भारत
पिछले एक दशक में मिडिल क्लास की आय में सालाना औसतन केवल 0.4% की बढ़ोतरी हुई है, लेकिन इसके विपरीत शिक्षा पर होने वाला खर्च इतना बढ़ चुका है कि अब यह उनकी कुल आय का लगभग पांचवां हिस्सा निगल रहा है.
भारत में स्कूली शिक्षा अब एक जरूरत नहीं, बल्कि एक चुनौती बनती जा रही हैखासतौर पर मिडिल क्लास परिवारों के लिए. हर साल स्कूल फीस में 10 से 30 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो रही है, जबकि वेतन बढ़ोतरी की दर बेहद मामूली है. कॉइनस्विच और लेमन के कोफाउंडर आशीष सिंघल की हालिया पोस्ट ने इस मुद्दे को और उजागर किया है.
सिंघल ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि बेंगलुरु में CBSE स्कूल में तीसरी कक्षा की फीस 2.1 लाख रुपये है. यह कोई इंटरनेशनल स्कूल नहीं, फिर भी इतनी अधिक फीस वसूली जा रही है. उन्होंने इसे "शिक्षा के नाम पर चोरी" कहा और पूछा अगर ये चोरी नहीं तो और क्या है?
पिछले 10 वर्षों में मिडिल क्लास की सैलरी में सालाना औसतन सिर्फ 0.4% की वृद्धि हुई है, जबकि शिक्षा का खर्च अब इनकम का लगभग 20% (पाँचवां हिस्सा) खत्म कर रहा है. अहमदाबाद में चौथी कक्षा के छात्र की सालाना फीस लगभग 1.8 लाख रुपये तक पहुंच चुकी है. यह महंगाई नहीं, मानसिक और आर्थिक शोषण है.
अब हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि कई मातापिता नर्सरी और प्राइमरी स्कूल की फीस के लिए लोन लेने को मजबूर हैं. EMI सिर्फ घर या गाड़ी के लिए नहीं, अब बच्चे की पढ़ाई के लिए भी चुकाई जा रही है. लोग कॉलेज की बचत भूल चुके हैं.
सरकार भले ही शिक्षा महंगाई को 4% के करीब दिखाती हो, लेकिन असल में मातापिता का अनुभव कुछ और ही कहता है. यूनिफॉर्म, किताबें, ट्रांसपोर्ट और अन्य खर्चों ने स्कूल को सबसे बड़ा मासिक खर्च बना दिया है.
एक दौर था जब कहा जाता था कि शिक्षा समाज में समानता लाएगी, लेकिन अब यही शिक्षा असमानता की सबसे बड़ी वजह बनती जा रही है. सिंघल का कहना है "यह सिर्फ महंगाई नहीं है, यह नुकसान है बचत का, विवेक का और पारिवारिक सपनों का."
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