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जब शिबू सोरेन ने बचाई थी नरसिम्हा राव की सरकार, जानिए पूरा किस्सा

झारखंड के दिसोम गुरु अर्थात शिबू सोरेन नहीं रहे. सोमवार सुबह दिल्ली के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया. आज हम आपको बताएंगे कि कैसे सोरेन ने नरसिम्हा राव की सरकार बचाई थी.

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जब शिबू सोरेन ने बचाई थी नरसिम्हा राव की सरकार, जानिए पूरा किस्सा

Shibu Soren and Narasimha Rao

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झारखंड के दिसोम गुरु अर्थात शिबू सोरेन नहीं रहे. सोमवार सुबह दिल्ली के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया. इसके साथ ही सियासत का एक अध्याय खत्म हो गया, जिसके अलग-अलग पन्नों में झारखंड के लिए पहली हुंकार के साथ अलग राज्य के गठन का इतिहास तक शामिल है. इसमें आदिवासियों के अधिकारों के लिए संघर्ष की असंख्य कहानियां हैं तो देश की संसद में पहली बार कैश फॉर वोट का किस्सा भी है जिसने करीब तीन दशक पहले देश की राजनीति में भूचाल ला दिया था. इस मामले में अदालत के शुरुआती फैसले ने संसदीय शुचिता के विचार पर ही सवालिया निशान खड़े कर दिए थे. ताज्जुब है कि वोट के बदले कैश के आरोप प्रमाणित थे. जिसे पैसा मिला, उसने भरी संसद में स्वीकार किया. सीबीआई की जांच में पैसों के लेन-देन के सारे सबूत मिले. इसके बावजूद कोई सजा नहीं हुई. ठीक 26 साल बाद हालांकि कोर्ट को अपना फैसला बदलना पड़ा. कैश फॉर वोट के आरोपियों में शिबू सोरेन भी शामिल थे. उनकी मृत्यु के साथ ये तमाम कहानियां इतिहास का हिस्सा बनकर रह जाएंगी. 

नरसिम्हा राव थे प्रधानमंत्री

दरअसल, 1991 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 244 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन बहुमत के आंकड़े से दूर रह गई थी. पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व में बनी सरकार को पहले ढाई साल में ही तीन अविश्वास प्रस्तावों का सामना करना पड़ा. पहले दो अविश्वास प्रस्ताव बीजेपी लेकर आई थी. नरसिम्हा राव सरकार को इनसे निपटने में ज्यादा परेशानी नहीं हुई. तीसरा प्रस्ताव सीपीएम लेकर आई. राव इससे भी बच तो गए, लेकिन जो दाग उनके ऊपर लगे, उससे कभी निजात नहीं पा सके. देश के संसदीय इतिहास में सरकार बचाने के लिए पैसों के खुले खेल का यह शायद पहला उदाहरण था. शिबू सोरेन की पार्टी के एक सांसद ने ही संसद में माना था कि सरकार के पक्ष में वोट करने के लिए उन्हें 50 लाख रुपए मिले थे. पैसे लेकर वोट देने वालों में करीब दो दर्जन सांसद थे. 

संसद में पैसे का खेल

जैसे ही यह अविश्वास प्रस्ताव लोकसभा में आया, राव सरकार का गिरना तय माना जा रहा था. उनके सिपहसालार अंदरखाने छोटी-छोटी पार्टियों के नेताओं से मिल रहे थे. उन्हें तोड़ने के लिए हर तरह के प्रलोभन दिए जा रहे थे. जब सदन में वोटिंग के नतीजे आए तो सब चौंक गए. सरकार के पक्ष में 265 और विरोध में 251 वोट पड़े थे. नरसिम्हा राव ने एक बार फिर बाजी मार ली थी, लेकिन ये तो बस शुरुआत थी. राव सरकार ने किस तरह लोकसभा का नंबर गेम पलट दिया था, इसकी चर्चा हर ओर हो रही थी. करीब दो साल बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने इसको लेकर एक सनसनीखेज खुलासा किया. वाजपेयी जेएमएम के सांसद शैलेंद्र महतो को अपने साथ संसद लेकर आए. महतो ने सब के सामने स्वीकार किया कि शिबू सोरेन समेत उनकी पार्टी के चार सांसदों ने नरसिम्हा राव की सरकार बचाने के लिए 50-50 लाख रुपए की घूस ली थी. आरोप लगे तो और भी कई बातें सामने आने लगीं. कहा गया कि जनता दल के कुछ सांसदों को भी पैसे दिए गए थे.   इसके बाद मामले की जांच सीबीआई को दी गई. जांच में जो बातें सामने आईं, वह संसदीय व्यवस्था की खामियों के बारे में बताती हैं. इसको लेकर जो अदालत का नतीजा आया, वह सांसदों के विशेषाधिकारों पर सवाल खड़े करने वाला था, लेकिन एक दशक बाद जब फैसला पलटा गया, तब स्थापित हुआ कि लोकतंत्र में जनता की इच्छा ही सर्वोपरि होती है. 

सरकार बचने के बाद दिए गए पैसे

सीबीआई की चार्जशीट के मुताबिक कांग्रेस नेता बूटा सिंह ने 26 जुलाई 1993 को अविश्वास प्रस्ताव के खिलाफ वोट देने के लिए जेएमएम के चार सांसदों से संपर्क किया था. उसी रात अपने घर पर बूटा सिंह इनसे मिले थे. उसके बाद बूटा सिंह चारों सांसदों को लेकर प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव से मिलाने पीएम हाउस पहुंचे. 27 जुलाई की रात बूटा सिंह जेएमएम सांसदों फिर मिले. अगले दिन सदन में अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग हुई जिसमें सरकार की जीत हुई. 29 जुलाई की सुबह से सांसदों को पैसे पहुंचाने की प्रक्रिया शुरू हुई.

जिप्सी में भरकर आई रकम

सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में बताया था कि करीब एक दर्जन सांसदों को रिश्वत दी गई थी. इसके लिए जिप्सी में भरकर पैसे लाए गए थे. जेएमएमम के सांसदों को जिस पार्टी में पैसे दिए गए, वह कांग्रेस नेता सतीश शर्मा के घर पर हुई थी. उन्होंने अपने पैसे पंजाब नेशनल बैंक की दिल्ली स्थित एक ब्रांच में जमा किए थे. घूस में मिले पैसों को पार्टी फंड का नाम दिया गया. जेएमएम के सांसदों ने फर्जी कूपन छपवाए, ताकि इन पैसों को पार्टी फंड का बता सकें. उन्होंने रिश्वत में मिले पैसों को यहां-वहां निवेश भी किया. सूरज मंडल ने पीएनबी अकाउंट से पैसे निकालकर अपने दूसरे अकाउंट में ट्रासफर किए, ताकि बड़ी रकम कई हिस्सों में बंट जाए.

अदालत का भूल सुधार

ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में सभी आरोपी सांसदों को दोषी बताया था. उनके साथ नरसिम्हा राव को भी सजा सुनाई गई थी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सांसदों के विशेषाधिकार का तर्क देते हुए अनुच्छेद 105(2) के तहत उनके खिलाफ सभी मामलों को खारिज कर दिया. कोर्ट के इस फैसले से यह संदेश गया कि संसद सदस्य चाहे कुछ भी करें, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो सकती. 1998 में इस फैसले के 26 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला पलट दिया और कहा कि अगर कोई विधायक या सांसद नोट लेकर वोट या भाषण देता है तो उस पर कार्रवाई होगी.

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