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भारतीय सेना देश में ही बने कार्ल गुस्ताफ Mk-IV रॉकेट लॉन्चर खरीदने जा रही है. इस नई खरीद के तहत हथियार की सप्लाई हरियाणा के झज्जर में बनी साब की भारतीय मैन्युफैक्चरिंग यूनिट से की जाएगी.
भारतीय सेना अपनी युद्धक क्षमता को मजबूत करने के लिए 450 कार्ल गुस्ताफ एमके-4 रॉकेट लॉन्चर खरीदने की तैयारी में है. इस खास हथियार को स्वीडन की कंपनी साब बनाती है. इस सौदे की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण बात यह है कि ये सभी रॉकेट लॉन्चर भारत में ही बनाए जाएंगे. हरियाणा में स्थापित की गई 'साब एडवांस्ड वेपन्स सिस्टम्स इंडिया' भारतीय सेना को इन हथियारों की आपूर्ति करेगी.
भारतीय सेना लंबे समय से कार्ल गुस्ताफ रॉकेट लॉन्चर का इस्तेमाल कर रही है. इसका एमके-4 वर्जन ज्यादा एडवांस है. पुराने एमके-3 का वजन लगभग 10 किलोग्राम था, जबकि नया एमके-4 लॉन्चर 7 किलोग्राम से भी कम वजन का है. इसके निर्माण में कार्बन फाइबर और टाइटेनियम का उपयोग किया गया है. सैनिकों के लिए इसे पहाड़ों और जंगलों में लेकर चलना बेहद आसान है.
इसकी लंबाई 1 मीटर से भी कम (लगभग 950 मिमी) है. इसे संकरी गलियों और पहाड़ी इलाकों में आसानी से ऑपरेट किया जा सकता है. इसमें एक इंटेलिजेंट 'शॉट काउंटर' लगा है जो यह ट्रैक करता है कि इस लॉन्चर से कितने राउंड फायर हो चुके हैं. यह अत्याधुनिक 'इंटेलिजेंट एमुनिशन' और थर्मल/लेजर गाइडेड साइट्स को सपोर्ट करता है. इससे रात में भी सटीक निशाना लगाया जा सकता है.
कार्ल गुस्ताफ दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला शोल्डर-फायर्ड हथियार सिस्टम है. इसे सैनिक कंधे पर रखकर फायर करते हैं. पहले की खरीद सीधे आयात पर निर्भर थी, लेकिन नई खरीद में देश में बने लॉन्चर लिए जाएंगे. इससे विदेशी प्रोडक्शन लाइनों पर निर्भरता कम होगी और देश में लंबे समय तक चलने वाला इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम बनेगा.
भारतीय सेना के लिए, कार्ल गुस्ताफ लंबे समय से अलग-अलग तरह के ऑपरेशनल माहौल में एक भरोसेमंद इन्फैंट्री सपोर्ट हथियार रहा है. इसे दुश्मन के टैंक, बख्तरबंद गाड़ियां और बंकर तबाह करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. कार्ल गुस्ताफ के नए वर्जन में आधुनिक फ़ायर-कंट्रोल सिस्टम और इंटेलिजेंट साइटिंग इक्विपमेंट को भी जोड़ा जा सकता है. इससे पहले ही शॉट में टारगेट पर निशाना लगने की संभावना बढ़ जाती है.
कार्ल गुस्ताफ से फायर किए जाने वाले रॉकेट की रेंज उसके प्रकार पर निर्भर करती है. इससे दागे जाने वाले अलग-अलग गोला-बारूद की रेंज 300 मीटर से 2.5 किलोमीटर तक हो सकती है. यह एक किलोमीटर की दूरी से दुश्मन के बंकर तबाह कर सकता है. 500 मीटर की दूरी से टैंक नष्ट कर सकता है और चलती हुई बख्तरबंद गाड़ियों को 400 मीटर की दूरी से उड़ा सकता है.