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क्या एक प्लानिंग के तहत हुई लद्दाख में हिंसा? जानें इस कहानी का A to Z

इस समय सबसे बड़ी हिंसा के चलते लद्दाख ट्रेंड में हैं. मेन स्ट्रीम मीडिया पर कई खबरें सामने आई हैं. लेकिन क्या ये हिंसा किसी प्लानिंग का हिस्सा हैं. आइए जानते हैं इसकी पूरी ABCD

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क्या एक प्लानिंग के तहत हुई लद्दाख में हिंसा? जानें इस कहानी का A to Z

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अब तक की सबसे बड़ी हिंसा के चलते लद्दाख ट्रेंड में है. मेन स्ट्रीम मीडिया में खबरें दिखाई जा रही हैं. सोशल मीडिया पर पोस्ट, वीडियो, फोटो शेयर हो रहे हैं. तमाम ऐसी बातें की जा रही हैं, जो आग बुझाने से ज्यादा उसमें खर डालने का काम करती हुई नजर आ रही हैं. बता दें कि लद्दाख को राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची में सुरक्षा उपायों की मांग को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शन कुछ इस हद तक हिंसक हुए कि, उसमें 4 लोगों  को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है और 100 के आस पास लोग घायल हुए, जिनमें पुलिसकर्मी भी शामिल थे. वर्तमान में हालात कैसे हैं? इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि लेह में कर्फ्यू लगा दिया गया है. चूंकि विरोध के नाम पर लोग सड़कों पर हैं इसलिए गाड़ियों को आग के हवाले किया जा रहा है. पुलिस के सामने चुनौती गहरी है इसलिए उग्र भीड़ को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा बलों द्वारा आंसू गैस के गोले छोड़े जा रहे हैं. गोलियां दागी जा रही हैं. 


ध्यान रहे कि क्लाइमेट एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक, जो राज्य के दर्जे और संवैधानिक सुरक्षा की मांग को लेकर अनशन पर थे, ने दो अन्य अनशन कर रहे लोगों की तबीयत खराब होने और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराए जाने के बाद अपना अनशन समाप्त कर दिया है.

क्योंकि लद्दाख हिंसा की चपेट में है और जल रहा है इसलिए आइये उन पॉइंट्स पर बात की जाए, जिन्हें समझने के बाद आपको भी इस बात का एहसास हो जाएगा कि हिंसा क्षणिक या क्रिया की प्रतिक्रिया नहीं है बल्कि इसकी प्लानिंग लंबे समय से चल रही थी.  

कैसे हुई मामले की शुरुआत? क्या-क्या हुआ

बता दें कि अभी बीते दिन ही हंगर स्ट्राइक पर बैठे दो प्रदर्शनकारियों, त्सेरिंग अंगचुक्क (72) और ताशी दोल्मा (60) को गंभीर हालत में अस्पताल ले जाने से मामला और बढ़ गया. वे राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची की सुरक्षा की मांग को लेकर 35 दिन की भूख हड़ताल पर थे. उनकी हालत बिगड़ने से लद्दाख के युवाओं में गुस्सा फैल गया और वे समर्थन में सड़कों पर उतर आए.

हालात कुछ ऐसे बने कि बुधवार को, हड़ताल की घोषणा कर दी गई. लोग इस हद तक नाराज थे कि उन्हें लेह के शहीद मैदान में जमा होना पड़ा जिसके बाद लोगों का गुस्सा हिंसक झड़पों में बदल गया. क्लाइमेट एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक ने भी माना है कि अस्पताल में भर्ती होना उनके शांतिपूर्ण अभियान को पटरी से उतारने वाली हिंसा का मुख्य कारण था.

किन मांगों के चलते प्रदर्शन कर रहे थे लोग? 

ज्ञात हो कि लद्दाख में जारी प्रदर्शन की मुख्य चार मांगें हैं. लद्दाख को राज्य का दर्जा, छठी अनुसूची का विस्तार, लेह और कारगिल के लिए अलग लोकसभा सीटें और नौकरियों में आरक्षण. प्रदर्शन कर रहे लोग तर्क दे रहे हैं कि छठी अनुसूची की सुरक्षा के बिना, लद्दाख का नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र, भूमि अधिकार और सांस्कृतिक पहचान गंभीर खतरे में हैं.

छठी अनुसूची, जो वर्तमान में पूर्वोत्तर के आदिवासी क्षेत्रों पर लागू है, वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों वाले निर्वाचित परिषदों के माध्यम से स्वायत्तता प्रदान करती है. लद्दाख के लिए प्रदर्शन कर रहे एक्टिविस्टों का आरोप है कि बीजेपी ने 2020 में लद्दाख को यह दर्जा देने के अपने वादे से मुकर गई है.

सोनाम वांगचुक का अनशन हुआ खत्म 

10 सितंबर को अनशन शुरू करने वाले जलवायु कार्यकर्ता सोनाम वांगचुक ने हिंसा भड़कने के बाद अचानक अपना विरोध प्रदर्शन समाप्त करने की घोषणा कर दी. उन्होंने कहा, 'मैं लद्दाख के युवाओं से आग्रह करता हूं कि वे तुरंत हिंसा बंद कर दें, क्योंकि इससे हमारे मकसद को ही नुकसान होगा.'

