भारत
पूरे देशभर में अभी 'वन नेशन, वन इलेक्शन’ को लेकर व्यापक चर्चा हो रही है. मोदी सरकार ने इस बिल को पहले ही कैबिनेट से मंजूरी दे दी है. अब ये देखना दिलचस्प होगा कि सरकार और विपक्ष के बीच इस मुद्दे पर सहमति कैसे बनती है. आइए इस बिल के जरिए समझने का प्रयास करते हैं कि आखिर 'वन नेशन, वन इलेक्शन’ है क्या ?
One Nation One Election: केंद्र सरकार ने ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ (One Nation One Election) यानी एक राष्ट्र-एक चुनाव के विचार को आगे बढ़ाते हुए संविधान संशोधन विधेयक पेश किया है. केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने लोकसभा (Lok Sabha) में यह बिल पेश किया. बताते चलें मोदी कैबिनेट पहले ही इस बिल को मंजूरी दे चुकी है. पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में गठित समिति की रिपोर्ट के बाद यह फैसला लिया गया. हालांकि, इस प्रस्ताव को लेकर देश में तीखी राजनीतिक बहस शुरू हो गई है.
क्या है 'वन नेशन, वन इलेक्शन'?
वन नेशन-वन इलेक्शन का मतलब है कि देश में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाएं. इसके अलावा, 100 दिनों के भीतर स्थानीय निकायों के चुनाव भी संपन्न कराए जाने का सुझाव दिया गया है. दरअसल, आजादी के शुरुआती दशकों में 1952, 1957, 1962 और 1967 तक लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ कराए जाते थे. लेकिन राज्यों की राजनीतिक परिस्थितियों और विधानसभाओं के असमय भंग होने के कारण यह व्यवस्था टूट गई.
वन नेशन, वन इलेक्शन के संभावित फायदे
विपक्ष की चिंताएं और आलोचना
हालांकि, विपक्षी दलों ने इस बिल पर गंभीर सवाल उठाए हैं. उनका मानना है कि इससे भारत के संघीय ढांचे को कमजोर किया जा सकता है.
लागू करने में चुनौतियां
लोकसभा की सीटें 543 से बढ़कर 750 हो सकती हैं
बहरहाल, आलोचकों का मानना है कि एक साथ चुनावों को लागू करने के लिए संविधान और अन्य कानूनी प्रावधानों में महत्वपूर्ण बदलाव करना अनिवार्य है. इसके लिए पहले संविधान में संशोधन और फिर राज्य विधानसभाओं की स्वीकृति लेनी जरूरी होगी. साथ में परिसीमन का सवाल भी उठ रहा है. बता दें, 2026 तक लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने पर रोक है. 2027 की जनगणना के बाद सीटों का पुनर्निर्धारण हो सकता है, जिससे लोकसभा की सीटें 543 से बढ़कर 750 हो सकती हैं.
देश की राजनीति में सबसे बड़ी बहस का केंद्र
सरकार द्वारा वन नेशन, वन इलेक्शन’ का विचार आर्थिक और प्रशासनिक दृष्टिकोण से फायदेमंद बताया जा रहा है. लेकिन इसे लागू करने के लिए व्यापक राजनीतिक सहमति और संवैधानिक संशोधनों की जरूरत होगी. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार और विपक्ष के बीच इस मुद्दे पर सहमति कैसे बनती है. फिलहाल सियासी घमासान जारी है और यह मुद्दा देश की राजनीति में सबसे बड़ी बहस का केंद्र बना हुआ है.
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