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Su-30 MKI भारतीय वायु सेना के अग्रिम पंक्ति के लड़ाकू विमान है. वायुसेना के पास वर्तमान में लगभग 260 Su-30 MKI हैं. इन्हें लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइलों से लैस करने के लिए अपग्रेड किया जा रहा है.
Su-30 MKI overhaul: भारतीय वायु सेना की युद्धक क्षमता बढ़ाने के लिए Su-30 MKI लड़ाकू विमानों में बड़े बदलाव की तैयारी है. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में आज, 7 सितंबर को रक्षा अधिग्रहण परिषद की बैठक होने वाली है. इस बैठक में 40 सुखोई-30MKI विमानों में जरूरी बदलाव के प्रस्ताव पर मुहर लग सकती है. शुरुआत में 40 Su-30MKI लड़ाकू विमानों का ओवरहाल किया जाएगा. इससे विमानों की ऑपरेशनल लाइफ 15 से 20 साल बढ़ जाएगी. साथ ही, रूस की RVV BD एयर-टू-एयर मिसाइलें फिट करने के लिए मोडिफिकेशन भी किए जाएंगे.
Su-30 MKI रूस में बनी RVV BD एयर-टू-एयर मिसाइलों से लैस होंगे. इस R-37 एम के नाम से भी जाना जाता है. ये मिसाइल 300 किमी की दूरी से दुश्मन के विमानों को निशाना बना सकती है. रक्षा मंत्रालय BRICS बैठक के लिए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भारत आने से कुछ दिन पहले ही इस प्रस्ताव पर मुहर लगा सकता है. व्लादिमीर पुतिन जब भारत में होंगे तब R-37 एम और कई अन्य अहम रक्षा समझौतों पर बातचीत होगी.
R-37M को दुनिया की सबसे घातक एयर-टू-एयर मिसाइलों में से एक माना जाता है. ये मिसाइल लगभग 6 मैक की हाइपरसोनिक रफ़्तार से हमला करती है. इसे मुख्य रूप से 'एयरबोर्न अर्ली वॉर्निंग एंड कंट्रोल' एयरक्राफ्ट को निशाना बनाने के लिए डिजाइन किया गया है. इस मिसाइल का वजन लगभग 510 किग्रा है और ये 60 किलोग्राम की वॉरहेड ले जा सकती है. R-37M भारत की स्वदेशी Astra Mk2 से वजन के मामले में 3 गुना भारी है और इसका वॉहेड 4 गुना ज्यादा है. इसे दूर से ही AWACS और टैंकर को नष्ट करने के लिए बनाया गया है.
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना के सुखोई विमानों के पास जो एयर-टू-एयर मिसाइलें थीं उनकी रेंज सिर्फ 110 से 120 किमी थी. लेकिन, पाकिस्तान को चीन से मिले जेएफ-17 विमानों के पास पीएल-15 मिसाइलें थी जिनकी रेंज 145 किमी तक है. पाकिस्तान ने लंबी दूरी से भारतीय विमानों को निशाना बनाने की कोशिश भी की.
ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय वायुसेना ने लंबी दूरी की एयर टू एयर मिसाइलों की तत्काल जरूरत महसूस की. राफेल विमान पहले से ही ताकतवर मेटियोर मिसाइलों से लैस हैं. अब सुखोई के भी R-37M से लैस हो जाने के बाद वायुसेना की ताकत कई गुना बढ़ जाएगी.
सेना के तीनों अंगों के बीच सुरक्षित डेटा ट्रांसफर और संचार के लिए स्वदेशी रूप से विकसित 2,500 सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो खरीदने का प्रस्ताव भी रक्षा अधिग्रहण परिषद के सामने रखा जाएगा. इस योजना पर 5500 करोड़ खर्च होने का अनुमान है. सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो या एसडीआर एक तरह के हवाई इंटरनेट का काम करते हैं. न्हें सभी फाइटर जेट्स, ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट, हेलीकॉप्टर्स और ग्राउंड कंट्रोल यूनिट्स में लगाया जाएगा ताकि युद्ध के मैदान की सटीक जानकारी वास्तविक समय में मिल सके.