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सरवानंद कौल प्रेमी हों या सरला भट, ये हत्याएं सिर्फ मर्डर नहीं थीं, बल्कि एक साजिश का हिस्सा थीं. जनवरी 1990 के बाद से वकील टिक्का लाल तापलू, हाई कोर्ट के जस्टिस नीलकंठ गंजू और दूरदर्शन के प्रसारक लस्सा कौल समेत प्रमुख कश्मीरी पंडितों के टारगेटेड मर्डर एक के बाद एक तेजी से होते गए.
जम्मू-कश्मीर में 90 के दशक में जब आतंकवाद शुरू हुआ तो कश्मीरी पंडितों को घर से निकाल-निकालकर मारा गया. घाटी में हुई इस त्रासदी के बाद कश्मीरी पंडितों को अपना घर छोड़ना पड़ा था. ऐसा ही एक नाम था- कवि सरवानंद कौल प्रेमी का. जिन्हें बेटे वीरेंद्र कौल के साथ घर से घसीटकर मार दिया गया था. अब इस मामले में आरोपियों को पकड़ने के लिए जम्मू-कश्मीर की जांच एजेंसी एसआईए ताबड़तोड़ छापे मार रही है.
एजेंसी ने बुधवार को जम्मू-कश्मीर में 9 जगहों पर एक साथ छापेमारी की. राजौरी के अलग-अलग इलाकों में 6, जम्मू में 2 और कश्मीर में एक जगह पर रेड मारी गई. यह कार्रवाई अनंतनाग जिले के दुरू पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर को लेकर की गई, जिसमें एसआईए ने कश्मीरी पंडितों को टारगेट बनाने वाली अनसुलझी हत्याओं की जांच को अपने हाथ में ले लिया है. अधिकारियों ने बताया कि उन प्रॉपर्टीज और लोगों को टारगेट बनाया गया है, जिनके बारे में माना जाता है कि वे 1990 के अपहरणों के पीछे की साजिश से जुड़े थे. हालांकि छापेमारी के दौरान बरामद की गई सटीक जगहों और किसी भी बरामदगी का अभी तक आधिकारिक तौर पर खुलासा नहीं किया गया है.
घाटी का वो कवि, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन में भी लिया था भाग
सरवानंद कौल प्रेमी अनंतनाग के कोकरनाग जिले के सोआफ शाली गांव में रहते थे. प्रेमी को साल 1990 में उनके बेटे के साथ घर से ही अगवा कर लिया गया और उन्हें यातनाएं दी गईं. बाद में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई. इतना ही नहीं दोनों के शव बाद में एक पेड़ से लटके हुए मिले थे. इस हत्या ने घाटी में रहने वाले कश्मीरी पंडितों के अंदर खौफ पैदा कर दिया और वहां से उन्हें भागने के लिए मजबूर कर दिया. प्रेमी को जम्मू-कश्मीर के सबसे सम्मानित साहित्यकारों में से एक माना जाता था, जिन्होंने एक विद्वान-कवि के रूप में दशकों तक राष्ट्रीय एकता, सांप्रदायिक सद्भाव और कश्मीरी भाईचारे को लेखन और अभियानों के जरिए बनाए रखने में मदद की थी. वह एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी थे, जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था. इसके लिए उनकी हत्या और भी गंभीर हो जाती है.
प्रेमी के दूसरे बेटे का आया रिएक्शन
प्रेमी के दूसरे बेटे राजेंदर ने छापेमारी का स्वागत करते हुए उम्मीद जताई कि सभी मामलों को इसी तरह निपटाया जाएगा. उन्होंने कहा, 'मेरे पिता और मेरे छोटे भाई का अपहरण कर उनकी हत्या कर दी गई. हम सभी इन छापों का समर्थन करते हैं. जब 1990 में मेरे पिता और भाई के अपहरण और हत्या की खबर फैली तो कई लोगों ने कहा कि यह 'कश्मीरियत' की हत्या है. कई लोगों ने कहा कि यह धर्मनिरपेक्ष विश्वास के साथ विश्वासघात है. कई लोगों ने कहा कि यह मानवता की हत्या है. मैं राज्य सरकार से अपील करता हूं कि सभी मामलों को त्वरित और प्रभावी जांच के लिए एसआईए को सौंप दिया जाए. यह खबर सुनकर मैं भावुक हो जाता हूं. मैं चाहता हूं कि सभी को न्याय मिले. मैं चाहता हूं कि सभी अपराधियों को न्याय के कटघरे में लाया जाए और अपराधियों को सजा दी जाए.'
सरला भट किडनैपिंग-मर्डर में चार्जशीट के बाद SIA का एक्शन
कश्मीरी पंडितों से जुड़े एक मामले में सफलता के बाद ये कार्रवाई एसआईए की ओर से हुई है. जून 2026 में एसआईए ने नर्स सरला भट के अपहरण, टॉर्चर और मर्डर से जुड़े केस में 737 पेजों की चार्जशीट दायर की थी, जिसमें यासीन मलिक को मुख्य साजिशकर्ता बताया था. यह मामला 34 साल तक ठप पड़ा रहा है, बाद में फिर खोला गया. सरला पंडित, उन कुछ कश्मीरी पंडित महिलाओं में से एक थीं, जो घाटी में अराजकता के चरम पर पहुंचने के बावजूद ड्यूटी पर तैनात थीं. 18 अप्रैल को श्रीनगर में सरला भट का अपहरण कर लिया गया था और फिर गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई थी.
कश्मीरी पंडितों को आतंकियों ने क्यों किया था टारगेट?
सरवानंद कौल प्रेमी हों या सरला भट, ये हत्याएं सिर्फ मर्डर नहीं थीं, बल्कि एक साजिश का हिस्सा थीं. जनवरी 1990 के बाद से वकील टिक्का लाल तापलू, हाई कोर्ट के जस्टिस नीलकंठ गंजू और दूरदर्शन के प्रसारक लस्सा कौल समेत प्रमुख कश्मीरी पंडितों के टारगेटेड मर्डर एक के बाद एक तेजी से होते गए. इन हत्याओं का उद्देश्य दहशत फैलाना और पूरे समुदाय को पलायन के लिए मजबूर करना था.
घाटी में करीब 2000 कश्मीरी पंडितों की हुई थी हत्या
सामुदायिक संगठनों का अनुमान है कि 1989 के बाद के सालों में 1,500 से 2,000 कश्मीरी पंडितों की हत्या कर दी गई थी. हालांकि इसका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड मौजूद नहीं है. इस कमी का कारण लगातार आने वाली राज्य सरकारों की उदासीनता को माना जाता है. घाटी से करीब पांच लाख कश्मीरी पंडित विस्थापित हुए, जो स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े आंतरिक पलायनों में से एक है. पंडित समूह सालों से हत्याओं और विस्थापन की औपचारिक जांच के लिए एक आयोग की मांग कर रहे हैं.
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