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जल्द ही BMCचुनाव होने हैं, इसलिए उद्धव ठाकरे को अभी से कमर कस लेनी चाहिए. जैसे हालात हैं, बीएमसी का चुनाव न केवल पार्टी की मान और प्रतिष्ठा के लिए महत्वपूर्व है. बल्कि ये चुनाव इस बात का भी निर्धारण करेगा कि भविष्य में उनका क्या राजनीतिक भविष्य होगा.
90 का दशक, वो दौर जब महाराष्ट्र और उसमें भी मुंबई की सियासत में उद्धव ठाकरे का सिक्का चलता था. पावर का जो स्ट्रक्चर था, मुंबई की सियासत को समझने वाले तमाम राजनीतिक पंडित ऐसे थे, जिनका मत था कि बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) में बिना उद्धव ठाकरे की इजाजत के, परिंदा भी पर नहीं मार सकता. बात आगे बढ़े उससे पहले ये बता देना भी बहुत जरूरी है कि, ये वो वक़्त था, जब सत्ता का केंद्र उद्धव ठाकरे थे और एकनाथ शिंदे उद्धव के दिशा निर्देशों का पालन करते हुए काम करते थे.
कहते हैं वक़्त हमेशा एक सा नहीं रहता. समय ने करवट ली और 2022 में न केवल महाराष्ट्र बल्कि पूरे देश ने ऐसा बहुत कुछ देखा, जो न केवल सोच और कल्पना से परे था. बल्कि जिसने इसकी भी तस्दीक की कि, राजनीति अवसरवादिता का नाम है. और इसमें कोई किसी का सगा नहीं है.
जिक्र अगर वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में उद्धव ठाकरे का हो. तो मुंबई की राजनीति में लंबे वक़्त तक अपना सिक्का चमकाने वाले उद्धव और उनका दल शिवसेना (यूबीटी) आज निर्णायक मोड़ पर हैं. वो उद्धव जिनकी इजाजत के बिना बीएमसी में परिंदा पर नहीं मारता था, आज पहचान के मोहताज तो हैं ही. साथ ही साथ पार्टी में नेतृत्व का अभाव है. इसके अलावा तमाम दलों को भी उद्धव को समर्थन देने से पहले दस बार सोचना पड़ रहा है.
क्योंकि फिर जल्द ही बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) चुनाव होने हैं. इसलिए उद्धव ठाकरे को अभी से कमर कस लेनी चाहिए. क्यों? ऐसा इसलिए क्योंकि जैसे हालात हैं, बीएमसी का चुनाव न केवल पार्टी की मान और प्रतिष्ठा के लिए महत्वपूर्व है. बल्कि ये चुनाव इस बात का भी निर्धारण करेगा कि भविष्य में उनका और उनकी पार्टी का राजनीतिक भविष्य क्या होगा.
जैसा कि हम ऊपर ही इस बात को जाहिर कर चुके हैं कि, बीएमसी चुनाव न केवल उद्धव की आन, बान और शान के लिए जरूरी है. बल्कि ये चुनाव इसलिए भी जरूरी है क्योंकि 2022 में एकनाथ शिंदे द्वारा पार्टी को तोड़ने के बाद, पार्टी समर्थकों का एक वर्ग वो भी बहार आया. जो इस बात का पक्षधर है कि वो व्यक्ति जो अपनी पार्टी बचाने में नाकाम रहा उनका (पार्टी समर्थकों का ) आधार सुरक्षित रखने में क्या ही कामयाब होगा.
बता दें कि जिस समय शिंदे, उद्धव से अलग हुए, 43 पार्षद ऐसे थे, जिन्होंने आपदा में अवसर देखा और वो उद्धव को अकेला और तनहा छोड़ शिंदे के खेमे में हो लिए. पार्षदों द्वारा उद्धव को छोड़ने का नतीजा ये निकला कि, न केवल उद्धव का दल कमजोरी की कगार पर पहुंचा और उसकी रीढ़ टूटी. बल्कि मुंबई में उद्धव के वो किले जो अभेद माने जाते थे, उनमें सेंध लगी और वो कमजोर हुए.
मुंबई में जो उद्धव ठाकरे की स्थिति है, इस बात में भी कोई शक नहीं है कि, चाहे वो उद्धव का पुराना काडर हो. या फिर बूथ स्तर पर कार्यकर्ता. सब असमंजस में है. साथ ही सभी में अनिश्चितता इस पर भी है कि वो उद्धव जो वक़्त रहते पार्टी को जोड़े रखने में नाकाम रहे, पार्टी को दशा और दिशा कुछ नहीं दे पाएंगे.
इन बातों के अलावा जिक्र अगर पार्टी की युवा सेना का हो, तो वो जिस तरह निष्क्रिय है. माना जा रहा है कि इसका भी असर बीएमसी चुनावों में दिखेगा. ध्यान रहे किसी भी पार्टी के लिए उसकी ऊर्जा का स्रोत उसकी युवा शक्ति होती है. और उद्धव की पार्टी में युवा के नाम पर सिर्फ आदित्य ठाकरे हैं. जिन्हें लेकर पार्टी की राजनीति को समझने वाले लोगों का मत है कि उनमें राजनीतिक विवेक की कमी है.
सवाल होगा कि आखिर उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) का ये हाल क्यों हुआ? इसे लेकर कहा यही जाता है कि, उद्धव ने अपनी पार्टी की विचारधारा का त्याग किया और वो शिवसेना जो कभी हिंदुत्व के मुद्दे पर मुखर रहती थी, उसे हल्का किया. इसलिए आज जो कुछ भी पार्टी के साथ हो रहा, उसकी वजह पार्टी का अपनी विचारधारा का त्याग करना है.
बहरहाल जैसा कि हम बता चुके हैं बीएमसी चुनाव पार्टी के लिए अग्नि परीक्षा है. मगर क्योंकि मुंबई की एक बड़ी आबादी, उद्धव को उनके काम को पसंद करती है, तो माना ये भी जा रहा है कि, इसका फायदा उन्हें निकाय चुनावों में मिल सकता है.
खैर हम फिर इस बात को दोहरा रहे हैं कि निकाय चुनाव उद्धव के लिए करो या मरो वाला है. इस चुनाव के बाद पार्टी और उद्धव की क्या दशा और दिशा रहती है? इसका फैसला तो वक़्त करेगा. लेकिन जो वर्तमान है उसे देखते हुए हमें ये कहने में कोई गुरेज नहीं है कि, उद्धव की पार्टी को तैयारी का श्री गणेश अभी से कर लेना चाहिए. क्योंकि अगर आज से काम शुरू हुआ तभी समय पर कुछ मिलेगा वरना उद्धव के लिए यूं भी दिल्ली अभी दूर है.