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महाराष्ट्र सरकार ने मराठा आरक्षण की मांग तो मान ली, लेकिन क्या अब ये मुद्दा खत्म हो जाएगा?

'मैं एक मराठा हूं और यह मेरे सभी दस्तावेजों में दर्ज है'- कई बार महाराष्ट्र के सीएम और केंद्र में मंत्री रह चुके शरद पवार ने करीब दो साल पहले ये बयान दिया था. 

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महाराष्ट्र सरकार ने मराठा आरक्षण की मांग तो मान ली, लेकिन क्या अब ये मुद्दा खत्म हो जाएगा?
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महाराष्ट्र सरकार को आखिरकार मराठा आरक्षण के मुद्दे पर झुकना ही पड़ा. मुंबई के आजाद मैदान में अपने हजारों समर्थकों के साथ भूख हड़ताल पर बैठे मनोज जरांगे पाटिल की 8 में से 6 मांगें सरकार ने मान लीं. इनमें सबसे महत्वपूर्ण थी मराठों को कुनबी जाति के तहत आरक्षण का फायदा देना.मनोज जरांगे ने कहा था कि सरकार हैदराबाद गजट को आधार मानकर मराठवाड़ा और पश्चिमी महाराष्ट्र के मराठों को कुनबी जाति का सर्टिफिकेट दे. देवेंद्र फडणवीस की सरकार ने यह मांग मानकर जरांगे का आंदोलन खत्म करा दिया. इसके बाद से सवाल उठ रहे हैं कि यह किसकी जीत है- सरकार की या मनोज जरांगे पाटिल की. साथ ही यह भी कि क्या अब ये मुद्दा खत्म हो जाएगा. इनके जवाब जानने से पहले ये समझना जरूरी है कि महाराष्ट्र की सियासत में मराठे कितने महत्वपूर्ण हैं और हैदराबाद गजट क्या है.

राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है मराठा समुदाय

'मैं एक मराठा हूं और यह मेरे सभी दस्तावेजों में दर्ज है'- कई बार महाराष्ट्र के सीएम और केंद्र में मंत्री रह चुके शरद पवार ने करीब दो साल पहले ये बयान दिया था. सूबे के सबसे ताकतवर नेताओं में गिने जाने वाले शरद पवार को राजनीति में करीब छह दशक बिताने के बाद यदि अपनी मराठा पहचान के बारे में जोर देकर बताना पड़ रहा है तो इसकी अहमियत का अंदाजा लग सकता है. वैसे तो सूबे की करीब 13 करोड़ आबादी में से 28 फीसदी ही मराठे हैं यानी एक चौथाई से थोड़े ज्यादा. लेकिन राज्य में अब तक हुए मुख्यमंत्रियों में आधे से ज्यादा मराठी रहे हैं. 288 में से करीब 150 विधानसभा और 48 में से 25 लोकसभा सीटों पर मराठे नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं. आंकड़ों से अलग हटकर देखें तो मराठे मूलतः कृषक समुदाय हैं और सामाजिक-आर्थिक रूप से प्रभावशाली हैं. को-ऑपरेटिव चीनी मिल से लेकर शिक्षा के संस्थान तक, हर जगह मराठों का प्रभुत्व है. यही वजह है कि सूबे की सरकारें मराठा आरक्षण के मुद्दे में उलझने से बचने की कोशिश करती रही हैं.

1982 में शुरू हुई आरक्षण की मांग

मराठों के लिए आरक्षण सियासी से ज्यादा भावनात्मक मुद्दा रहा है क्योंकि इस मांग की शुरुआत ही भावनाओं के ज्वार के साथ हुई. सबसे पहले 22 मार्च 1982 को अण्णासाहेब पाटिल ने इसके लिए आवाज उठाई थी. मंडल आयोग का विरोध करते हुए उन्होंने आरक्षण सहित 11 मांगें रखी थीं. सरकार ने उनकी मांग पर ध्यान नहीं दिया तो अण्णासाहेब ने आत्महत्या कर ली. यही आरक्षण आंदोलन की नींव बन गई. हालांकि, इसके बाद कई साल तक आंदोलन दबा रहा. 1997 में मराठा महासंघ और मराठा सेवा संघ ने इसे फिर से जिंदा किया. इन्हीं दोनों संगठनों ने पहली बार मराठों को कुनबी जाति में शामिल करने की मांग भी की. दो हजार के दशक की शुरुआत में शरद पवार और विलासराव देशमुख जैसे बड़े नेताओं ने इस मुद्दे को चुनावी मंचों से उठाया. इसका खास नतीजा नहीं निकला और मराठा समाज की नाराजगी बढ़ती रही. 2014 में कांग्रेस-एनसीपी की सरकार ने मराठों को 16 फीसदी आरक्षण देने की घोषणा की. यह बड़ा ऐलान था, लेकिन संवैधानिक मापदंडों पर खरा नहीं उतरा. इस पर हाई कोर्ट ने रोक लगा दी और मामला हाई कोर्ट तक पहुंचा. साल 2017 में राज्य सरकार ने मराठों के सामाजिक-आर्थिक हैसियत के आकलन के लिए एक आयोग बनाया. नवंबर 2018 में इसकी रिपोर्ट में कहा गया कि मराठा समाज को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा माना जाए. इसके बाद 30 नवंबर, 2018 को मराठों को 16 फीसदी आरक्षण से संबंधित बिल विधानसभा में पास हुआ. जून, 2019 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने आरक्षण को बरकरार रखा, लेकिन 16 फीसदी से कम कर शिक्षा में 12 और नौकरियों में 13 प्रतिशत कर दिया. 

