Advertisement

यादव नहीं, तेजस्वी और राजद के लिए यह है बिहार का ब्रह्मास्त्र...

बिहार विधानसभा के तहत बिहार में RJD ने मतदाता अधिकार यात्रा के दौरान छूट गए जिलों का दौरा करने और अपने 'चलो बिहार, बिहार बदलें' नारे के लिए समर्थन जुटाने के लिए 16 सितंबर को बिहार अधिकार यात्रा शुरू की.

Latest News
यादव नहीं, तेजस्वी और राजद के लिए यह है बिहार का ब्रह्मास्त्र...

bihar election 2025 

Add DNA as a Preferred Source

बात बीते दिनों की है. बिहार विधानसभा के तहत बिहार में RJD ने मतदाता अधिकार यात्रा के दौरान छूट गए जिलों का दौरा करने और अपने 'चलो बिहार, बिहार बदलें' नारे के लिए समर्थन जुटाने के लिए 16 सितंबर को बिहार अधिकार यात्रा शुरू की. पार्टी को देखें और इसका अवलोकन करें तो मिलता है कि राजद आज खुद एक बेहद नाज़ुक मोड़ पर खड़ी है. और ये सब तब हुआ है, जब 2015 और 2020 के चुनावों में राजद सबसे बड़ी पार्टी के रूप में बिहार में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी है. जिक्र अगर मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य का हो, तो जैसे हाल हैं. बिहार में राजद या ये कहें कि यादव परिवार के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी अभी भी बहुत दूर है.

ज्ञात हो कि पार्टी को बिहार में संरचनात्मक समस्याओं का संकट झेलना पड़ रहा है, जैसे मुस्लिम-यादव गठजोड़ से आगे अपना आधार बढ़ाना और गैर-यादव ओबीसी, ईबीसी, दलितों और सवर्ण जातियों के बीच पैठ बनाना. एक ऐसी पार्टी के लिए जो लंबे समय से सामाजिक न्याय और आनुपातिक प्रतिनिधित्व की वकालत करती रही है, उसका अपना टिकट वितरण एक अलग कहानी बयां करता है, जो उसकी चुनावी संभावनाओं में बाधा बन सकता है.

राजद को हमेशा से मुसलमानों और यादवों के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी के रूप में देखा गया है. और इसके पीछे अच्छे कारण भी हैं. सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के सर्वेक्षण के अनुसार, 2020 के विधानसभा चुनावों में, बिहार में 75 प्रतिशत मुसलमानों और यादवों ने राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन का समर्थन किया.

आइये समझें बिहार के तहत प्रभाव और जनसंख्या का खेला

जब भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार ने जाति जनगणना कराने की घोषणा की, तो बिहार के विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से न्यायपालिका में आरक्षण, जाति जनगणना के आधार पर आनुपातिक आरक्षण और लंबित मंडल आयोग की सिफारिशों को पूरी तरह से लागू करने की मांग की. लेकिन राजद के टिकट वितरण की बारीकी से जांच करने पर पता चलता है कि उसकी कथनी और करनी में ज़मीन-आसमान का अंतर है.

2020 के चुनावों में, यादवों को पार्टी के 144 टिकटों में से 58 मिले, जबकि बिहार की आबादी में उनकी हिस्सेदारी केवल 14 प्रतिशत है. मुसलमानों को 18 टिकट मिले, जो उनकी 18 प्रतिशत आबादी से काफी कम है. यहां तक कि भाजपा के मुख्य वोट बैंक, उच्च जातियों को भी 14 टिकट मिले. अति पिछड़ी जातियों को केवल 26 टिकट मिले, जबकि उनकी जनसांख्यिकी 24 प्रतिशत है.

राजद के टिकट वितरण में यादवों, अनुसूचित जातियों और उच्च जातियों को छोड़कर बाकी सभी का प्रतिनिधित्व कम था. कुल मिलाकर, राजद ने अपने 144 टिकटों में से 92 ओबीसी और ईबीसी को दिए, जबकि उनकी आबादी 51 प्रतिशत थी. हालाँकि, 40 प्रतिशत टिकट केवल यादवों को दिए गए.

कांग्रेस और वामपंथी दलों जैसे सहयोगियों को शामिल करने पर भी यह असंतुलन ठीक नहीं हुआ. कुल मिलाकर, महागठबंधन ने अपने 243 टिकटों में से 119 (49 प्रतिशत) ओबीसी और ईबीसी को दिए, जबकि उनकी आबादी 51 प्रतिशत थी; 29 प्रतिशत टिकट केवल यादवों को दिए गए, जो उनकी वास्तविक आबादी का दोगुना है.

राजद ने जिन 144 सीटों पर चुनाव लड़ा, उनमें से 75 पर जीत हासिल की, यहां जीत के लिहाज से पार्टी का स्ट्राइक रेट 52 प्रतिशत था. भूमिहार उम्मीदवारों, राजपूत और यादव (60 प्रतिशत) का स्ट्राइक रेट ज़्यादा था. यहां तर्क यह भी दिया जा सकता है कि चूंकि यादवों का स्ट्राइक रेट अधिक था, इसलिए उन्हें अधिक अवसर देना पार्टी की समझदारी थी.