वांगचुक ने इसे लद्दाख के लिए 'सबसे दुखद दिन' बताया और स्वीकार किया कि उनका शांतिपूर्ण तरीका असफल रहा, लेकिन उन्होंने सरकार से लोगों की मांगों को सुनने का आग्रह किया.

उन्होंने कहा, 'हम अपना आंदोलन अहिंसक रखेंगे.' उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर युवाओं की जान जाती है तो उनके अनशन का मकसद ही बेकार हो जाएगा.

हिंसा में चार की मौत, कई घायल

अधिकारियों ने पुष्टि की कि झड़पों में 19 साल से 50 साल के बीच चार प्रदर्शनकारियों की मौत हुई, जबकि 100 के आस पास लोग घायल हुए. ध्यान रहे कि घायलों में 40 से अधिक पुलिसकर्मी शामिल हैं. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, भीड़ द्वारा पत्थरबाजी और सरकारी और बीजेपी कार्यालयों पर हमला करने के बाद सुरक्षा बलों ने आंसू गैस के गोले छोड़े और लाठीचार्ज किया और फिर गोलीबारी शुरू की.

बताया यह भी जा रहा है कि 2019 में लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद यह पहली जानलेवा झड़प थी, जिसने 1989 की दुखद यादें ताजा कर दीं.  बता दें कि तब केंद्र शासित प्रदेश के दर्जे के लिए प्रदर्शन के दौरान तीन लोगों की मौत हुई थी.

कहां कहां हिंसक हुई प्रदर्शन 

मामले के तहत जो जानकारी आई है यदि उसपर यकीन किया जाए तो जैसे-जैसे तनाव बढ़ा, युवाओं ने गाड़ियों में आग लगा दी और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया. लेह में बीजेपी कार्यालय और हिल काउंसिल कार्यालय में आग लगा दी गई, साथ ही एक पुलिस वाहन भी जला दिया गया. अधिकारियों ने बताया कि शहर में आग और काले धुएं के बादल छाए हुए थे.

पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए फायरिंग और आंसू गैस का इस्तेमाल किया, लेकिन हिंसा तेज़ी से फैल गई.

धिकारियों ने बाद में और खून-खराबा रोकने के लिए कर्फ्यू लगा दिया. उन्होंने कहा कि आज की घटनाएं लद्दाख के हाल के इतिहास के सबसे बुरे पलों में से एक थीं.

किसे दोषी मान रही है सरकार 

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अशांति भड़काने के लिए 'राजनीतिक मकसद वाले लोगों' और 'उकसाऊ बयानों' को जिम्मेदार ठहराया. अपने बयान में, उसने लोगों से सोशल मीडिया पर पुराने या भ्रामक वीडियो न शेयर करने की अपील की और कहा कि लद्दाख के संगठनों के साथ बातचीत जारी है.

मंत्रालय की तरफ से यह बयान भी आया है कि, 'सरकार लद्दाख के लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने और उन्हें पर्याप्त संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है.'उसने हाई-पावर्ड कमेटी के माध्यम से लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) के साथ चल रही बातचीत का भी जिक्र किया. मंत्रालय ने कहा कि बातचीत का अगला दौर 6 अक्टूबर को होना तय था.

घटना को कैसे देख रहे हैं उपराज्यपाल 

उपराज्यपाल कविंदर गुप्ता ने हिंसा की कड़े शब्दों में निंदा  की है और इसे 'दिल दहला देने वाली' घटना और लद्दाख की शांति को भंग करने की साजिश बताया. उन्होंने कहा है कि, 'लोकतांत्रिक व्यवस्था में सबको बोलने का अधिकार है, लेकिन आज जो हुआ वह स्वाभाविक नहीं था.' उन्होंने दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने का वादा किया.

उपराज्यपाल ने आरोप लगाया कि नेपाल और बांग्लादेश में हुए दंगों जैसी घटनाओं को दोहराने की कोशिश की जा रही है और हिंसा भड़काने के लिए 'कुछ खास लोगों' को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने लद्दाख के लोगों, खासकर युवाओं से शांति बहाल करने की अपील की और कहा कि प्रशासन उनके साथ है, लेकिन साजिश करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा.

हिंसा के बाद हो रही है भरपूर राजनीति 

हिंसक मामलों का सामने आना भर था.  मामले  पर खूब जबरदस्त राजनीति हो रही है. भाजपा ने कांग्रेस पर अशांति भड़काने का आरोप लगाया और कहा कि यह हिंसा एक बड़ी साजिश का हिस्सा थी. पार्टी के प्रवक्ता संबित पात्रा ने आरोप लगाया कि यह 'जेन-जेड क्रांति' के नाम पर कांग्रेस का प्रायोजित प्रदर्शन था. हालांकि, कांग्रेस ने मोदी सरकार पर स्थिति को संभालने में नाकाम रहने और बातचीत में देरी करने का आरोप लगाया.

मामले के तहत कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने मांग की कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के हिंसक होने की पूरी जांच की जाए. उमर अब्दुल्ला ने कहा कि लद्दाख में अशांति जम्मू-कश्मीर में राज्य का दर्जा न मिलने से लोगों में पनपी व्यापक असंतोष को दर्शाती है.

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