भारत
भारत का पहला राष्ट्रीय ध्वज मैडम भीकाजी कामा ने बनाया था. उन्होंने ही पहली बार विदेशी धरती पर यह ध्वज फहराया था. क्या आपने कभी सोचा है कि इस महान नारी के वंशज कहां रहते हैं?
स्वतंत्रता दिवस आ रहा है. सभी को पता है कि भारत का पहला राष्ट्रीय ध्वज मैडम भीकाजी कामा ने बनाया था. उन्होंने ही पहली बार विदेशी धरती पर यह ध्वज फहराया था. क्या आपने कभी सोचा है कि इस महान नारी के वंशज कहां रहते हैं? यदि हां, तो इसका उत्तर है कि मैडम भीकाजी कामा के परिवार के वंशजों में से एक परिवार वडोदरा जिले में रहता है. वैसे तो भीकाजी कामा की कोई संतान नहीं थी, लेकिन उनके ससुराल पक्ष के वंशज वडोदरा में बसे हुए हैं.
दरअसल, भारत के राष्ट्रीय ध्वज का इतिहास स्वतंत्रता संग्राम से गहराई से जुड़ा हुआ है. पहला राष्ट्रीय ध्वज 1906 में कोलकाता में फहराया गया था. वर्ष 1907 में मैडम भीकाजी कामा ने जर्मनी के स्टटगार्ट में ध्वज फहराया. पिंगली वेंकैया ने 1921 में ध्वज का एकरूप डिजाइन तैयार किया था. समय-समय पर भारत के ध्वज में बदलाव होते रहे हैं. अंत में, 22 जुलाई 1947 को, संविधान सभा ने वर्तमान तिरंगे को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में मान्यता दे दी गई. केसरिया, सफेद और हरे रंग के तिरंगे के बीच में अशोक चक्र है, जो धर्म और न्याय का प्रतीक है. राष्ट्रीय ध्वज भारत के गौरव और एकता का प्रतीक है.
देश की आजादी के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित करने वाले मुंबई के मैडम भीकाजी कामा के पिता सोराबजी पटेल एक अमीर और मुंबई के राजनीतिक नेता थे. उनकी शादी मुंबई के वकील रुस्तमजी कामा से हुई थी. यह मुंबई का कामा परिवार मूल रूप से भरूच का था. भीकाजी कामा के ससुराल पक्ष, यानी कामा परिवार के कई सदस्य भरूच से गुजरात के विभिन्न स्थानों पर बस गए थे. इनमें से अधिकांश लकड़ी, निर्माण और इंजीनियरिंग कौशल से जुड़े थे.
इसी कामा परिवार में एक सदस्य थे दोराबजी अर्देशजी कामा, जो भरूच के कामा परिवार के सदस्य थे. मैडम भीकाजी कामा के ससुराल पक्ष की दूसरी या तीसरी पीढ़ी के परिवार से थे यह दोराबजी कामा. महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ ने दोराबजी अर्देशजी कामा को डभोई तालुका में, जिसे अब बाणज गांव के नाम से जाना जाता है, 450 बीघा जमीन दी ताकि वे वहां बस सकें और अपना जीवनयापन कर सकें. महाराजा सयाजीराव के संरक्षण में, दोराबजी अर्देशजी कामा बाणज गांव में बस गए. वे खेती करके अपना जीवनयापन करते थे. अपनी स्पष्टवादिता, नेतृत्व क्षमता और व्यापक ज्ञान के कारण वे 20 साल तक बाणज गांव के सरपंच भी रहे.
दोराबजी अर्देशजी कामा की दूसरी पत्नी, जो पारसी नहीं थीं उनकी दो संतानें थीं. पारसी समुदाय में अंतरधर्मीय विवाह निषिद्ध होता है, लेकिन उस समय पारसी नेताओं ने अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए इस शादी को स्वीकार कर लिया था. इसके बाद, दोराबजी की संतान जमशेदजी के पाँच बच्चे थे, जिनमें तीन भाई और दो बहनें थीं. ये बहनें शादी के बाद विदेश में रहती हैं. तीन भाइयों में से दो की समय से पहले मृत्यु हो गई, जिसके बाद एक भाई बचे, जिनका नाम मनीषभाई है. मनीषभाई ने भी यहीं रहकर एक गैर-पारसी महिला से प्रेम विवाह किया. अब उनका बेटा होमीभाई उनके साथ रहता है. मनीषभाई, उनकी पत्नी शकुंतलाबेन और बेटे होमीभाई उसी बाणज गांव में रहते हैं, जहां की जमीन महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ ने उनके दादा दोराबजी कामा को बसने के लिए दी थी. पीढ़ी दर पीढ़ी वे अपने अस्तित्व और पारसी रीति-रिवाजों को बनाए रख रहे हैं. मनीषभाई कामा कहते हैं कि वह और होमीभाई मैडम कामा के ससुराल परिवार के वंशज हैं.
हालांकि, मनीषभाई यह निश्चित रूप से नहीं कह सकते कि उनके दादा और रुस्तमजी कामा के बीच क्या संबंध था. दोराबजी कामा ने अपने उदार स्वभाव के कारण गांव में प्राथमिक विद्यालय बनाने के लिए अपनी कुछ जमीन दान में दी थी. इसके बाद, भूमि सीमा कानून और पीढ़ी दर पीढ़ी गंभीर बीमारियों जैसी घटनाओं के कारण उनकी जमीन का क्षेत्र कम होता गया. आज दोराबजी कामा की तीसरी पीढ़ी, होमीभाई कामा, यहाँ रहती है. उनके पास फिलहाल 52 बीघा जमीन है, जिसे वे खेती के लिए किराए पर देकर अपना जीवनयापन कर रहे हैं. यह पारसी परिवार पिछले तीन पीढ़ियों से वडोदरा के डभोई तालुका के बाणज गांव में रह रहा है. तीन पीढ़ियों से खेती करके जीवनयापन करने वाला यह पारसी परिवार एक विशेष ध्यान आकर्षित करता है.
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