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छत्तीसगढ़ में यह नक्सलियों के खिलाफ एक हथियारबंद संगठन था जिसे राज्य सरकार और सुरक्षा बलों का भी समर्थन हासिल था. सलवा जुडूम में स्थानीय लोगों को शामिल किया गया था
25 मई, 2013- यही तारीख थी. दोपहर के करीब 3 बजे थे. छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने वाले थे और इसी सिलसिले में सुकमा में कांग्रेस की परिवर्तन रैली थी. वही सुकमा जिसे नक्सलियों का गढ़ कहा जाता था. रैली खत्म हुई तो खाना खाकर करीब 20 वाहनों में कांग्रेस नेताओं का काफिला निकला. नक्सलियों ने राजनीतिक दलों को इस इलाके में रैली नहीं करने की चेतावनी दी थी. इसके बावजूद न केवल कांग्रेस ने रैली की, बल्कि राज्य के सभी बड़े पार्टी नेता इसमें शरीक भी हुए. अजीत जोगी, विद्याचरण शुक्ल, नंदकुमार पटेल, महेंद्र कर्मा, इस इलाके के तमाम विधायक- रैली में सब मौजूद थे और बैलट की ताकत से नक्सलवाद को खत्म करने की बात मंच से की थी. कांग्रेस नेताओं के काफिले को जगदलपुर जाना था. इस रास्ते में एक बड़ा जंगल पड़ता है. इस इलाके को झीरम घाटी नाम से जाना जाता है. इन नेताओं को कोई अंदेशा नहीं था कि इसी जंगल में मौत उनका इंतजार कर रही है.
सबसे आगे एस्कॉर्ट की दो गाड़ियां थीं. उसके ठीक पीछे नंदकुमार पटेल की कार थी. बीच जंगल में नक्सलियों ने एक जगह रास्ते पर पेड़ गिराकर रास्ता रोक दिया था और वहां पूरे क्षेत्र मे लैंडमाइन बिछा रखा था. गाड़ियां गिरे पेड़ के पास पहुंचीं तो उनके पहिये थम गए. उनके रुकते ही घात लगाए नक्सलियों ने माइंस उड़ा दी और दोनों ओर से फायरिंग शुरू कर दी. पूरा काफिला नक्सलियों के बिछाए जाल में फंस चुका था. उन्होंने एक-एक कर नेताओं को बाहर निकाला, उन्हें जंगल के अंदर ले गए और फिर एक-एक कर गोली मार दी. उन्होंने इसका जश्न भी मनाया. नक्सलियों को सबसे ज्यादा खुशी महेंद्र कर्मा के मरने से हुई थी. इस एक घटना ने एक झटके में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का पूरा नेतृत्व ही छीन लिया था. केवल अजीत जोगी बच गए थे जो अंतिम समय में तबीयत खराब होने के चलते काफिले के साथ नहीं गए और सुकमा में ही रुक गए थे. इस हमले में ढाई दर्जन से ज्यादा मौतें हुई थीं. क्या आपको अंदाजा है कि नक्सलियों ने ये हमला क्यों किया था और महेंद्र कर्मा की मौत पर सबसे ज्यादा प्रसन्न क्यों हुए थे? इसकी वजह थी सलवा जुडूम और इसकी शुरुआत महेंद्र कर्मा ने की थी. इन दिनों सलवा जुडूम एक बार फिर चर्चा में है और इसका कारण हैं इंडिया ब्लॉक के उपराष्ट्रपति उम्मीदवार बी सुदर्शन रेड्डी.
दरअसल, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सुदर्शन रेड्डी सलवा जुडूम पर उनके फैसले को लेकर घेरा है. शाह ने कहा है कि रेड्डी के उस फैसले के चलते छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद अभी तक समस्या बना हुआ है. ये चौंकाने वाला है क्योंकि एक कांग्रेस नेता द्वारा शुरू किए अभियान को लेकर बीजेपी नेता कांग्रेस-समर्थित उपराष्ट्रपति उम्मीदवार को घेर रहे हैं. ऐसे में जानते हैं कि सलवा जुडूम आखिर था क्या.
सलवा जुडूम गोंड भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है शांति अभियान, लेकिन छत्तीसगढ़ का सलवा जुडूम उसके ठीक उल्टा था. छत्तीसगढ़ में यह नक्सलियों के खिलाफ एक हथियारबंद संगठन था जिसे राज्य सरकार और सुरक्षा बलों का भी समर्थन हासिल था. सलवा जुडूम में स्थानीय लोगों को शामिल किया गया था जो नक्सलियों से मुकाबले में सुरक्षा कर्मियों की मदद करते थे. महेंद्र कर्मा ने इसकी शुरुआत की थी. सरकार ने आदिवासी युवकों को विशेष पुलिस अधिकारी बनाकर हथियार उपलब्ध कराए. इसके अलावा उन्हें हर महीने तीन हजार रुपये वेतन भी दिया जाता था. थोड़े ही दिनों में आदिवासी युवकों ने नक्सलियों की नाक में दम कर दिया. नक्सली जहां दिख जाते, ये युवक वहीं उन पर हमला कर देते. स्थानीय होने के चलते उन्हें नक्सलियों के रास्तों और छिपने के स्थानों के बारे में भी पता था. इस रणनीति से घबराए नक्सलियों ने सलवा जुडूम में शामिल युवकों और उनके परिवारों को निशाना बनाना शुरू किया. नक्सली उन्हें पकड़कर बीच गांव में उनकी हत्या करने लगे. इधर, सलवा जुडूम के बहाने आपसी रंजिशों को सुलझाने की खबरें आने लगीं. इस पर मानवाधिकारों के उल्लंघन का भी आरोप लगा और मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया.
सुप्रीम कोर्ट में लंबी चली बहस के बाद 5 जुलाई, 2011 को फैसला आया. सुदर्शन रेड्डी की बेंच ने सलवा जुडूम को असंवैधानिक करार देते हुए इस पर प्रतिबंध लगा दिया था. बेंच ने राज्य सरकार को भी निर्देश दिया कि वो आदिवासी युवकों से हथियार वापस ले. सलवा जुडूम रुक गया और नक्सलियों को तत्काल राहत मिल गई. नक्सलियों ने महेंद्र कर्मा से बदला लेने के लिए ही झीरम घाटी में घटना को अंजा दिया था. हालांकि, अब यह समस्या करीब-करीब खत्म हो चुकी है, लेकिन सलवा जुडूम का खूनी इतिहास अब भी उसे गाहे-बगाहे चर्चा में ले ही आता है.
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