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डॉक्टरों के मुताबिक, हफ्ते में महज कुछ घंटों से ज्यादा का स्क्रीन टाइम हमारे दिमाग की सोचने-समझने की क्षमता को 13% तक कम कर रहा है और लोग अनजाने में रील्स और लाइक्स के डिजिटल गुलाम बनते जा रहे हैं.
आज के दौर में हम सभी स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के आदी हो चुके हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह लत शराब, सिगरेट या गेमिंग से भी ज्यादा खतरनाक है? हेल्थ कॉन्क्लेव WION Health Pulse में बुधवार (17 जून 2026) को देश के जाने-माने बाल रोग विशेषज्ञ और नेफ्रॉन हेल्थ केयर के सीएमडी डॉ. संजीव बगई ने इस विषय पर कई चौंकाने वाले वैज्ञानिक खुलासे किए हैं. डॉ. बगई के अनुसार, सोशल मीडिया की लत हमारे दिमाग को अंदर से खोखला कर रही है.
अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल्स के पुख्ता वैज्ञानिक आंकड़ों का हवाला देते हुए डॉ. बगई ने बताया कि अगर कोई व्यक्ति हफ्ते में तीन से चार घंटे से ज्यादा का स्क्रीन टाइम रखता है, तो हर एक अतिरिक्त घंटे के साथ उसकी सोचने-समझने की क्षमता (कॉग्निटिव फंक्शन) में 13% की गिरावट आने लगती है. इस बात को साबित करने के लिए उन्होंने स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक बड़े रिसर्च का उदाहरण दिया.
इस स्टडी में 35,000 कॉलेज छात्रों को छह महीने के लिए सोशल मीडिया और स्क्रीन से पूरी तरह दूर रखा गया. नतीजा यह हुआ कि उन छात्रों के शैक्षणिक प्रदर्शन, याददाश्त, लिखने की कला और गणित के कौशल में 29% तक का जबरदस्त सुधार देखा गया. हम अनजाने में इस छोटे से उपकरण के गुलाम बनते जा रहे हैं.
चिकित्सकीय दृष्टिकोण से समझाते हुए डॉ. बगई ने कहा कि जब हम सोशल मीडिया पर रील्स, लाइक्स और शेयर्स देखते हैं, तो हमारे दिमाग में डोपामाइन नाम का एक हैप्पी हार्मोन रिलीज होता है. यह वही हार्मोन है जो किसी भी लत के लिए जिम्मेदार होता है. सोशल मीडिया से निकलने वाला डोपामाइन शराब, स्मोकिंग या गेमिंग से भी कहीं ज्यादा होता है. इसके कारण शरीर में सेरोटोनिन और गाबापेंटिन जैसे जरूरी केमिकल्स का संतुलन बिगड़ जाता है, जिसे एमआरआई और ब्रेन वॉल्यूम स्टडीज में भी साफ देखा गया है.
इसी चर्चा में योग विशेषज्ञ मिनी शास्त्री ने भी अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि हमारा दिमाग अच्छी और बुरी आदतों में फर्क नहीं समझता, क्योंकि दोनों ही सूरतों में डोपामाइन का रिवॉर्ड सिस्टम एक जैसा काम करता है. इसलिए हमें खुद अपनी आदतों के प्रति सचेत होना पड़ेगा.
उन्होंने कहा कि अगर हम अपनी दिनचर्या में एक भी अच्छी आदत को शामिल कर लें या सोने से पहले फोन से दूरी बना लें, तो इस एडिक्शन के पूरे चक्र को तोड़ा जा सकता है. विशेषज्ञों का यही मानना है कि हमें डिजिटल दुनिया से दूरी बनाकर अपनी असल जिंदगी को रील्स और लाइक्स के भरोसे छोड़ना बंद करना होगा.