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81 दिन की गविष्ठि यात्रा पर यूपी की 403 विधानसभाओं में भ्रमण पर निकले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को न तो सर्व हिन्दू समाज से और ना ही मीडिया से सपोर्ट मिलता देख अब वो अब हताशा में नेताओं की भाषा बोलने लगे हैं.
डॉ. अभय पांडेय
81 दिन की गविष्ठि यात्रा पर यूपी की 403 विधानसभाओं में भ्रमण पर निकले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को न तो सर्व हिन्दू समाज से और ना ही मीडिया से सपोर्ट मिलता देख अब वो अब हताशा में नेताओं की भाषा बोलने लगे हैं. गोरखपुर से 3 मई को एक शीर्ष संत के रूप में शुरू हुई उनकी यात्रा अब शुद्ध राजनीतिक अभियान का रूप ले चुकी है, जहां शुरू में कथित तौर पर ही सही किंतु गोमाता की रक्षा और हिंदू आस्था के संरक्षण का संदेश ज्यादा था. वहीं अब वो देश के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य के चुने हुए लोकप्रिय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर व्यक्तिगत तीखे हमले, बेबुनियाद आरोप और विपक्षी दलों के साथ खुला तालमेल दिखाते हुए वक्तव्य दे रहे हैं. ये बदलाव दुर्भाग्यपूर्ण है.
जो स्वयं को शंकराचार्य बताते हों, उन्हें राजनीति की भाषा में उतरकर अपनी गरिमा को कमजोर नहीं करना चाहिए. यात्रा अब तक सवा दो सौ विधानसभाओं तक पहुंच चुकी है, लेकिन हर जगह समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेता, जिलाध्यक्ष, विधायक और पूर्व विधायक इसका स्वागत कर रहे हैं. मीडिया और जनता दोनों उनकी यात्रा से दूरी बनाए हुए है. कन्नौज में डिम्पल यादव और शिवपाल यादव का व्यक्तिगत स्वागत तथा अखिलेश यादव का सोशल मीडिया समर्थन इस यात्रा को पूरी तरह से सपा के चुनावी रथयात्रा का रंग दे चुका है.
सामाजिक मान्यताओं में एक संत का कर्तव्य समाज को एकजुट करना और आस्था की रक्षा करना होता है, न कि चुनी हुई सरकार और लोकप्रिय मुख्यमंत्री के खिलाफ हताशा भरे बयान देना. गाजियाबाद-हापुड़ में दिए गए उनके बयान इस हताशा को उजागर करते हैं. उन्होंने यूपी के मुख्यमंत्री को 'भारत का सबसे बड़ा मांस विक्रेता' करार दिया है और ये भी कहा है कि 'मांस का विक्रेता संत नहीं हो सकता'. ये बयानबाजी एक संत की शैली नहीं, बल्कि विपक्षी राजनीति की बद्जुबानी नहीं तो और क्या है.
योगी सरकार ने 1955 के गोवध निवारण अधिनियम को और सख्त बनाकर देश का सबसे कठोर कानून लागू किया है. अवैध बूचड़खानों पर कार्रवाई, गौ-आश्रय स्थलों का विस्तार और गो-रक्षा के ठोस प्रयास किए हैं, जिसकी दुनियाभर में सराहना हो रही है. वैसे भी गोमांस उत्पादन और उसकी खरीद-बिक्री पर सख्ती जायज है, क्योंकि वो बहुसंख्यक हिंदू समाज की धार्मिक आस्था का विषय है. लेकिन ये बात अविमुक्तेश्वरानंद भी बखूबी जानते हैं कि हर तरह के मांसाहार (भैंस, बकरे, मुर्गे आदि) को प्रतिबंधित करना 25 करोड़ आबादी वाले राज्य में व्यावहारिक नहीं है. मुस्लिम समुदाय के अलावा हिंदू समाज की कई जातियां मांस सेवन और व्यापार से जुड़ी हैं. रोजगार और आर्थिक जरूरतों को नजरअंदाज कर केवल आरोप लगाना हताशा को दर्शाता है.
पहले उनकी यात्रा जब पूर्वांचल में निकल रही थी तब उन्होंने योगी सरकार पर गोमांस निर्यात का आरोप लगाया गया. मीडिया ने दस्तावेज मांगे तो बात घुमा दी गई. अब जब यूपी में गोमांस का कारोबार प्रतिबंधित है, तो निशाना बदल दिया गया. ये पैटर्न तथ्यहीन बयानबाजी का इशारा करता है. 'दो तरह के हिन्दू होते हैं, असली और नकली', 'अब हिन्दू बीजेपी से छिटक रहा है' जैसे उनके बयान हिंदू समाज को विभाजित करने वाले हैं. हिंदू समाज विविधतापूर्ण है. गो-रक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे राजनीतिक हथियार बनाकर पूरे समाज को दो खेमों में बांटना उचित नहीं.
