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उत्तर प्रदेश की कुंडा सीट से आठ बार के विधायक राजा भैया इन दिनों फिर चर्चा में हैं. आज हम आपको उनके और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से जुड़ा एक किस्सा सुनाते हैं, जिसने राजा भैया का कांग्रेस से हमेशा के लिए रिश्ता खत्म कर दिया.
रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया. उत्तर प्रदेश की कुंडा सीट से आठ बार के विधायक राजा भैया इन दिनों फिर चर्चा में हैं. इसकी वजह है एक डिनर मीटिंग जो लखनऊ के एक 5 स्टार होटल में हुई. करीब एक सप्ताह पहले हुई इस मीटिंग में करीब 40 विधायक शामिल हुए. खास बात ये कि सभी विधायक ठाकुर थे और बीजेपी के करीबी थे. इनमें राजा भैया भी शामिल थे. डिनर मीटिंग के बाद यूपी की सियासत में ठाकुर लॉबी को लेकर कयास लगने लगे. बीजेपी और खासकर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से राजा भैया की करीबी किसी से छिपी नहीं है. हाल में उन्होंने खुद खुलासा किया कि 1997 में बीएसपी के 12 विधायकों को राजनाथ सिंह के कहने पर ही उन्होंने तोड़ा था. मायावती के साथ राजा भैया की दुश्मनी की शुरुआत भी यहीं से मानी जाती है. यूपी में जब-जब मायावती की सरकार बनी, राजा भैया के लिए मुश्किलें बढ़ गईं. 1997 में जब मायावती की पार्टी टूटी थी, तब कांग्रेस में भी टूट हुई थी. मायावती और राजा भैया की दुश्मनी के बारे में सब जानते हैं, लेकिन कांग्रेस पार्टी के साथ उनकी अदावत के बारे में कम ही लोगों को पता है जबकि इसकी शुरुआत इंदिरा गांधी के जमाने में ही हो गई थी.
राजा भैया के पिता उदय प्रताप सिंह प्रतापगढ़ की भदरी रियासत के उत्तराधिकारी थे. प्रतापगढ़ के लोगों के बीच उदय प्रताप सिंह भी काफी लोकप्रिय थे. प्रतापगढ़, रायबरेली से सटा हुआ है जो कांग्रेस का पारंपरिक गढ़ रहा है. इसलिए इंदिरा गांधी की भी इस इलाके में खासी दिलचस्पी थी. उदय प्रताप सिंह विश्व हिंदू परिषद और आरएसएस से जुड़े थे. 1974 में उन्होंने अपनी रियासत को एक अलग राज्य घोषित कर दिया. स्थानीय प्रशासन की हिम्मत नहीं हुई कि वो उदय प्रताप के खिलाफ कोई कार्रवाई करे. बात दिल्ली में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक पहुंची. उन्होंने तुरंत सेना की एक टुकड़ी प्रतापगढ़ भेज दी. कहा जाता है कि इसके बाद राजा भैया के परिवार की कांग्रेस से हमेशा के लिए दूरी हो गई.
साल 1993 में राजा भैया जब पहली बार विधायक बने, तब उन्होंने कांग्रेस के नियाज हसन को हराया था. नियाज 6 बार कुंडा से विधायक रह चुके थे, लेकिन 26 साल के राजा भैया ने उनका किला ध्वस्त कर दिया. अपने पहले चुनाव में साइकिल से नामांकन करने पहुंचे राजा भैया अब प्राइवेट एयरक्राफ्ट से चलते हैं. देश में राजे-रजवाड़ों को खत्म हुए भले सालों बीत चुके हों, लेकिन प्रतापगढ़ की जनता के लिए आज भी कुंवर रघुराज प्रताप सिंह राजा हैं. इस इलाके में सिर्फ राजा भैया और उनके परिवार का सिक्का चलता है. कोई उन्हें चुनौती नहीं देता. प्रतापगढ़ के राजपरिवार के किस्से रहस्यों से भरे पड़े हैं. ऐसा ही एक रहस्य राजा भैया के कथित तालाब को लेकर है.
600 एकड़ में फैला यह तालाब प्रतापगढ़ में राजा भैया की कोठी के पीछे स्थित है. 2002 में जब मायावती मुख्यमंत्री बनीं तो उन्होंने राजा भैया के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. राजा भैया को खुद जेल जाना पड़ा. उनके खिलाफ पोटा कानून लगा दिया गया. उनकी कोठी पर छापा पड़ा और इस तालाब को भी खुदवा दिया गया. तब ऐसी खबरें सामने आई थीं कि तालाब से नरकंकाल और हथियार मिले हैं. कहा गया कि राजा भैया ने तालाब में मगरमच्छ पाल रखे थे और अपने दुश्मनों को उसके सामने डाल देते थे. हालांकि, राजा भैया कई बार इससे इंकार कर चुके हैं. उनका कहना है कि तालाब गंगा के किनारे स्थित है. गंगा नदी में मृतकों के अंतिम संस्कार की परंपरा है. नदी के किनारे मिट्टी और बालू के साथ हड्डियों का मिलना आम है. जब उनके घर छापा पड़ा तो पुलिसकर्मियों को तालाब में यही हड्डियां मिली थीं.
तालाब से नरकंकाल मिलने की बात चाहे जितनी सच्ची हो, लेकिन राजा भैया का अपराध से रिश्ता नया नहीं है. उनके खिलाफ करीब 50 केस दर्ज हैं. इनमें से कई मामले हत्या और अपहरण के हैं. राजा भैया को समय-समय पर बीजेपी के अलावा समाजवादी पार्टी का भी साथ मिलता रहा है. मायावती ने महल पर छापे के बाद इस तालाब को सरकारी कब्जे में ले लिया और इसे पक्षी विहार बना दिया. यहीं पर एक गेस्ट हाउस का निर्माण भी उन्होंने कराया. 2003 में मायावती की सरकार गिर गई. मुलायम सिंह यादव सीएमम बने और 25 मिनट के अंदर उन्होंने राजा भैया के खिलाफ पोटा वापस लेने का आदेश दिया. तालाब को पक्षी विहार बनाने का फैसला भी उन्होंने पलट दिया. हालांकि, मायावती फिर भी नहीं मानी. जब वे फिर सीएम बनीं, तो तालाब को दोबारा पक्षी विहार घोषित कर दिया.
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