मनोज जरांगे पाटिल की एंट्री

मई 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने मराठा आरक्षण को पूरी तरह असंवैधानिक घोषित कर दिया. सितंबर 2023 में मनोज जरांगे ने इसके लिए पहली बार अनशन किया. उनका आंदोलन तेजी से पूरे महाराष्ट्र में फैल गया. फरवरी 2024 में राज्य सरकार ने मराठों के लिए 10% आरक्षण वाला नया कानून पास किया. साथ ही, सगे-सोयरे आधार पर कुनबी    प्रमाणपत्र देने का काम भी शुरू हुआ. एक बार कानूनी अड़चनें इसमें रुकावट बनीं तो अगस्त 2025 में मनोज जरांगे ने मुंबई के आजाद मैदान में आमरण अनशन शुरू किया. इसी का नतीजा है कि राज्य सरकार को उनकी मांग माननी पड़ी.

क्या है हैदराबाद गजट

राज्य सरकार ने मराठों को कुनबी सर्टिफिकेट देकर 10 फीसदी आरक्षण देने की घोषणा की है. इसके लिए हैदराबाद गजट को आधार बनाया जाएगा. हैदराबाद गजट दरअसल एक रियासतकालीन दस्तावेज है. यह निजाम हैदराबाद की एक अधिसूचना है जिसमें कुनबी समुदाय को सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़ा बताया गया था. मनोज जरांगे की माग थी कि मराठा और कुनबी बराबर हैं क्योंकि दोनों कृषक समुदाय हैं. इसलिए मराठों को कुनबी मानकर उन्हें आरक्षण दिया जाए. इसके पीछे तर्क ये है कि आजादी के पहले मराठवाड़ा क्षेत्र हैदराबाद रियासत का हिस्सा था. तब मराठवाड़ा क्षेत्र के कुनबियों को ओबीसी में रखा गया था. इतना ही नहीं, निजाम ने मराठा समुदाय को  शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण के लिए आदेश भी जारी किया था. मनोज जरांगे पाटिल इसीलिए हैदराबाद गजट को आधार बनाने की मांग कर रहे थे. राज्य सरकार ने इसे मान तो लिया है, लेकिन क्या ये वास्तव में मराठों की अंतिम जीत है.

शुरू होगी मराठा Vs ओबीसी की लड़ाई!

ये सवाल इसलिए क्योंकि मराठों को कुनबी सर्टिफिकेट दिए जाने का ओबीसी समाज विरोध कर रहा है. राज्य के मंत्री और प्रभावशाली ओबीसी नेता छगन भुजबल तो इसके खिलाफ लाखों की भीड़ के साथ प्रदर्शन की पहले ही चेतावनी दे चुके हैं. ओबीसी महासंघ के अध्यक्ष बबनराव तायवाडे भी भुजबल के साथ आ गए हैं. यह मुद्दा अब मराठा बनाम ओबीसी बन चुका है. ओबीसी समुदाय अपने हिस्से का आरक्षण किसी हाल में मराठों के साथ बांटना नहीं चाहता. ऊपर से सीएम देवेंद्र फडणवीस को मराठे खास पसंद नहीं करते. जब वे डिप्टी सीएम थे, तब उन्होंने मनोज जरांगे के समर्थकों पर लाठीचार्ज करवा दिया था. मौजूदा डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे को लेकर बीजेपी में खुद ही संदेह है. पार्टी के कुछ नेताओं को लगता है कि शिंदे ने मराठा आंदोलन को रोकने के लिए खास गंभीरता नहीं दिखाई. दूसरे डिप्टी सीएम अजीत पवार ने आंदोलन के खिलाफ एक शब्द नहीं कहा, लेकिन इसे रोकने के लिए भी कुछ नहीं किया. पवार ने नो रिस्क पॉलिसी अपनाई क्योंकि उनका राजनीतिक आधार ही मराठवाड़ा क्षेत्र में है. मतलब ये कि यदि सत्ता पक्ष के ओबीसी नेता भुजबल की तरह आक्रामक रुख अपनाते हैं तो राज्य सरकार के लिए मुश्किलें बढ़ जाएंगी. ऐसा हुआ तो मराठा आरक्षण की मांग एक बार फिर सियासी दांव-पेच का शिकार बनेगी, जैसा अब तक होता आया है.

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