भारत
9 सितंबर को होने वाले उप राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष अंतरात्मा की आवाज पर मतदान का संदेश दे रहा है, जानें 1969 के राष्ट्रपति चुनाव का वो वाकया जिसने बदल दी थी देश की सियासत...
देश में राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति का चुनाव हो और 'अंतरात्मा की आवाज' की चर्चा नहीं हो, ऐसा हो नहीं सकता. 9 सितंबर को उपराष्ट्रपति पद के लिए वोटिंग होनी है. सत्तारूढ गठबंधन के उम्मीदवार सी पी राधाकृष्णन की जीत लगभग तय है, लेकिन विपक्ष अंतरात्मा की आवाज पर मतदान का संदेश दे रहा है. शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत ने सोमवार को कहा कि सांसदों को अंतरात्मा की आवाज पर मतदान करना चाहिए.
इस शब्द ने करीब तीन दशक पहले भारत की राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया था. अंतरात्मा की आवाज पर हुई वोटिंग का ही नतीजा था कि सत्तारूढ़ पार्टी का उम्मीदवार चुनाव हार गया था, लेकिन इसे प्रधानमंत्री की जीत बताया गया था. इसके बाद कांग्रेस पार्टी दो फाड़ हो गई थी. इसी चुनाव ने इंदिरा गांधी की शख्सियत में वो बदलाव शुरू किया जिसके दम पर उन्होंने गूंगी गुड़िया से दुर्गा का अवतार तक का सफर पूरा कर किया.
ये वाकया साल 1969 का है. उस समय राष्ट्रपति रहे जाकिर हुसैन की अचानक मृत्यु हो गई. उपराष्ट्रपति वी वी गिरि करीब तीन महीने तक कार्यवाहक राष्ट्रपति रहे. चुनाव की बारी आई तो कांग्रेस के संभावित उम्मीदवारों की चर्चा शुरू हुई. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दिग्गज दलित नेता जगजीवन राम का नाम प्रस्तावित किया, लेकिन कांग्रेस के संगठन ने इसे खारिज कर दिया. इंदिरा इससे सन्न रह गईं, लेकिन वो लाचार थीं क्योंकि अपनी पार्टी के संगठन पर तब उनका वर्चस्व नहीं था. कांग्रेस के संगठन पर तब कामराज, मोरारजी देसाई, एसके पाटिल और निजलिंगप्पा जैसे पुराने नेताओं का कब्जा था. वे इंदिरा को कमजोर प्रधानमंत्री मानते थे और उन्हें अक्सर गूंगी गुड़िया संबोधित करते थे.
इन नेताओं ने बेंगलुरू (तब बेंगलोर) में कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक बुलाई और नीलम संजीव रेड्डी का नाम आगे किया. कमेटी ने बहुमत से रेड्डी को राष्ट्रपति पद के लिए कांग्रेस उम्मीदवार घोषित कर दिया गया. रेड्डी उस समय लोकसभा के स्पीकर थे और कामराज के करीबियों में शामिल थे. इंदिरा-विरोधी नेता ऐसा राष्ट्रपति चाहते थे जो केंद्र सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी करने में उनकी मदद करे. रेड्डी इस खांचे में फिट बैठते थे. इंदिरा को रेड्डी का नाम मंजूर नहीं था, लेकिन वे चाहकर भी कुछ नहीं कर पाईं.
अब इस कहानी में एंट्री हुई द्वारिका प्रसाद मिश्र की जो उस समय इंदिरा के सबसे विश्वस्त सलाहकार थे. मिश्रा तब कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य नहीं थे, लेकिन इंदिरा के साथ बेंगलुरू गए थे. दिल्ली वापसी के दौरान मिश्र ने इंदिरा से पूछा कि उन्होंने नीलम संजीव रेड्डी के नाम पर सहमति क्यों दी. इंदिरा ने अपनी लाचारी बताई. ये आशंका भी जताई कि रेड्डी राष्ट्रपति बनते ही उन्हें प्रधानमंत्री पद से बर्खास्त कर देंगे. फ्लाइट के दिल्ली पहुंचने से पहले ही अंतरात्मा की आवाज पर सियासत बदलने की पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी थी. दिल्ली पहुंचकर इंदिरा ने चुप्पी साध ली. वे गाहे-बगाहे रेड्डी की चुनाव तैयारी वाली बैठकों में भी जातीं, लेकिन कोई सार्वजनिक बयान से बच रही थीं. दूसरी ओर, डीपी मिश्र दिल्ली पहुंचकर सबसे पहले जगजीवन राम से मिले. फिर उन्होंने फखरूद्दीन अली अहमद को अपने साथ लिया जो तब इंदिरा कैबिनेट में मंत्री थे. इन तीनों ने ही पहली बार अंतरात्मा की आवाज पर वोटिंग का नारा बुलंद किया था और वी वी गिरि को राष्ट्रपति चुनने की अपील की थी.
