भारत
अगर किसी विवाहित महिला का बच्चा है तो उसके पति को कानूनी तौर पर बच्चे का पिता माना जाएगा, भले ही बच्चे का असली पिता कोई अन्य व्यक्ति ही क्यों न हो.
भारत के सर्वोच्च न्यायालय सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे मामले में अहम फैसला सुनाया है, जिसने शादीशुदा जोड़ों के बीच बच्चे के पितृत्व निर्धारण के कानूनी पहलुओं पर तीखी बहस छेड़ दी है. एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर किसी विवाहित महिला का बच्चा होता है, तो उसके पति को ही कानूनी तौर पर उस बच्चे का पिता माना जाएगा. चाहे बच्चे का असली पिता कोई भी हो, उस पति को अपनी पत्नी के बच्चे की ज़िम्मेदारी लेनी होगी. यह फैसला भारतीय कानून की एक विशिष्ट धारा, खासकर भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 पर आधारित है.
अगर किसी भी महिला का शादी के बाद बच्चा पैदा होता है, तो कानून यह मान लिया जाएगा कि पति ही बच्चे का कानूनी पिता है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि व्यभिचार के मामलों में भी, जब तक पति यह साबित नहीं कर देता कि गर्भाधान के समय वह अपनी पत्नी के साथ नहीं था. तब तक कानूनी रूप से वही बच्चे का पिता होगा. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि डीएनए परीक्षण की मांग किसी भी पक्ष का खुद अधिकार नहीं है और इसे एक नियमित प्रक्रिया के रूप में नहीं किया जाना चाहिए. बच्चे का कल्याण, व्यक्तिगत गोपनीयता और सामाजिक गरिमा को जैविक तथ्यों से ऊपर रखा जाना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद से देश में इस मुद्दे को लेकर बहस छिड़ गई है. इनमें आलोचकों का दावा है कि यह पुरुषों पर अनुचित बोझ डालता है, उन्हें उन बच्चों की जिम्मेदारी लेने के लिए मजबूर करता है जो सही रूप से उनके पिता है ही नहीं.
सर्वोच्च न्यायालय ने एक निर्णय दिया है कि यदि कोई विवाहित जोड़ा साथ रहता है, तो उस दौरान पत्नी द्वारा गर्भ धारण किए गए बच्चे के पितृत्व का कोई प्रश्न ही नहीं उठता. यदि कोई तीसरा पक्ष पितृत्व का दावा करता है, तब भी पति के अधिकार कानून के अनुसार बने रहेंगे. न्यायालय ने यह निर्णय इसलिए लिया क्योंकि:
कानूनी आधार: भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 112 के अनुसार, यदि किसी वैध विवाह के दौरान कोई बच्चा पैदा होता है, तो यह माना जाता है कि वह विवाहित दंपत्ति की संतान है. पितृत्व की इस धारणा को तभी नकारा जा सकता है, जब यह साबित हो जाए कि दंपत्ति उस समय साथ नहीं रह रहे थे और उनके बीच शारीरिक संबंध स्थापित करना संभव नहीं था.
सामाजिक सुरक्षा: कानूनी सुरक्षा मुख्य रूप से बच्चे के अधिकारों की रक्षा और सामाजिक स्थिरता के लिए बनाई गई है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बच्चे की पहचान पर कोई संदेह न रहे. यदि पति को कानूनी पिता माना जाता है तो बच्चे को उसके पिता की संपत्ति और अन्य अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता है.
तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप: न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि विवाहित जोड़े के व्यक्तिगत संबंधों में तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप को प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए. अगर कोई तीसरा पक्ष बच्चे का पिता होने का दावा करता है, तो उस दावे को तब तक कोई महत्व नहीं दिया जाएगा, जब तक कि पति की ओर से स्पष्ट प्रमाण या स्वीकारोक्ति न हो कि वह बच्चे का पिता नहीं है.
यह निर्णय वैवाहिक जीवन की पवित्रता और बच्चे के अधिकारों को पूर्ण रखता है. यह एक ऐसा कानूनी ढाँचा तैयार करता है, जो विवाहित परिवार में किसी भी विवाद या तीसरे पक्ष के दावे के कारण उत्पन्न होने वाली समस्याओं से बच्चे की रक्षा करता है. यह सुनिश्चित करता है कि शादी शुदा महिला की अन्य संबंधों से जन्मे किसी भी बच्चे की कानूनी पहचान पर कोई प्रश्न न उठाया जाए.
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