यात्रा को मीडिया तवज्जो न मिलना और सरकार की ओर से कोई विशेष समर्थन न मिलना उनकी हताशा बढ़ाता प्रतीत हो रहा है. परिणामस्वरूप वो मीडिया के सवालों पर झुंझलाते हैं और अनर्गल बयान देने लगे हैं. संतों का काम किसी दल की आलोचना नहीं, बल्कि समाज सुधार होता है. अपनी निजी खुन्नस या असंतोष के चलते चुनी हुई सरकार के खिलाफ विपक्ष की कठपुतली बनना अविमुक्तेश्वरानंद जैसे संत को शोभा नहीं देता. वैसे भी वो शंकराचार्य पद के विवादित दावेदार हैं, ऐसे में उन्हें राजनीतिक दलों के एजेंडे का हिस्सा बनने से बचना चाहिए.
यहां सबसे बड़ा सवाल समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के नेताओं से भी जुड़ा है. वो अविमुक्तेश्वरानंद का स्वागत कर रहे हैं, उनके कार्यक्रम को चुनावी मंच बना रहे हैं, लेकिन गोमाता को 'राष्ट्रमाता' घोषित करने पर चुप्पी क्यों? एक तरफ संत का समर्थन, दूसरी तरफ राष्ट्रमाता जैसे सकारात्मक प्रस्ताव पर मौन. ये दोहरा मापदंड क्यों? क्या विपक्ष केवल अविमुक्तेश्वरानंद जी का उपयोग करना चाहता है? क्या अखिलेश यादव, डिम्पल यादव, शिवपाल यादव या अन्य सपा-कांग्रेस नेता गोमाता को राष्ट्रमाता घोषित करने, पूरे देश में गोवध निवारण के सख्त कानून बनाने और मांस व्यापार की अनियमितताओं पर रोक लगाने का लिखित वक्तव्य देने को तैयार हैं?
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को चाहिए कि अपने समर्थक नेताओं से स्पष्ट रूप से ये मांग करें. अगर गो-रक्षा उनका असली उद्देश्य है, तो केवल यूपी सरकार को घेरने के बजाय अन्य राज्यों की सरकारों से भी यूपी की तर्ज पर कठोर कानून बनाने की अपील करें. राजनीति से प्रेरित बयानबाजी छोड़कर सकारात्मक एजेंडा अपनाएं.
प्रथम दृष्टया स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का गोमाता के प्रति समर्पण सराहनीय है. लेकिन यात्रा को राजनीतिक हथियार बनाने से उनकी छवि प्रभावित हो रही है. 'मांस का विक्रेता संत नहीं हो सकता' कहकर योगी आदित्यनाथ पर हमला करना उनके संन्यासी जीवन और गोरक्षपीठ से जुड़े लाखों भक्तों की भावनाओं का अपमान है. संत और मुख्यमंत्री के बीच फर्क समझते हुए भी उन्हें 'ढोंगी पाखंडी' कहना अनुचित ही नहीं अशोभनीय भी है. हिंदू समाज को एकजुट रखने की जरूरत है. योगी सरकार के गो-रक्षा प्रयासों को स्वीकार करते हुए आगे सुझाव देना बेहतर होता. अच्छा होता कि हताशा में उलटे-पलटे बयान देकर ध्यान खींचने की कोशिश न करके संत की गरिमा बनाए रखें. विपक्ष की कठपुतली बनने के बजाय सभी दलों से गो-रक्षा के ठोस कार्यक्रम की मांग करें. गोमाता राष्ट्रमाता बनें यह मांग पूरे देश की होनी चाहिए, न कि केवल एक राज्य के सीएम की व्यक्तिगत आलोचना तक सीमित हो.
अविमुक्तेश्वरानंद जी को नेताओं वाली भाषा छोड़कर संतों वाली शैली अपनानी चाहिए. आध्यात्मिकता और राजनीति का मिश्रण दोनों को कमजोर करता है. अगर सच में गोमाता की रक्षा करनी है तो सकारात्मक, तथ्य आधारित और एकजुट करने वाला अभियान चलाएं. हिंदू समाज और पूरे देश को अपने संत-महात्माओं से ऐसी ही अपील की जरूरत है.
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामानुजन कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. समसामयिक विषयों पर लेखन करते रहते हैं.)
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