भारत
भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा केवल तीन रंगों का संगम नहीं, बल्कि हर भारतीय के स्वाभिमान, त्याग और एकता का प्रतीक है.
हमारे देश का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा सिर्फ कपड़े का एक टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह हर भारतीय के दिल की धड़कन, उसकी उम्मीदों और देश के प्रति उसकी बेपनाह मोहब्बत का जरिया है. 22 जुलाई 1947 का दिन हमारे इतिहास में बेहद खास था, जब संविधान सभा ने इस तिरंगे को भारत के आधिकारिक राष्ट्रीय ध्वज के रूप में हरी झंडी दिखाई थी.
तब से लेकर आज तक, देश की सीमाओं पर तैनात हमारे जांबाज सैनिकों, पुलिस के जवानों और आम नागरिकों ने इसकी आन, बाण और शान को बनाए रखने के लिए बिना सोचे अपनी जानें तक न्योछावर की हैं. आगामी 15 अगस्त 2026 को देशवासी स्वतंत्रता दिवस का जश्न मनाएंगे, इस मौके पर आपको तिरंगे के बारे में सबकुछ बताते हैं.
तिरंगे का हर रंग और उसके बीच में बना अशोक चक्र हमें एक खास सीख देता है. हमारे झंडे की लंबाई और चौड़ाई का एक पक्का नियम है, यह हमेशा 3:2 के अनुपात में ही बनाया जाता है यानी अगर लंबाई 3 फीट है, तो चौड़ाई 2 फीट ही होगी.
सफेद पट्टी के ठीक बीचों-बीच गहरे नीले रंग का चक्र बना है. इसमें 24 तीलियां होती हैं. यह चक्र सारनाथ में सम्राट अशोक के सिंह स्तंभ से लिया गया है. इसे कानून या धर्म का पहिया भी कहते हैं. नीली तीलियां इंसान के 24 गुणों और कर्तव्यों को दर्शाती हैं. यह चक्र हमें सिखाता है कि रुक जाने का नाम मौत है और लगातार आगे बढ़ते रहने का नाम ही जिंदगी है.
जिस झंडे को देखकर आज हमारा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है, उसकी नींव आंध्र प्रदेश के रहने वाले पिंगली वेंकैया ने रखी थी. पिंगली कोई साधारण इंसान नहीं थे. महज 19 साल की उम्र में वे ब्रिटिश आर्मी में शामिल हुए थे. दक्षिण अफ्रीका में बोअर युद्ध के दौरान उनकी मुलाकात महात्मा गांधी से हुई, जिसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी. वे भारत लौटे और आजादी की लड़ाई में कूद पड़े.
एक परफेक्ट राष्ट्रीय ध्वज डिजाइन करने के लिए पिंगली ने 1916 से 1921 के बीच दुनिया के लगभग 30 देशों के झंडों का गहराई से अध्ययन किया. 1921 में जब उनकी उम्र 45 साल थी, तब उन्होंने पहला डिजाइन तैयार किया. शुरुआत में इसमें लाल, हरा और सफेद रंग था, साथ ही बीच में चरखा बना हुआ था.
उस समय रंगों को धार्मिक प्रतीकों के रूप में देखा गया था. लेकिन 1931 में बदलाव का प्रस्ताव आया. लाल रंग को हटाकर उसकी जगह साहस के प्रतीक केसरिया रंग को शामिल किया गया और बाद में चरखे की जगह अशोक चक्र ने ले ली.
तिरंगे की मर्यादा हमेशा बनी रहे, इसके लिए भारतीय ध्वज संहिता बनाई गई है, जिसे आसान समझ के लिए तीन हिस्सों में बांटा गया है-
देश का कोई भी नागरिक, स्कूल, कॉलेज या संस्था किसी भी दिन और किसी भी अवसर पर तिरंगा फहरा सकते हैं. 26 जनवरी 2002 को नियमों में बड़ा सुधार किया गया. अब आप अपने घर, दफ्तर या फैक्टरी पर साल के 365 दिन गर्व से झंडा लहरा सकते हैं.
तिरंगे का इस्तेमाल किसी विज्ञापन, पर्दे, कपड़े, या सांप्रदायिक फायदे के लिए नहीं किया जा सकता. झंडा किसी भी हालत में जमीन, फर्श या पानी को नहीं छूना चाहिए. इसे किसी गाड़ी, ट्रेन, नाव या जहाज पर लपेटने की मनाही है.
तिरंगे से ऊंचा कोई दूसरा झंडा नहीं लगाया जा सकता और न ही इसे सजावट के लिए फूलों के गुलदस्ते या वंदनवार की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है. तिरंगा फहराना हर भारतीय का अधिकार है, लेकिन इसका मान-सम्मान बनाए रखना हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है.
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