निवर्तमान विधानसभा में, 21 प्रतिशत विधायक यादव , आठ प्रतिशत मुस्लिम , 10 प्रतिशत कुर्मी/कोइरी , 10 प्रतिशत बनिया, आठ प्रतिशत गैर-यादव ओबीसी और ईबीसी, 12 प्रतिशत राजपूत, पांच  प्रतिशत ब्राह्मण , 10 प्रतिशत भूमिहार और कायस्थ हैं.

यादव, सवर्ण, बनिया और कुर्मी/कोइरी का विधानसभा में उनकी जनसंख्या से अधिक प्रतिनिधित्व है. केवल पांच जाति समूह - यादव, बनिया, कुर्मी/कोइरी, राजपूत और भूमिहार - लगभग 150 विधायकों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो लगभग 63 प्रतिशत है, जबकि उनकी जनसंख्या केवल 30 प्रतिशत है.

चूंकि ये समूह प्रभावशाली हैं और इनके पास चुनाव लड़ने के लिए संसाधन हैं, इसलिए राजद जैसी पार्टियां इनके उम्मीदवारों को तरजीह देती हैं. राजद ने इन जाति समूहों को 88 टिकट दिए, जबकि भाजपा ने इन्हें 73 टिकट  दिए.

किन चुनौतियों का सामना कर रही है राजद 

बिहार और वहां की सियासत को समझने वाले तमाम एक्सपर्ट्स ऐसे हैं, जिनका मानना है कि मौजूदा वक़्त में राजद और तेजस्वी यादव के सामने चुनौतियों का पहाड़ है. यादवों को ज़रूरत से ज़्यादा प्रतिनिधित्व देकर और अन्य समूहों को कम प्रतिनिधित्व देकर, राजद को अपने गठबंधन को अपने पारंपरिक आधार से आगे बढ़ाने में मुश्किल हुई है.

ध्यान रहे बिहार जैसे विविधतापूर्ण राज्य में, जीत के लिए कई समुदायों के बीच पुल का निर्माण किसी भी पार्टी के लिए बहुत ज़रूरी है.

राजद का मुसलमानों को हाशिये पर रखना 

बिहार में मुसलमान एक ऐसा समुदाय जो ऐतिहासिक रूप से राजद के प्रति वफ़ादार रहा है, ने कुछ असंतोष पैदा किया है. मतदाता अधिकार यात्रा के दौरान राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के साथ प्रमुख मुस्लिम नेताओं की अनुपस्थिति असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेताओं को वोट बांटने का मौका देती है. उपमुख्यमंत्री पद के लिए समुदाय की मांग गठबंधन के भीतर बढ़ती मुखरता को दर्शाती है.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राजद अति पिछड़े वर्गों को पर्याप्त रूप से आकर्षित करने में विफल रहा है, जो बिहार में एक महत्वपूर्ण मतदाता वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं. अति पिछड़े वर्गों को केवल 26 टिकट आवंटित होने के कारण, पार्टी इस महत्वपूर्ण जनसांख्यिकीय समूह को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के हाथों खोने का जोखिम उठा रही है.

2024 के उत्तर प्रदेश लोकसभा चुनावों में, समाजवादी पार्टी ने केवल पांच यादव उम्मीदवारों को टिकट दिए, जो 2019 में 10 थे. साथ ही, इसने गैर-यादव ओबीसी और ईबीसी का प्रतिनिधित्व 2019 के छह से बढ़ाकर 23 कर दिया. इससे सपा को राम मंदिर निर्माण से उपजे सकारात्मक रुझान के बावजूद, भाजपा की हिंदुत्ववादी राजनीति पर विजय पाने में मदद मिली.

राजद को बिहार की प्रमुख राजनीतिक ताकत के रूप में अपनी स्थिति पुनः प्राप्त करने के लिए, उसे अपनी टिकट वितरण रणनीति में बदलाव करना होगा. पार्टी को अपने टिकट आवंटन को जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं के अधिक निकट लाना होगा. इसका अर्थ है यादव प्रतिनिधित्व को यथार्थवादी स्तर तक कम करना जबकि मुस्लिम और ईबीसी उम्मीदवारों की संख्या बढ़ाना.

बहरहाल एक पार्टी के रूप में राजद की चुनौती जगजाहिर है.  उसे एक समुदाय की पार्टी के रूप में देखे जाने से हटकर एक वास्तविक समावेशी गठबंधन बनना होगा. ध्यान रहे जिस पार्टी ने कभी उच्च-जाति के वर्चस्व को चुनौती देकर बिहार की राजनीति में क्रांति ला दी थी, अब उस मुहाने पर खड़ी है जहां उसकी लड़ाई अपने स्वयं के अस्तित्व से है. वो तभी बच सकता है जब आगामी विधानसभा चुनाव में वो निर्णायक बढ़त बनाए और वो करे जो आलोचकों की सोच और कल्पना से परे हो.

अपनी राय और अपने इलाके की खबर देने के लिए जुड़ें हमारे गूगल, फेसबुक, x,   इंस्टाग्राम, यूट्यूब और वॉट्सऐप कम्युनिटी से. 

Read More
Advertisement
Advertisement
Advertisement