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झीरम घाटी में हुए नक्सली हमले में 27 लोग मारे गए, जिनमें 10 पुलिसकर्मी शामिल थे, जबकि 38 लोग घायल हुए. इस हमले में कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा, नंद कुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल और उदय मुदलियार की मौके पर ही मौत हो गई थी. पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ला की इलाज के दौरान मौत हो गई थी.
छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में एनआईए की विशेष अदालत ने साल 2013 के झीरम घाटी नक्सली हमला मामले में सभी 10 आरोपियों को दोषी ठहराया है. इस हमले में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं समेत 29 लोगों की मौत हुई थी. इस मामले में सजा का ऐलान 16 सितंबर को होगा. सुनवाई के दौरान 101 गवाहों के बयान दर्ज किए गए थे.
बचाव पक्ष के वकील अरविंद चौधरी ने बताया कि जगदलपुर में एनआईए के विशेष जज अजय सिंह राजपूत की अदालत ने दो महिलाओं समेत सभी 10 आरोपियों को दोषी करार दिया. दोषी ठहराए गए आरोपियों में प्रमिला मोदियाम (40), चैतू लेकाम, सुमित्रा पुनेम मोदियाम, मुक्का मंडावी, कोसा कवासी, आयता मरकाम, मडकामी देवा, जोगा मडकामी, बंजामी सन्ना और महादेव नाग शामिल हैं. चौधरी ने पीटीआई से कहा, 'हम इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील करेंगे. हमें अभी तक फैसले की कॉपी नहीं मिली है. इसके बाद ही अपील के आधार के बारे में बता पाएंगे.'
उन्होंने कहा कि बचाव पक्ष ने अपना पक्ष मजबूती से रखा और उम्मीद है कि आरोपियों को हाई कोर्ट से न्याय मिलेगा. चौधरी ने बताया कि इस मामले में गिरफ्तार 11 आरोपियों के खिलाफ सुनवाई शुरू हुई थी, जिनमें से एक की सुनवाई के दौरान मौत हो गई.
दोषी ठहराए गए कोसा कवासी के भाई गुड्डू कवासी ने दावा किया कि उनके भाई और मुक्का मंडावी को इस मामले में झूठा फंसाया गया है. उन्होंने दावा किया कि जब हमला हुआ, तब कोसा कवासी परिवार में एक शादी समारोह की तैयारी में लगे थे, जबकि मंडावी भी गांव में शादी की तैयारियों में व्यस्त थे. गुड्डू ने कहा, 'वे हमले के समय वहां मौजूद नहीं थे. जो लोग इसमें शामिल थे, उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया और आजादी से रह रहे हैं, जबकि जो लोग शामिल नहीं थे, वे सजा भुगत रहे हैं. परिवार के लोग टूट चुके हैं.'
साल 2011 से 2013 के बीच बस्तर क्षेत्र में नक्सली हिंसा और सुरक्षा अभियानों का दौर चल रहा था. कांग्रेस के सीनियर नेता महेंद्र कर्मा नक्सलियों के खिलाफ चलाए गए सलवा जुडूम आंदोलन के प्रमुख चेहरों में से एक थे. इसलिए वो लंबे समय से माओवादियों के निशाने पर थे. इसी दौरान कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ में 'परिवर्तन यात्रा' शुरू की थी. 25 मई 2013 को कांग्रेस का काफिला बस्तर में परिवर्तन यात्रा के तहत कार्यक्रम में शामिल हुआ.
NIA के अनुसार, काफिला NH-221 पर बस्तर जिले के दरभा थाना इलाके की झीरम घाटी के पहाड़ी इलाके से गुजर रहा था. शाम करीब 4.15 बजे का समय था. नक्सलियों ने सड़क पर काफिले को रोककर दोनों ओर से फायरिंग शुरू कर दी. इसके बाद सुरक्षाकर्मियों और हमलावरों के बीच मुठभेड़ हुई थी. हमला इसलिए भी डरावना था क्योंकि एक ही जगह पर छत्तीसगढ़ कांग्रेस के कई शीर्ष नेता मौजूद थे.
नंद कुमार पटेल- तत्कालीन छत्तीसगढ़ कांग्रेस अध्यक्ष
महेंद्र कर्मा- पूर्व मंत्री और सलवा जुडूम के प्रमुख चेहरों में से एक
विद्याचरण शुक्ल- पूर्व केंद्रीय मंत्री
उदय मुदलियार- कांग्रेस नेता और पूर्व विधायक
NIA के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, हमले में 27 लोग मारे गए, जिनमें 10 पुलिसकर्मी शामिल थे, जबकि 38 लोग घायल हुए. इस हमले में महेंद्र कर्मा, नंद कुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल और उदय मुदलियार की मौके पर ही मौत हो गई थी. पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल भी हमले में गंभीर रूप से घायल हो गए थे, जिनका इलाज के दौरान 11 जून, 2013 को निधन हो गया था.
झीरम घाटी हमले के दो दिन बाद 27 मई 2013 को केंद्र सरकार ने मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को सौंप दी. छत्तीसगढ़ सरकार ने 28 मई 2013 को इस हमले की न्यायिक जांच के लिए तत्कालीन न्यायाधीश प्रशांत कुमार मिश्रा की अध्यक्षता में विशेष आयोग का गठन किया था. एनआईए ने पहली चार्जशीट 25 सितंबर 2014 को दायर की, जिसमें नौ आरोपी बताए गए थे. 28 सितंबर 2015 को सप्लीमेंट्री चार्जशीट में 30 नामजद आरोपी बनाए गए.
अधिकारियों ने बताया कि एनआईए द्वारा फरार घोषित किए गए कुछ आरोपियों ने बाद में मुख्यधारा में शामिल होने के लिए पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. जनवरी 2019 में, भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने हमले की जांच के लिए एसआईटी का गठन किया. सरकार का कहना था कि एनआईए ने हमले के पीछे की बड़ी साजिश की जांच नहीं की थी. यह मामला छत्तीसगढ़ की राजनीति में बड़ा मुद्दा बना हुआ है. पूर्व मुख्यमंत्री बघेल बार-बार आरोप लगाते रहे हैं कि हमले के पीछे की बड़ी साजिश की जांच नहीं की गई.
बघेल ने यह आरोप भी लगाया था कि साजिश के सिलसिले में एनआईए की एफआईआर में शुरुआत में माओवादी नेताओं गणपति और रमन्ना के नाम शामिल थे, लेकिन चार्जशीट में उनके नाम नहीं थे.पार्टी ने यह आरोप भी लगाया था कि 2014 में केंद्र में बीजेपी सरकार बनने के बाद एनआईए की जांच की रफ़्तार धीमी पड़ गई थी.
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