Advertisement

सिंधु जल संधि को 'स्थायी मध्यस्थता न्यायालय' ले जाना पाकिस्तान को महंगा पड़ा, अब भारत के हिस्से का खर्च भी उठाएगा

सिंधु जल संधि के नियमों के अनुसार, जब भी कोई विवाद अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता में जाता है, तो दोनों देशों को कोर्ट की कार्यवाही का खर्च आधा-आधा उठाना पड़ता है. अब भारत ने सभी कार्यवाहियों से पूरी तरह दूरी बना ली है.

Latest News
सिंधु जल संधि को 'स्थायी मध्यस्थता न्यायालय' ले जाना पाकिस्तान को महंगा पड़ा, अब भारत के हिस्से का खर्च भी उठाएगा

सिंधु जल संधि मामले में बुरा फंसा पाकिस्तान. (AI इमेज)

Add DNA as a Preferred Source
  • सिंधु जल संधि का मामला कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन में ले जाकर फंसा पाकिस्तान.
  • भारत ने परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन को अमान्य घोषित किया है.
  • अब दोनों देशों का खर्च अकेले पाकिस्तान दे रहा है. 

Indus Waters Treaty:  सिंधु जल संधि पर भारत के साथ विवाद के मुद्दे को परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन तक ले जाना पाकिस्तान को भारी पड़ा है. भारत के खिलाफ इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन करने की पाकिस्तान की कोशिश बेहद महंगी साबित हुई है. भारत के इस कार्रवाई से हटने के बाद, पाकिस्तान को अब न सिर्फ अपने कानूनी खर्चे बल्कि आर्बिट्रेशन के खर्च में भारत का हिस्सा भी देना पड़ रहा है.

इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान परमानेंट कोर्ट ऑफ़ आर्बिट्रेशन (PCA) के सामने आर्बिट्रेशन प्रोसेस को चालू रखने के लिए पहले ही 6 लाख डॉलर से ज्यादा खर्च कर चुका है. सुनवाई जारी रहने पर खर्च और भी  बढ़ने की उम्मीद है. बता दें कि 22 अप्रैल, 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद संधि को रोकने का भारत का फैसला इस विवाद की जड़ में है. 

दरअसल सिंधु जल संधि के तहत विवाद सुलझाने की प्रक्रिया में, भारत और पाकिस्तान दोनों से मध्यस्थता  के खर्च में बराबर योगदान करने की उम्मीद की जाती है. पहलगाम आतंकी हमले के बाद संधि को स्थगित करने के बाद से भारत 'परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन'  और 'न्यूट्रल एक्सपर्ट' के सामने होने वाली सभी कार्यवाही से दूर रहा है. दूसरी तरफ  पाकिस्तान ने मध्यस्थता की प्रक्रिया जारी रखने का फैसला किया है. कार्यवाही न रुके, यह सुनिश्चित करने के लिए वह सारा वित्तीय बोझ उठा रहा है.  भारत के शामिल होने या योगदान देने से इनकार करने के कारण पाकिस्तान को ही दोनों पक्षों का खर्च उठाना पड़ रहा है. 

भारत 2023 से ही कार्रवाई का बॉयकॉट कर रहा है

पाकिस्तान ने भारत के किशनगंगा और रतले हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स को लेकर सवाल खड़े किए हैं जो पश्चिमी नदियों पर हैं और सिंधु जल संधि के तहत आते हैं. पाकिस्तान का कहना है कि दोनों प्रोजेक्ट्स का डिजाइन संधि के नियमों का उल्लंघन करता है और इसलिए उसने परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन में मध्यस्थता की मांग की थी. भारत का कहना है कि ऐसे टेक्निकल विवाद कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के बजाय न्यूट्रल एक्सपर्ट के अधिकार क्षेत्र में आते हैं. भारत ने ये भी साफ कहा है कि दोनों फोरम में एक साथ चलने वाली कार्रवाई संधि के विवाद सुलझाने के फ्रेमवर्क का उल्लंघन करती है.

भारत 2023 से ही पाकिस्तान द्वारा शुरू की गई PCA कार्रवाई का बॉयकॉट कर रहा था. दरअसल न्यूट्रल एक्सपर्ट की कार्रवाई भी उसी समय चल रही थी. इसी बीच हलगाम हमले के बाद मई 2025 में भारत ने संधि को स्थगित कर दिया. भारत का कहना है कि संधि तब तक स्थगित रहेगी जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को पूरी तरह खत्म नहीं कर देता. भारत ने ट्रिब्यूनल की कानूनी वैधता को भी खारिज कर दिया है. भारत ने परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन को गैर-कानूनी तरीके से बनाई गई 
बॉडी बताया है और इस बात पर जोर दिया है कि इसके दिए गए किसी भी फैसले का कोई मतलब नहीं है. 

Read More
Advertisement
Advertisement
Advertisement