ने उस पर हमला करने से भी परहेज नहीं किया. कभी तो दोनों शांतिपूर्ण सह अस्तित्व की कसमें खाते हैं और अगले ही पल दोनों के सैनिकों की भिड़ंत हो जाती है. अब एक बार फिर भारत और चीन के बीच दोस्ती का नया अध्याय शुरू हुआ है. अमेरिका के टैरिफ अटैक से परेशान भारत और चीन को एक साथ आने में नई संभावनाएं दिख रही हैं. शंघाई शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वागत को देखकर लगता है चीन भी इस बार भारत को लेकर गंभीर है. लेकिन सवाल है कि क्या हिंदी-चीनी भाई-भाई वाले पुराने दिन लौट सकते हैं.
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आधुनिक काल में भारत और चीन के रिश्तों की शुरुआत 1938 में मानी जाती है जब जापान बार-बार चीन पर हमले कर रहा था. तब भारत ने चीन की मदद के लिए एक मेडिकल टीम भेजी थी जिसमें पांच डॉक्टर थे. डॉ. कोटनीस भी इसमें शामिल थे. हालांकि, आजादी के ठीक पहले दोनों देशों के रिश्ते खराब होने लगे थे. 1947 में आजादी के बाद नेहरू प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने चीन के साथ दोस्ती पर जोर दिया. इसी का नतीजा 29 अप्रैल, 1954 को पंचशील समझौते के रूप में सामने आया. पंचशील के 5 सिद्धांत शांतिपूर्ण सह अस्तित्व पर आधारित थे. यही वो दौर था जब हिंदी-चीनी भाई-भाई भारत की कूटनीति का प्रमुख आधार था.
हालांकि, पंचशील समझौते के करीब पांच साल बाद ही दोनों के रिश्तों में खटास आने लगी. विवाद की वजह बने तिब्बत के धर्मगुरु दलाई लामा. दरअसल, 1959 में जब दलाई लामा को चीन से भागना पड़ा तो उन्हें भारत ने शरण दी. चीन को ये बात नागवार गुजरी. चीन ने इसे अपने अंदरूनी मामलों में दखल माना. इससे गुस्सा होकर चीन ने दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को हवा देना शुरू किया. बातचीत से मामला हल नहीं हुआ तो 20 अक्टूबर, 1962 को चीन ने भारत पर हमला कर दिया. ये हमला भारत की सीमा से ज्यादा उसके भरोसे पर हुआ था. इसके बाद पंचशील समझौता खत्म हो गया और दोनों देशों के बीच अविश्वास की ऐसी खाई पैदा हो गई, जो आज तक खत्म नहीं हुई है.
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सीमा को लेकर दोनों देशों के बीच विवाद अब भी बना हुआ है. भारत के खिलाफ चीन, पाकिस्तान की मदद भी करता रहा है. 2020 में लद्दाख की गलवान घाटी में भारत और चीनी सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई थी. इसमें भारत के 20 जवान शहीद हो गए थे. इस घटना के बाद से दोनों देशों के रिश्ते लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं. इसके बाद दोनों देशों ने नियंत्रण रेखा पर अपनी सेना बढ़ा दी थी. भारत ने चीन के लिए वीजा और फ्लाइट सर्विस भी रोक दी थी. गलवान घाटी की झड़प के बाद कई दौर की बातचीत हुई. कुछ इलाकों से सैनिक भी हटाए गए, लेकिन तल्खी बनी रही. विवादों को सुलझाने के लिए इससे पहले 1993, 1996 और 2005 में भी समझौते हुए थे, लेकिन इनका पूरी तरह से पालन नहीं किया गया.
शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन के दौरान पीएम मोदी और शी जिनपिंग के बीच रविवार को हुई द्विपक्षीय बैठक एक नई शुरुआत जरूर है. इसकी वजह यह है कि इस बातचीत के मूल में दोनों देशों के व्यावसायिक हित हैं. सीमा विवाद और अन्य मुश्किलों की चर्चा जरूर हुई है, लेकिन इस मुलाकात की पृष्ठभूमि में अमेरिका का टैरिफ अटैक है जिसके भुक्तभोगी दोनों देश हैं. अब दोनों को लग रहा है कि अमेरिका की दादागिरी से मुकाबले के लिए उन्हें एक साथ आना होगा. मौजूदा दौर में कूटनीति का निर्धारण अर्थनीति से होता है. यदि दोनों देश व्यावसायिक हितों का ध्यान रखकर आपसी रिश्तों को बेहतर बनाने की कोशिश करें तो हिंदी-चीनी भाई-भाई के दिन वास्तव में लौट सकते हैं.
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