इसके बाद तो चुनाव अभियान के दौरान ही कांग्रेस पार्टी दो गुटों में बंट गई- सिंडीकेट और इंडीकेट. सिंडीकेट मतलब पुराने नेता जो रेड्डी के समर्थक थे. इंडीकेट मतलब इंदिरा-समर्थक जो वी वी गिरि को राष्ट्रपति बनाना चाहते थे. अब तलवारें खिंच चुकी थीं. उपराष्ट्रपति का चुनाव कांग्रेस के दो गुटों के बीच पार्टी और सरकार पर वर्चस्व की लड़ाई में तब्दील हो चुका था. इसी चुनाव में पहली बार इंदिरा गांधी एक रणनीतिकार के रूप में सामने आईं. उन्होंने परदे के पीछे से सारा खेल किया, लेकिन फाइनल अटैक के लिए वोटिंग के एक दिन पहले तक का इंतजार किया. मतदान के ठीक 24 घंटे पहले उन्होंने सांसदों और विधायकों से अंतरात्मा की आवाज पर वोटिंग करने की अपील कर दी. ये बेहद हैरान करने वाला था क्योंकि खुद इंदिरा ने नीलम संजीव रेड्डी के नाम पर सहमति दी थी, लेकिन अब यह चुनाव उनके सियासी वजूद का सवाल बन चुका था.
इंदिरा की अपील ने खेल पूरी तरह पलट दिया. मतगणना शुरू हुई तो कांटे का मुकाबला देखने को मिला. पहली वरीयता के वोटों की गिनती में किसी उम्मीदवार को निर्णायक जीत नहीं मिली, लेकिन वी वी गिरि आश्चर्यजनक रूप से बढ़त की हालत में थे. दूसरी वरीयता के वोटों की गिनती में वे जीत गए और कांग्रेस पार्टी का आधिकारिक उम्मीदवार हार गया. अब सन्न होने की बारी सिंडीकेट के नेताओं की थी. उन्होंने सोचा भी नहीं था कि हमेशा चुप रहने वाली इंदिरा गांधी उन्हें इस तरह मात दे सकती हैं. इस चुनाव के नतीजे ने यह भी तय कर दिया कि इंदिरा और उनके विरोधी अब ज्यादा दिनों तक एक पार्टी में नहीं रह सकते. ऐसा ही हुआ भी और बौखलाए सिंडीकेट नेताओं ने नवंबर 1969 में इंदिरा को ही पार्टी से निकाल दिया. इसके बाद कांग्रेस की दो वर्किंग कमेटियों की एक साथ बैठक शुरू हुई- एक पार्टी मुख्यालय और दूसरी प्रधानमंत्री आवास में. इसी के साथ कांग्रेस का औपचारिक विभाजन हो गया और इंदिरा ने कांग्रेस (आई) बनाई.
इसके करीब दो साल बाद दो चीजें हुईं. 1971 में लोकसभा का चुनाव हुआ और इंदिरा ने अपने दम पर सत्ता में वापसी की. यह संगठन और सत्ता पर इंदिरा के टोटल कंट्रोल की शुरुआत थी. यानी गूंगी गुड़िया अब बदल चुकी थी. इसी साल बांग्लादेश का उदय हुआ जिसका श्रेय इंदिरा गांधी को मिला. 1971 के लड़ाई में जीत के बाद ही इंदिरा को दुर्गा का अवतार कहने की शुरुआत हुई.
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