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दिल्ली में वोटिंग के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महाकुंभ स्नान पर विपक्षी पार्टियों ने सवाल उठाए हैं. हालांकि, उनके आरोपों में खास दम नहीं दिखता.
बुधवार को दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए मतदान हो रहा है. सुबह से ही पोलिंग बूथ पर मतदाताओं की लंबी कतारें देखने को मिल रही हैं. इधर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज महाकुंभ में स्नान किया. वे करीब डेढ़ घंटे प्रयागराज में रुकने के बाद वहां से रवाना होंगे. इसको लेकर विपक्षी पार्टियों ने प्रधानमंत्री को निशाने पर लिया है. कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने कहा है कि पीएम के महाकुंभ में स्नान से वोटर्स प्रभावित होंगे.
कांग्रेस और आप का यह आरोप चुनावी बयानबाजी से ज्यादा कुछ नहीं लगता. प्रधानमंत्री का कार्यक्रम पहले से ही तय था. मतदान की तारीख भी पहले से निर्धारित थी. वोटिंग के दिन ही प्रधानमंत्री का महाकुंभ में पहुंचना बीजेपी की रणनीति हो सकती है, लेकिन ये मौका कांग्रेस और दूसरी पार्टियों के पास भी था. वे भी टोकन पॉलिटिक्स की रणनीति बना सकती थीं, जिसका आरोप वे बीजेपी पर लगा रही हैं. आखिर, सियासत टाइमिंग और स्ट्रैट्जी का ही खेल है.
वोटर्स को कम आंक रहा विपक्ष!
विपक्षी पार्टियों का यह आरोप दिल्ली के मतदाताओं को भी कमतर करके आंकने जैसा है. उनके आरोप का अप्रत्यक्ष मतलब ये है कि मोदी के महाकुंभ स्नान से वोटर्स अपना फैसला बदल लेंगे. यदि ऐसा होता तो पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी बहुमत से दूर नहीं होती. लोकसभा चुनाव के लिए वोटिंग के दिन प्रधानमंत्री कन्याकुमारी में थे. वे 48 घंटे तक साधना में लीन रहे, लेकिन इसको चुनाव के नतीजों से जोड़कर देखना अतार्किक है. न ही यह चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन है.
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मोदी की पुरानी रणनीति
बहरहाल, ये सच है कि इस तरह की टोकन पॉलिटिक्स पीएम मोदी और बीजेपी की चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा होता है. 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में भी मोदी ये रणनीति अपना चुके हैं. 2014 में वोटिंग के दिन मोदी शिवाजी के प्रतापगढ़ में थे. 2019 में मतदान के दिन वे केदारनाथ पहुंच गए थे. इन दोनों चुनावों में बीजेपी ने शानदार प्रदर्शन किया था. वहीं, 2024 में पीएम के कन्याकुमारी दौरे के बावजूद बीजेपी अपने दम पर बहुमत से दूर रह गई. इससे पहले 2018 में कर्नाटक में विधानसभा के चुनाव हुए थे. तब वोटिंग के दिन प्रधानमंत्री काठमांडू में पशुपतिनाथ मंदिर के दर्शन के लिए गए थे. जब नतीजे आए तो बीजेपी वहां सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आई. कांग्रेस ने तब भी चुनाव आयोग से इसकी शिकायत की थी, लेकिन आयोग ने इस पर खास तवज्जो नहीं दी थी। ऐसे में बीजेपी चाहेगी कि दिल्ली के चुनाव के नतीजे भी उसके लिए वैसे ही हों, जैसे 2014, 2018 और 2019 में रहे थे.