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एक समारोह में उमा भारती ने अचानक ऐसा खुलासा कर दिया कि बीजेपी और आरएसएस के बड़े नेताओं के होश उड़ गए. आखिर उन्होंने मंच से क्या कह दिया था जिसने उनके करियर की दिशा बदल दी? आइए जानते हैं क्या है पूरा किस्सा..
गुड रिडेंस- यही शब्द थे सुषमा स्वराज के जब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से उमा भारती के इस्तीफे की खबर आई थी. केवल सुषमा ही नहीं, बीजेपी और आरएसएस के कई बड़े नेताओं के मन में उस दिन शायद यही भाव रहे होंगे. अच्छा हुआ कि मुक्ति मिली. दरअसल, ये बेहद चौंकाने वाला था क्योंकि इसके करीब एक साल पहले ही उमा भारती ने मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह को सत्ता से बेदखल कर मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल की थी. इसके बाद उन्हें बीजेपी के युवा तुर्कों में गिना जाने लगा था. फिर ऐसा क्या हुआ कि एक साल के अंदर ही पार्टी का उनके प्रति रवैया बदल गया और बड़े नेता उनके इस्तीफे को लेकर राहत महसूस कर रहे थे. इसकी वजह है एक तारीख जिसके बाद उमा भारती का सियासी करियर हमेशा के लिए बदल गया.
30 जून 2004 वो दिन जब बलराम जाखड़ एमपी के गवर्नर बने थे. उनके शपथ ग्रहण के ठीक बाद भोपाल के रविंद्र भवन में एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम था. मुख्यमंत्री के रूप में उमा भारती भी आमंत्रित थीं. उनके अलावा बीजेपी के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष कैलाश जोशी, संगठन मंत्री कप्तान सिंह सोलंकी, गोविंदाचार्य और पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर भी समारोह में मौजूद थे. जब उमा के संबोधन की बारी आई तो उन्होंने शुरुआत किताब और उसके लेखक से की. फिर वो अचानक गोविंदाचार्य के साथ अपने रिश्तों की चर्चा करने लगीं. लोग कुछ समझ पाते, इससे पहले ही उमा ने पूरा किस्सा सुना दिया कि गोविंदाचार्य ने उन्हें शादी का प्रपोजल दिया था.
उमा ने बताया कि गोविंदाचार्य ने 1991 के लोकसभा चुनावों के बाद उन्हें शादी का प्रस्ताव दिया था. उमा ने अपने भाई स्वामी प्रसाद लोधी को प्रस्ताव के बारे में बताया, लेकिन उन्होंने इसे खारिज कर दिया. इसके करीब एक साल बाद नवंबर 1992 में उमा ने संन्यास ले लिया था. तब उनकी उम्र केवल 31 साल थी.
उमा ने ये किस्सा सुना दिया और समारोह से निकल गईं, लेकिन पार्टी और आरएसएस को तो जैसे सांप सूंघ गया. समारोह में बैठे बीजेपी नेताओं को तो भरोसा ही नहीं हो रहा था कि उन्होंने जो सुना, वह हकीकत था. उमा भारती तब तक साध्वी बन चुकी थीं और मुख्यमंत्री के जिम्मेदार पद पर थीं. गोविंदाचार्य संघ के प्रचारक थे और बीजेपी में उनकी हैसियत काफी ऊंची थी. संघ की परंपरा में प्रचारकों की निजी बातों को सार्वजनिक करना ठीक नहीं माना जाता. उमा ने गोविंदाचार्य के सामने ही यह खुलासा किया था. इसलिए इससे इंकार करने का तो कोई सवाल ही नहीं पैदा होता था. बीजेपी के बड़े नेता भी सदमे में थे. उन्हें सूझ नहीं रहा था कि इस पर क्या प्रतिक्रिया दें. उन्हें ये जरूर समझ में आ गया था कि जो नुकसान होना था, वो हो चुका. अब चुप रहने में ही भलाई है. वो ये भी समझ गए कि उमा भारती कब क्या बोल दें, इस पर भरोसा नहीं किया जा सकता.
ये तारीख उमा भारती के सियासी करियर का सबसे बड़ा रोड़ा बन गई. इस दिन के बाद से पार्टी का उनके प्रति रवैया बदल गया. उन पर अनप्रेडिक्टिबल होने का दाग हमेशा के लिए चस्पा हो गया. ऐसा भी नहीं कि उमा ने अपने व्यवहार से इस धारणा को बदलने की कोशिश की हो. वो तो इसके पहले और बाद में भी वैसी ही बनी रहीं. सीएम थीं तो प्रेस कॉन्फ्रेंस में ही अपने पालतू कुत्ते को लेकर पहुंच जाती थीं. कभी एक फैक्स से अपने पांच समर्थकों को मंत्री का दर्जा दे देती थीं. जब शिवराज सिंह चौहान की सरकार थी तो उन्होंने कई बार उनके खिलाफ मोर्चा खोलने का खुला ऐलान कर दिया और अगले दिन बड़ा भाई बताकर उनसे मिलने पहुंच जाती थीं.
बीजेपी में नरेंद्र मोदी युग की शुरुआत में उमा भारती को थोड़ी-बहुत तवज्जो मिली. मोदी की पहली कैबिनेट में उन्हें केंद्रीय मंत्री बनाया गया, लेकिन 2019 के बाद से वे पार्टी में अलग-थलग ही रही हैं. राम मंदिर आंदोलन में अपने भाषणों से पहली बार सुर्खियों में आईं उमा का करियर एक भाषण की वजह से ही उन ऊंचाईयों तक नहीं पहुंच सका जिसकी सबने उम्मीद की थी.
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