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दिल्ली हाई कोर्ट ने साल 2005 में बोफोर्स मामले में हिंदुजा ब्रदर्स के खिलाफ कार्यवाही रद्द कर दी थी. हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई थी, जिसे शीर्ष अदालत ने खारिज कर दिया है.
बोफोर्स घोटाला... 1989 के आम चुनावों से लेकर अब तक कांग्रेस के लिए ये शब्द गले की फांस बने हुए थे, लेकिन गुरुवार (08 अगस्त, 2026) को सुप्रीम कोर्ट ने हिंदुजा बंधुओं के खिलाफ आखिरी अपील को खारिज कर दिया, जिसके बाद अब इस मामले का कानूनी चैप्टर खत्म हो गया है. हालांकि सवाल ये है कि अदालत में मामला खत्म होने के साथ ही क्या राजनीति में भी ये खत्म हो चुका है?
कांग्रेस के लिए बोफोर्स डील सिर्फ एक कानूनी लड़ाई नहीं रही है. 1989 से लेकर अब तक ये भ्रष्टाचार का पर्याय का संकेत बन चुकी है, जिसका इस्तेमाल हर चुनावों में विरोधी दल कांग्रेस के खिलाफ करते रहे हैं. खासकर बीजेपी, संसद हो, चुनाव प्रचार हो या सार्वजनिक भाषण. कांग्रेस के खिलाफ बोफोर्स डील को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करती रही है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह विवाद अदालत से इतर भी है और करीब 40 साल बाद भी कांग्रेस पर एक धब्बे की तरह निशान छोड़ रहा है. संसद हो या सार्वजनिक भाषण विरोधी नेता अकसर कांग्रेस पर बोफोर्स घोटाले का आरोप लगाते रहे हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया?
दिल्ली हाई कोर्ट ने साल 2005 में बोफोर्स मामले में हिंदुजा ब्रदर्स के खिलाफ कार्यवाही रद्द कर दी थी. हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई थी, जिसे शीर्ष अदालत ने खारिज कर दिया है. अब इस मामले में कोई आगे की अदालती कार्यवाही नहीं होने की वजह से ये कहा जा सकता है कि बोफोर्स मामला करीब 40 साल बाद अब अपने निष्कर्ष पर पहुंच गया है.
क्या था बोफोर्स तोप घोटाला?
बोफोर्स का विवाद अप्रैल, 1987 में शुरू हुआ जब स्वीडिश रेडियो ने आरोप लगाया कि स्वीडन की हथियार निर्माता कंपनी बोफोर्स से 155 मिमी हॉवित्जर खरीदने के लिए भारत के 1,437 करोड़ रुपये के सौदे में रिश्वत दी गई थी. हालांकि राजीव गांधी सरकार ने इन आरोपों का खंडन किया और खुद पीएम राजीव ने लगातार यही कहा कि न तो उन्होंने और न ही उनकी सरकार ने रिश्वत ली थी. इस मामले में उन पर कभी चार्जशीट दायर नहीं की गई और न ही किसी अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया.
बोफोर्स केस की पूरी टाइमलाइन
-24 मार्च, 1986: भारत सरकार ने स्वीडन की कंपनी Bofors AB के साथ 1437 करोड़ रुपये की 155 मिमी हॉवित्जर तोपों की डील की.
-16 अप्रैल, 1987: स्वीडिश रेडियो ने दावा किया कि इस डील में भारतीय नेताओं और अधिकारियों को करीब 64 करोड़ रुपये की रिश्वत (किकबैक) दी गई.
-अगस्त, 1987: आरोपों के बाद भारत में बवाल मचा, सरकार ने जांच के लिए संसद की JPC बनाई. एक साल बाद JPC ने रिपोर्ट सौंपी, लेकिन विपक्ष ने इसकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए.
- 1989: लोकसभा चुनाव में बोफोर्स बड़ा मु्द्दा बना. कांग्रेस 404 सीटों से घटकर 197 पर आ गई और वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने.
-22 जनवरी, 1990: CBI ने बोफोर्स मामले में FIR दर्ज की और आपराधिक जांच शुरू हुई.
-1990–1993: स्विट्जरलैंड से बैंक रिकॉर्ड मंगाने के लिए कानूनी प्रक्रिया शुरू हुई.
-1993: इटली के कारोबारी Ottavio Quattrocchi भारत छोड़कर चले गए.
-1997: स्विस बैंक दस्तावेज भारत को मिले. Quattrocchi समेत कई लोगों के खिलाफ कार्रवाई तेज हुई.
-22 अक्टूबर 1999: CBI ने पहली चार्जशीट दाखिल की. इसमें Quattrocchi, Win Chadha, Bofors कंपनी और अन्य के नाम शामिल थे.
-2000: हिंदुजा बंधुओं के खिलाफ सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की गई.
-2003–2004: Quattrocchi के ब्रिटेन स्थित बैंक खाते फ्रीज किए गए, लेकिन बाद में उन्हें डी-फ्रीज कर दिया गया. प्रत्यर्पण के प्रयास भी असफल रहे.
-4 फरवरी, 2004: दिल्ली हाई कोर्ट ने राजीव गांधी के खिलाफ कार्यवाही खत्म कर दी.
-2005: दिल्ली हाई कोर्ट ने हिंदुजा बंधुओं के खिलाफ भी कार्यवाही रद्द कर दी.
-2007: Quattrocchi को अर्जेंटीना में गिरफ्तार किया गया, लेकिन भारत उनका प्रत्यर्पण नहीं करा सका.
-4 मार्च, 2011: दिल्ली की अदालत ने CBI को Quattrocchi के खिलाफ मामला वापस लेने और बंद करने की अनुमति दे दी.
-2011 में सीबीआई ने क्लोजर रिपोर्ट दायर कर दी और मामला व्यावहारिक रूप से खत्म हो गया.
-2026: सुप्रीम कोर्ट ने हिंदुजा बंधुओं से जुड़े लंबे समय से लंबित मामले को भी समाप्त कर दिया, जिससे बचा हुआ कानूनी विवाद भी खत्म हो गया.
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