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याचिकाकर्ता का कहना है कि CrPC की धारा 354(5) के तहत किसी अपराधी को गर्दन से लटकाकर फांसी देना बहुत क्रूर और अमानवीय तरीका है इसलिए कानून के इस नियम को रद्द घोषित किया जाना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (18 अगस्त, 2026) को वह याचिका खारिज कर दी, जिसमें सजा-ए-मौत के लिए फांसी की जगह लीथल इंजेक्शन, शूटिंग, इलेक्ट्रोक्यूशन या गैस चेंबर जैसा दूसरा तरीका अपनाने की मांग की गई थी. हालांकि, कोर्ट ने मामला सरकार पर छोड़ते हुए कहा है कि वह विशेषज्ञों की मदद से मौत की सजा देने के किसी कम पीड़ादायक और ज्यादा सम्मानजनक तरीके पर विचार कर सकती है.
वकील ऋषि मल्होत्रा ने याचिका दाखिल करके फांसी की जगह वैकल्पिक तरीके से सजा दिए जाने की अपील की है. याचिकाकर्ता का कहना है कि CrPC की धारा 354(5) के तहत किसी अपराधी को गर्दन से लटकाकर फांसी देना बहुत क्रूर और अमानवीय तरीका है इसलिए कानून के इस नियम को रद्द घोषित किया जाना चाहिए. याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा है कि इसके तहत हर नागरिक को सम्मान के साथ जीने का अधिकार है.
याचिकाकर्ता ने सजा के लिए फांसी की जगह जहर का इंजेक्शन, गोली मारना, इलेक्ट्रोक्यूशन या गैस चैंबर जैसे तरीकों का सुझाव दिया है. याचिकाकर्ता का कहना है कि इससे कुछ ही मिनटों में मौत हो सकती है और यह कम पीड़ादायक है. याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि फांसी के बाद मौत घोषित करने में करीब 40 मिनट लगते हैं, जबकि शूटिंग या जहरीले इंजेक्शन से यह प्रक्रिया 5 मिनट में पूरी हो जाती है. याचिकाकर्ता ने संयुक्त राष्ट्र के एक प्रस्ताव का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया कि जहां मौत की सजा दी जाती है, वहां ऐसी प्रक्रिया से सजा दी जानी चाहिए, जिससे कम से कम तकलीफ हो.
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच के सामने यह याचिका लगी थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया है. याचिकाकर्ता ने इस मामले को बड़ी बेंच के पास भेजने की मांग की थी, जिससे सुप्रीम कोर्ट ने इनकार कर दिया. याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के पहले के तीन फैसलों को एक बड़ी बेंच के पास भेजा जाए, जिस पर कोर्ट ने कहा कि ऐसा करने के लिए कोई ठोस आधार नहीं है. फांसी की सजा देने के संवैधानिक आधार को सही ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया अभी सजा-ए-मौत के लिए फांसी का तरीका सही है.
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